देश की तरक्की के लिए तनाव का माहौल उचित नहीं

images (6)

 ललित गर्ग

कैसी विसंगतिपूर्ण साम्प्रदायिक सोच है कि जब हमारी ऊर्जा विज्ञान व पर्यावरण, शिक्षा एवं चिकित्सा के जटिल मुद्दों को सुलझाने में खर्च होनी चाहिए थी, वो ऊर्जा सांप्रदायिक ताकत को बढ़ाने के लिए खर्च हो रही है। ऐसा क्यों है?

समस्याएं अनेक हैं। बात कहां से शुरू की जाए। खो भी बहुत चुके हैं और खोने की रफ्तार तीव्र से तीव्रत्तर होती जा रही है। जिनकी भरपाई मुश्किल है। भाईचारा, सद्भाव, निष्ठा, विश्वास, करुणा यानि कि जीवन मूल्य खो रहे हैं। मूल्य अक्षर नहीं होते, संस्कार होते हैं, आचरण होते हैं। हम अपने आदर्शों एवं मूल्यों को खोते ही जा रहे हैं, एक बार फिर रामनवमी और हनुमान जयंती के अवसरों पर देश के कई प्रदेशों में हिंसा, नफरत, द्वेष और तोड़-फोड़ के दृश्य देखे गए। उत्तर भारत के प्रांतों के अलावा ऐसी घटनाएं दक्षिण और पूर्व के प्रांतों में भी हुईं। ऐसे सांप्रदायिक दंगे और खून का बहना कांग्रेस के शासन में होता रहा, लेकिन पिछले एक दशक में ऐसी हिंसात्मक साम्प्रदायिक घटनाएं पहली बार कई प्रदेशों में एक साथ हुई हैं, ऐसा होना काफी चिंता का विषय है।

उन्माद, अविश्वास, राजनैतिक अनैतिकता और दमन एवं संदेह का वातावरण एकाएक उत्पन्न हुआ है। उसे शीघ्र दूर करना होगा। ऐसी अनिश्चय और भय की स्थिति किसी भी राष्ट्र के लिए संकट की परिचायक है और इन संकटों को समाप्त करने की दृष्टि से देश के कई राज्यों में घटी सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं के मद्देनजर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ताजा फैसलों का महत्व समझा जा सकता है। योगी सख्त प्रशासक के रूप में जाने जाते हैं और उनके ताजा निर्देश इस बात की ओर इंगित करते हैं। मुख्यमंत्री योगी ने राज्य की कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठक में स्पष्ट निर्देश दिया कि नए धार्मिक जुलूसों की इजाजत न दी जाए और न ही नए धर्मस्थलों पर लाउडस्पीकर लगाने की। पारंपरिक जुलूसों और शोभायात्राओं के संदर्भ में भी उन्होंने तय मानदंडों का हर हाल में पालन कराने का निर्देश दिया है। इसमें कोई दो मत नहीं कि आस्था नितांत निजी विषय है और देश का कानून अपने सभी नागरिकों को उपासना की आजादी देता है। लेकिन आस्था जब प्रतिस्पर्धा में तब्दील होने लगे, तब वह कानून के दायरे में भी आ जाती है।
पिछली सरकारें समाधान के लिए कदम उठाने में भले ही राजनीति नफा-नुकसान के गणित को देखते हुए भय महसूस करती रही हों, उन्हें सत्ता से विमुख हो जाने का डर सताता रहा हो। लेकिन योगी और मोदी इन भयों से ऊपर उठकर कठोर एवं साहसिक निर्णय ले रहे हैं, यही कारण है कि साम्प्रदायिक नफरत, हिंसा एवं द्वेष फैलाने वाले समय रहते पृष्ठभूमि में जाते देखे गये हैं। क्योंकि यदि इस तरह के दायित्व से विमुख हुए तो देश के नागरिक युद्ध की ओर बढ़ सकते हैं। लोकतंत्र में साम्प्रदायिकता, जातीयता, हिंसा एवं अराजकता जैसे उपाय किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। इस मौलिक सत्य व सिद्धांत की जानकारी से आज का नेतृत्व वर्ग भलीभांति भिज्ञ है, यही इस राष्ट्र की एकता और अखण्डता को जीवंतता दे सकेगा।
बहुधर्मी भारतीय समाज में पूजा-इबादत की विविधता इसके सांस्कृतिक सौंदर्य का अटूट हिस्सा है और दुनिया इसकी मिसालें भी देती रही है और यही इस राष्ट्र की ताकत भी रहा है। यह विशेषता एकाएक हासिल नहीं हुई, समाज ने सहस्राब्दियों में इसको अर्जित किया है। लेकिन आजाद भारत में कतिपय राजनीतिक दलों द्वारा साम्प्रदायिक नफरत एवं द्वेष की तल्ख घटनाओं को कुरेदने की राजनीति से भाईचारे की संस्कृति को चोट पहुंचाई जा रही है। स्वार्थ एवं संकीर्णता की राजनीति से देश का चरित्र धुंधला रहा है। सत्ता के मोह ने, वोट के मोह ने शायद उनके विवेक का अपहरण कर लिया है। कहीं कोई स्वयं शेर पर सवार हो चुका है तो कहीं किसी नेवले ने सांप को पकड़ लिया है। न शेर पर से उतरते बनता है, न सांप को छोड़ते बनता है।

