प्राचीन अरब का समाज और भारत के वेद

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प्राचीन अरबी काव्य-संग्रह ‘शायर-उल्-ओकुल’ में एक महत्त्वपूर्ण कविता है। इस कविता का रचयिता ‘लबी-बिन-ए-अख़्तर-बिन-ए-तुर्फा’ है। यह मुहम्मद साहब से लगभग 2300 वर्ष पूर्व (18वीं शती ई.पू.) हुआ था । इतने लम्बे समय पूर्व भी लबी ने वेदों की अनूठी काव्यमय प्रशंसा की है तथा प्रत्येक वेद का अलग-अलग नामोच्चार किया है—

‘अया मुबारेक़ल अरज़ युशैये नोहा मीनार हिंद-ए।

वा अरादकल्लाह मज़्योनेफ़ेल जि़करतुन।।1।।

वहलतज़ल्लीयतुन ऐनाने सहबी अरवे अतुन जि़करा।

वहाज़ेही योनज़्ज़ेलुर्रसूल बिनल हिंदतुन।।2।।

यकूलूनल्लहः या अहलल अरज़ आलमीन फुल्लहुम।

फ़त्तेवेऊ जि़करतुल वेद हुक्कुन मानम योनज़्वेलतुन।।3।।

वहोवा आलमुस्साम वल यजुरम्निल्लाहे तनजीलन।

फ़ए नोमा या अरवीयो मुत्तवेअन मेवसीरीयोनज़ातुन।।4।।

ज़इसनैन हुमारिक अतर नासेहीन का-अ-ख़ुबातुन ।

व असनात अलाऊढ़न व होवा मश-ए-रतुन।।5।।’

अर्थात्, हे हिंद (भारत) की पुण्यभूमि! तू धन्य है, क्योंकि ईश्वर ने अपने ज्ञान के लिए तुझे चुना।।1।। वह ईश्वर का ज्ञान प्रकाश जो चार प्रकाश-स्तम्भों (चार वेद) सदृश सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करता है। यह भारतवर्ष में ऋषियों द्वारा चार रूप में प्रकट हुए।।2।। और परमात्मा समस्त संसार के मनुष्यों को आज्ञा देता है कि वेद, जो मेरे ज्ञान हैं, इनके अनुसार आचरण करो।।3।। वे ज्ञान के भण्डार ‘साम’ और ‘यजुर्’ हैं, जो ईश्वर ने प्रदान किये। इसलिए हे मेरे भाइयो! इनको मानो, क्योंकि ये हमें मोक्ष का मार्ग बताते हैं।।4।। और इनमें से ‘ऋक्’ और ‘अथर्व हैं, जो हमें भ्रातृत्व की शिक्षा देते हैं, और जो इनकी शरण में आ गया, वह कभी अंधकार को प्राप्त नहीं होता।।5।।

वेदों के बारे में इस अरबी कवि के इस प्रकार गुणगान करने से पता चलता है कि कभी हमारे चारों वेद संपूर्ण भूमंडल में सम्मानित स्थान प्राप्त किए हुए थे । इन पंक्तियों से यह भी पता चलता है कि वेदों के ज्ञान की प्रमाणिकता के सामने संपूर्ण भूमंडल के निवासी नतमस्तक हुआ करते थे और भारत की पवित्र भूमि को शीश झुकाने में गौरव अनुभव करते थे ।

वेदों का भारत की राजनीति पर प्राचीन काल से ही बहुत गहरा प्रभाव रहा है । प्रजा राजा के प्रति श्रद्धालु इसलिए रहती थी कि वह राजा को ईश्वर का प्रतिनिधि मानती थी और राजा इसलिए जनता में लोकप्रिय बने रहने का प्रयास करता था कि वह ईश्वर के न्यायकारी स्वरूप को ध्यान में रखकर उसके अनुसार आचरण करना अपना राजधर्म घोषित करता था ।यजुर्वेद में राजा के लिए विधिवत नियम बताए गए हैं। ये नियम कहते हैं कि राजा प्रजा के पालन के लिए सिंह आदि हिंसक पशुओं तथा चोर , डाकू इत्यादि दुष्टों का वध करके या उन्हें दंडित करके प्रजा की सुरक्षा करें। जो राजा प्रजा की सब प्रकार से रक्षा नहीं कर सकता , उसे राजा के पद के लिए अयोग्य कहा गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि राजा अपने पद पर तभी तक बने रहने योग्य है जब तक वह प्रजा की सर्व प्रकार से रक्षा करने में समर्थ है । यदि वह अपने इस राजधर्म के निर्वाह में कहीं चूक करता है या प्रमाद का प्रदर्शन करता है तो उसे पदच्युत करने का अधिकार भी जनता के पास रहता था । वास्तव में यही सच्चा लोकतंत्र होता है ।

अथर्ववेद के अनुसार जब अग्नि के समान तेजस्वी राजा लुटेरों , डाकुओं तथा चोरों को अपने अधीन करता है , दुष्टों को दंड देता है तथा उत्पातियों को कारागार में डाल कर दंडित करता है , तभी राज्य में शांति फैलती है और प्रजा भयमुक्त तथा आनंद युक्त होती है। यदि राजा चोर , डाकू व आतंकवादियों के सामने निरीह हो जाए या अपने आप को असहाय और असुरक्षित अनुभव करे तो ऐसे राजा को राज्य करने का अधिकार नहीं होता । राजा वही हो सकता है जो इन असामाजिक तत्वों का दलन और दमन करने में समर्थ हो और प्रत्येक प्रकार से शक्ति संपन्न हो ।

यजुर्वेद में ही कहा गया है कि राजा को चाहिए कि वह सदा अपनी सेना को सुशिक्षित और हृष्ट-पुष्ट रखे और जब शत्रुओं से युद्ध करना हो तब राज्य को उपद्रवों से रहित करके युक्ति और बल से शत्रुओं का संहार करे। इस प्रकार राजा सबका रक्षक हो। वास्तव में राजा से ऐसी अपेक्षा करने का अभिप्राय यह है कि उसे भारत में ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता है । जैसे ईश्वर अपने आप में सर्व सामर्थ्य युक्त है , वैसे ही राजा को भी सर्वसामर्थ्ययुक्त होना चाहिए । राजा को अपने राज्य में ऐसा परिवेश सृजित करना चाहिए कि उसकी प्रजा सर्वतोन्मुखी उन्नति कर सके और प्रत्येक प्रकार से सुखचैन अनुभव करे ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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