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अब तेरा क्या होगा लालू ?

lalu jailब्रज किशोर सिंह 

मित्रों,हिंदी में एक कहावत है और है महाभारतकालीन कि मनुष्य बली नहीं होत हैं समय होत बलवान,भीलन लूटी गोपिका वही अर्जुन वही बान। 15 सालों तक बिहार पर एकछत्र राज करनेवाले लालू प्रसाद को देखकर एकबारगी स्वभाववश दया भी आती है और इस कहावत पर हमारा विश्वास और भी दृढ़ हो जाता है। दरअसल मानव करण कारक है लेकिन वो खुद को समझ बैठता कर्त्ता है। श्री लालू प्रसाद यादव जी को भी किस्मत ने मौका दिया लेकिन जनाब खुद को खुदा समझ लेने की भूल कर बैठे। बिहार को उन्होंने फैमिली प्रॉपर्टी समझ लिया। दरवाजे पर बंधी गाय समझकर जब जितना चाहा दूहा।

मित्रों,इस लालू के शासन में बिहार का विकास नहीं हुआ विनाश हुआ। बिहार को इन्होंने सीधे रिवर्स गियर में चला दिया। जिस दौर में पूरी दुनिया इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी के पीछे पागल थी उस दौर में यह श्रीमान इसका मजाक उड़ाते हुए कहा करते कि ये आईटी-फाईटी क्या होता है? उनका एक और जुमला उन दिनों काफी मशहूर हुआ करता था कि कहीँ विकास करने से वोट मिलता है वोट तो जात-पात के नाम पर मिलता है?

मित्रों,धीरे-धीरे कैलेन्डर के साथ-साथ वक्त बदला,बिहारियों की सोंच बदली,मानसिकता बदली और आज इन लालू प्रसाद जी की स्थिति ऐसी हो गई है,ये इतने कमजोर हो गए हैं कि इन श्रीमान जो कभी बिहार के साथ-साथ दिल्ली की कुर्सी के भी किंग मेकर हुआ करते थे से खुद सड़कछाप हो चुके सोनिया और राहुल गांधी मिलना तक नहीं चाहते। जिस व्यक्ति ने बिहार पर 40 सालों तक शासन करनेवाली कांग्रेस पार्टी को अपना पिछलगुआ बनाकर रख दिया था आज खुद ही पिछलग्गू बनने को बाध्य है। जिन लोगों को ऐसा लगता था या लगता है कि मुलायम लालू के रिश्तेदार होने के नाते उनका समर्थन करेंगे उनको यह याद रखना चाहिए कि देवगौड़ा और गुजराल के जमाने में मुलायम ही लालू के सबसे बड़े दुश्मन हुआ करते थे और लालू जी जेल भेजवाने में भी सबसे बड़ा हाथ उनका ही था। वैसे भी लालू से मुलायम का यूपी में कुछ बनने-बिगड़ने को नहीं है।

मित्रों,एक बात हमेशा याद रखिएगा कि बिहार में जो पार्टी एक बार पिछलगुआ बन जाती है वह समाप्त ही हो जाती है। यानि अब लालू जी के राजनैतिक जीवन का तो अंत हो ही गया समझिए। भविष्य में बेचारे शरद यादव की तरह नीतीश कुमार की हाँ में हाँ मिलाने का ही एकमात्र काम किया करेंगे। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि भाजपा बिहार में सत्ता में साझीदार थी लेकिन पिछलग्गू नहीं थी। उसके नेता बराबर नीतीश कुमार को पसंद न आनेवाले बयान तो देते रहते ही थे साथ ही उस तरह के काम भी करते रहते थे। लेकिन यहाँ लालूजी की स्थिति वैसी नहीं है। उनको नीतीश जी को अपना नेता मानने के साथ ही खुद अपनी ही पार्टी के नेताओं को नीतीश को नागवार लगनेवाले बयान देने से रोकना पड़ा है। मतलब साफ है कि लालू जी ने अपने साथ-साथ पूरी पार्टी के स्वाभिमान को नीतीश कुमार के चरण कमलों में समर्पित कर दिया है।

मित्रों,लालू जी ने इस अवसर पर यह भी कहा कि भाजपा को हराने के लिए वे जहर पीने को भी तैयार हैं। वास्तविकता भी यही है कि लालू जी ने जहर ही पिया है,एक ऐसा जहर जो न सिर्फ उनकी राजनीति की बल्कि उनकी पार्टी की भी जान ले लेगा। वैसे हमारी लालू जी के साथ कोई हमदर्दी नहीं है। इस आदमी ने बिहार को बर्बाद करके रख दिया और जो कुछ भी थोड़ा-बहुत बिहार बचा हुआ था उसको समाप्त कर दिया उनके छोटे भाई नीतीश कुमार जी ने। आज तो हालत यह कि बिहार फिर से वहीं पर आकर खड़ा हो गया है जहाँ कि 2005 में तब था जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे। मैं पूछता हूँ  कि नीतीश कुमार जी जीतन राम मांझी जी के एस्टीमेट घोटाले पर कोई जवाब या सफाई क्यों नहीं देते? चाहे सरकारी पुल हो,सड़क या मकान उनके निर्माण में खर्च होता है 1 करोड़ तो एस्टीमेट बनाया जाता है 5 करोड़ का। मांझी जी का तो यह व्यक्तिगत अनुभव था कि कमीशन का पैसा मुख्यमंत्री रहते हुए उनके पास भी पहुँचता था तो क्या नीतीश कुमार तक मांझी जी से पहले और मांझी जी के बाद भी कमीशन का पैसा पहुँचता था या पहुँचता है? अगर नहीं तो बरसात के दिनों में बिहार के कोने-कोने से नीतीश काल में निर्मित पुलों के गिरने की खबरें क्यों आती हैं? नीतीश जी ने पूरे बिहार में बोर्ड लगवा दिए हैं कि इन-इन सड़कों के टूटने की सूचना इस नंबर दें? आप कमीशन खाईए और पब्लिक दिन-रात पागलों की तरह नंबर डायल करती रहे?

मित्रों,वैसे आपको अबतक मेरे द्वारा उठाये गए सवाल का जवाब तो मिल ही गया होगा कि अब लालू जी का क्या होने वाला है। अब लालूजी बिहार से समाप्त हो चुके हैं,उन्होंने आत्मघाती गोल मारकर अपने द एंड को सुनिश्चित कर लिया है। चुनावों में चाहे जीते कोई लालूजी ने चुनाव लड़ने से पहले ही अपनी हार सुनिश्चित कर ली है। लालू जी अब मदारी नहीं रहे जमूरा बन गए हैं जो दूसरों के इशारे पर नाचता है। लेकिन यह मेरे उस सवाल का पूरा जवाब नहीं है। पूरा उत्तर यह है कि अगले कुछ महीनों में लालू जी कदाचित फिर से जेल की शोभा बढ़ाएंगे। अब दिल्ली में उनकी माई-बाप की सरकार नहीं है जो उनको खुल्ला छोड़ देगी। जब छोटे घोटालेबाज चौटाला को चुनावों के दौरान ही जेल भेज दिया गया तो लालू जी तो बहुत ही बड़े घोटालेबाज हैं पीएचडी डिग्रीधारी।

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