धरती पुत्र, जनक रक्षक, पिछड़ों के मसीहा और धर्मनिरपेक्षता के पक्षधर का मुखौटा लगाने वाले आज जन विश्वास का हनन करने लगे हैं। जनादेश की परिभाषा अपनी सुविधानुसार करने लगे हैं। कोई किसी का भाग्य विधाता नहीं होता, कोई किसी का निर्माता नहीं होता, भारतीय संस्कृति के इस मूलमंत्र को समझने की शक्ति भले ही वर्तमान के इन तथाकथित राजनीतिज्ञों में न हो, पर इस नासमझी से सत्य का अंत तो नहीं हो सकता। अंत तो उसका होता है जो सत्य का विरोधी है, अंत तो उसका होता है जो जनभावना के साथ विश्वासघात करता है। जनमत एवं जन विश्वास तो दिव्य शक्ति है। उसका उपयोग आदर्शों, सिद्धांतों और मर्यादाओं की रक्षा के लिए हो, तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति होगी। तभी होगा राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान। तभी होगी अपनत्व और विश्वास की पुनः प्रतिष्ठा। तभी साम्प्रदायिकता के अंधेरे को दूर किया जा सकेगा। वरना ईमानदारी की लक्ष्मण रेखा जिसने भी लांघी, वक्त के रावण ने उसे उठा लिया।
कैसी विडम्बना है कि इस तरह के सांप्रदायिक दंगे और हिंसात्मक घटना-क्रम का आरोप भाजपा लगाया जाता है, जबकि कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने अपने गिरते राजनीतिक वर्चस्व के कारण इन सब घटनाओं को अंजाम दिया है। भला कोई भी सत्ताधारी पार्टी ऐसे दंगों एवं साम्प्रदायिक हिंसा को अंजाम देकर अपनी शासन-व्यवस्था पर क्यों दाग लगायेगी? इस देश की बढ़ती साख एवं राष्ट्रीयता को गिराने की मंशा रखने वाले राजनीतिक दलों एवं समुदायों का यह स्थायी चरित्र बन गया है कि वे अपने राष्ट्र से भी कहीं ज्यादा महत्व अपने स्वार्थ, अपनी जात और अपने मज़हब को देते हैं। 1947 के बाद जिस नए शक्तिशाली और एकात्म राष्ट्र का हमें निर्माण करना था, उस सपने का इन संकीर्ण एवं साम्प्रदायिक दलों की राजनीति ने चूरा-चूरा कर दिया। थोक वोट के लालच में सभी राजनीतिक दल जातिवाद और सांप्रदायिकता का सहारा लेने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। जो कोई अपनी जात और मजहब को बनाए रखना चाहते हैं, उन्हें उसकी पूरी आजादी होनी चाहिए लेकिन उनके नाम पर घृणा फैलाना, ऊँच-नीच को बढ़ाना, दंगे और तोड़-फोड़ करना कहां तक उचित है? यही प्रवृत्ति देश में पनपती रही तो भौगोलिक दृष्टि से तो भारत एक ही रहेगा लेकिन मानसिक दृष्टि से उसके टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे। यह खंड-खंड में बंटा भारत क्या कभी महाशक्ति बन सकेगा? क्या वह अपनी गरीबी दूर कर सकेगा? क्या वह विकास योजनाओं को आकार दे सकेगा?
बेहतर तो यही होता कि सभी धर्मों के शीर्ष लोग मिलते और ऐसी मिसालें पेश करते कि साम्प्रदायिक दंगों की नयी पनपती विकृति विराम लेती। वे अपने-अपने समुदाय का मार्गदर्शन करते, मगर जब राष्ट्र से ज्यादा वजनी सम्प्रदाय हो जाये, सांप्रदायिक दुराव शांति-व्यवस्था के लिए खतरा जाये, तो राज्य-सत्ता का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। ऐसा करना सरकर एवं प्रशासन का दायित्व भी है और जरूरत भी। देश को समग्र तरक्की के लिए शांत भारत चाहिए। दंगे और तनाव उसकी खुशहाली व प्रतिष्ठा को ग्रहण ही लगाएंगे। ऐसे में सशक्त भारत-विकासशील भारत का सपना आकार कैसे ले सकेगा?  
कैसी विसंगतिपूर्ण साम्प्रदायिक सोच है कि जब हमारी ऊर्जा विज्ञान व पर्यावरण, शिक्षा एवं चिकित्सा के जटिल मुद्दों को सुलझाने में खर्च होनी चाहिए थी, वो ऊर्जा सांप्रदायिक ताकत को बढ़ाने के लिए खर्च हो रही है। ऐसा क्यों है? यह दूषित एवं संकीर्ण राजनीति एवं तथाकथित सम्प्रदायों के आग्रहों-पूर्वाग्रहों का परिणाम है। किसी भी धार्मिक जुलूस या शोभायात्रा के मार्ग, समय-अवधि या इसमें शिरकत करने वाले श्रद्धालुओं के संख्याबल को लेकर पुलिस की अपनी नियमावली है। यदि इसका ईमानदारी से पालन हो, तो न ट्रैफिक की समस्या हो सकती है और न सामाजिक माहौल बिगड़़ सकता है, पर अक्सर इसकी अनदेखी होती है, जैसा कि जहांगीरपुरी विवाद में बताया जा रहा है। मुख्यमंत्री योगी का उत्तर प्रदेश में इसे सख्ती से लागू करने और पारंपरिक जुलूसों व शोभायात्राओं से पहले सभी धर्मों के सम्मानित गुरुओं की बैठकें करने का निर्देश टकराव टालने में अहम साबित होगा। प्रशासन को शोभायात्राओं में घातक हथियारों के प्रदर्शन के मामले में भी कठोर निगरानी करनी चाहिए। इसी तरह, मौजूदा यांत्रिक युग में अब बहुत ऊंची आवाज लगाने की आवश्यकता भी नहीं बची है। साम्प्रदायिक आग्रह-पूर्वाग्रह जब जीवन का आवश्यक अंग बन जाता है तब पूरी पीढ़ी शाप को झेलती, सहती और शर्मसार होकर लम्बे समय तक बर्दाश्त करती है। साम्प्रदायिक आग्रह-पूर्वाग्रह के इतिहास को गर्व से नहीं, शर्म से पढ़ा जाता है। आज हमें झण्डे, तलवारें और नारे नहीं सत्य की पुनः प्रतिष्ठा चाहिए।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
hititbet
hititbet
Tuzla İpek Kirpik
betnano
hititbet giriş
hititbet
betnano
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betkom giriş
betkom giriş
grandpashabet
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş