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स्वर्णिम इतिहास

भारत और नेपाल का कालांतर में एक साझा इतिहास रहा है

प्रह्लाद सबनानी

नेपाल एक बहुत खूबसूरत दक्षिण एशियाई राष्ट्र है। नेपाल के उत्तर मे तिब्बत है तो इसके दक्षिण, पूर्व व पश्चिम में भारत की सीमाएं लगती हैं। नेपाल के 81.3 प्रतिशत नागरिक सनातन हिन्दू धर्म को मानते है। नेपाल पूरे विश्व में प्रतिशत के आधार पर सबसे बड़ा हिन्दू धर्मावलम्बी राष्ट्र है। नेपाल की राजभाषा नेपाली है और नेपाल के निवासियों को नेपाली कहा जाता है। वर्तमान नेपाली भू-भाग अठारहवीं शताब्दी में गोरखा के शाह वंशीय राजा पृथ्वी नारायण शाह द्वारा संगठित नेपाल राज्य का एक हिस्सा है। नेपाल की अंग्रेजों के साथ हुई तात्कालीन विभिन्न सन्धियों के अंतर्गत नेपाल को वर्ष 1814 में एक तिहाई नेपाली क्षेत्र ब्रिटिश इण्डिया को देना पड़ा था और आज इस क्षेत्र का भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल में विलय हो चुका है।
ऐसा कहा जाता है कि नेपाल शब्द ‘ने’ नामक ऋषि तथा ‘पाल’ अर्थात गुफा से मिलकर बना है। ऐसा भी माना जाता है कि एक समय नेपाल की राजधानी काठमांडू ‘ने’ नामक ऋषि का तपस्या स्थली थी। अतः ‘ने’ नामक ऋषि द्वारा पालित होने के कारण इस भूखण्ड का नाम नेपाल पड़ा। नेपाल के पूर्णतः सनातन हिंदू धर्म से जुड़े होने के कई प्रमाण इतिहास में भी मौजूद हैं। 5,500 वर्ष ईसा पूर्व महाभारत काल में जब माता कुन्ती पुत्र पांच पाण्डव स्वर्गलोक की ओर प्रस्थान कर रहे थे उसी समय पाण्डुपुत्र भीम ने भगवान महादेव को दर्शन देने का आह्वान करते हुए विनती की थी। तभी भगवान शिवजी ने उन्हें एक लिंग के रुप में दर्शन दिये थे जो आज “पशुपतिनाथ ज्योतिर्लिंग” के नाम से पूरे विश्व के हिंदुओं के लिए एक धार्मिक आस्था का स्थल माना जाना जाता है। इसी प्रकार नेपाल स्थित जनकपुर में भगवान श्रीरामपत्नी माता सीताजी का जन्म 7,500 वर्ष ईसा पूर्व होने का जिक्र भी इतिहास में मिलता है। सिद्धार्थ गौतम (ईसापूर्व 563–483) शाक्य वंश के राजकुमार थे, उनका जन्म नेपाल के लुम्बिनी में हुआ था, जिन्होंने अपना राज-पाट त्याग कर तपस्वी का जीवन निर्वाह किया और कालांतर में वह भगवान बुद्ध बन गए थे।
नेपाल में सामाजिक जीवन की मान्यता, विश्वास और संस्कृति सनातन हिन्दू धर्म की भावना पर आधारित है। साथ ही, धार्मिक सहिष्णुता और जातिगत सहिष्णुता भी नेपाल की अपनी मौलिक संस्कृति का एक हिस्सा है। नेपाल में मनाए जाने वाले विभिन्न धार्मिक उत्सवों पर वैष्णव, शैव, बौद्ध, शाक्य आदि धर्मों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। किसी भी एक धार्मिक पर्व को धर्मावलम्बी विशेष का कह सकना और अलग कर पाना बहुत मुश्किल कार्य है। सभी धर्मावलम्बी आपस में मिल जुलकर सभी उत्सवों को उल्लासमय वातावरण में मनाते हैं।
नेपाल, मार्च 2006 तक, एक हिंदू राष्ट्र ही था और नेपाल में आज भी 80 प्रतिशत से अधिक आबादी हिंदूओं की ही है। परंतु, नेपाल में चीन की शह पर माओवादी आंदोलन की सफलता के बाद, राजनैतिक उठापटक के चलते, नवम्बर 2006 में माओवादी और सात अन्य राजनैतिक दलों के गठबंधन के बीच एक ऐतिहासिक व्यापक शांति समझौता हुआ था, जिसके परिणाम स्वरूप नेपाल में अंतरिम सरकार बनी थी और वर्ष 2006 में नेपाल में 240 वर्षों की राजशाही को समाप्त करते हुए एक अंतरिम संविधान लागू किया गया था जिसके अंतर्गत नेपाल के हिंदू राष्ट्र के दर्जे को समाप्त करते हुए इसे एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित कर दिया गया था।
हालांकि पूरे विश्व में ही सामान्यतः देश की बहुसंख्यक आबादी के धर्म के आधार पर देश को दर्जा प्रदान किया जाता है। आज पूरे विश्व में लगभग 57 देशों में इस्लाम मजहब को मानने वाले मतावलंबियों की जनसंख्या के आधार पर इन देशों ने अपने आप को मुस्लिम देश घोषित किया हुआ है। परंतु नेपाल एवं भारत में हिंदू बहुसंख्यक (लगभग 80 प्रतिशत) आबादी होने के बावजूद अपने आप को हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं कर सके हैं और इसके परिणामस्वरूप आज पूरे विश्व में एक भी हिंदू राष्ट्र नहीं है। यह निश्चित रूप से सनातन हिंदू धर्म को मानने वाली पूरे विश्व की लगभग 120 करोड़ जनसंख्या के साथ सरासर अन्याय है।
विशेष रूप से अगर नेपाल की बात की जाय तो वहां पर इस्लाम मजहब को मानने वाले मतावलंबियों की जनसंख्या मात्र 5 प्रतिशत के आसपास ही है और जब नेपाल एक हिंदू राष्ट्र था तब भी इसके हिंदू राष्ट्र होने में मुस्लिमों को कोई आपत्ति नहीं थी एवं अब जब नेपाल को एक बार पुनः हिंदू राष्ट्र बनाए की मांग जोर पकड़ने लगी है तब भी मुस्लिमों को कोई आपत्ति नहीं है। नेपाल में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, यहां मुस्लिम आबादी 11 लाख 62 हजार 370 है। यह संख्या नेपाल की कुल आबादी का केवल चार से पांच प्रतिशत के बीच है। अभी नेपाल की कुल आबादी 2 करोड़ 86 लाख है। नेपाल के 97 प्रतिशत मुसलमान तराई क्षेत्र में रहते हैं और तीन प्रतिशत काठमांडू के अलावा पश्चिमी पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। नेपाल में तराई क्षेत्र की कुल आबादी का 10 प्रतिशत हिस्सा मुसलमानों का है।
साथ ही साथ, नेपाल में अब राजतंत्र की वापसी की मांग भी लगातार जोर पकड़ती जा रही है। इसके लिए नेपाल में वहां की जनता द्वारा हजारों की संख्या में बाकायदा जोरदार प्रदर्शन किए जा रहे हैं। नेपाल में राजनीतिक दलों का भी अब कहना है कि देश में लोकतंत्र की रक्षा तथा राजनीतिक स्थिरता के लिए संवैधानिक राजशाही तथा हिंदू राष्ट्र की बहाली के अलावा कोई विकल्प नहीं है। फिर नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र घोषित क्यों नहीं किया जाना चाहिए।
दरअसल नेपाल की राजनीति वहां की वामपंथी विचारधारा वाले दलों एवं अन्य दलों के इर्द गिर्द घूमती रहती है। वामपंथी विचारधारा वाले दलों को चीन से जबरदस्त समर्थन प्राप्त होता है और जब भी वामपंथी विचारधारा वाले दलों को नेपाल में बहुमत प्राप्त होता है वे राजशाही को समाप्त कर नेपाल को एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाए रखने की बात करते रहते हैं। नेपाल का हिंदू राष्ट्र का दर्जा भी इसी विचारधारा के अंतर्गत समाप्त कर दिया गया था। साथ ही, नेपाल यदा कदा चीन की शह पाकर भारत विरोधी रूख भी अपना लेता है। पूर्व में भी ऐसा कई बार हो चुका है, विशेष रूप से जब जब वहां वामपंथी विचारधारा वाले दलों को सत्ता प्राप्त हुई है।
हाल ही में वर्ष 2018 में भी नेपाल के प्रधानमंत्री श्री केपी शर्मा ओली और पूर्व प्रधानमंत्री श्री पुष्प कमल दहल प्रचंड की पार्टी द्वारा मिलकर एकीकृत कम्युनिस्ट पार्टी बनाई गई थी और ऐसा कहा जाता है कि दोनों दलों को एक करने में चीन ने बड़ी भूमिका निभाई थी। परंतु दो साल बाद ही दोनों दलों के रास्ते अलग अलग हो चुके हैं। कुल मिलाकर चीन के सहयोग से नेपाल में राजनैतिक उठापटक के चलते ही नेपाल का हिंदू राष्ट्र का दर्जा समाप्त किया गया था।
परंतु अब वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन इंटरनेशनल की सचिव अस्मिता भंडारी का कहना है कि नेपाल की एक पुरानी संस्कृति है। सनातन से नेपाल एक हिंदू राष्ट्र रहा है। नेपाल में हिंदू राजा ही राज्य करते रहे हैं और उस दौर में देश में नागरिक बहुत सुखी एवं सम्पन्न रहते थे। अब तो नेपाल के विभिन्न हिंदू संगठनों के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी भी लोकतंत्र की बजाए हिंदू राष्ट्र का ही समर्थन कर रही है। इस प्रकार विभिन्न राजनैतिक दल भी अब नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र बनाए जाने का पुरजोर समर्थन कर रहे हैं। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेता श्री दीपक भंडारी का कहना है कि नेपाल में चूंकि 82 प्रतिशत आबादी हिन्दुओं की है अतः नेपाल को पुनः हिंदू राष्ट्र बनाया जाना चाहिए। नेपाल की पूरे विश्व में पहचान भी एक हिंदू राष्ट्र के रूप में ही रही है। परंतु नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी अभी भी नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाए जाने का विरोद्ध कर रही है और उनका कहना है कि नेपाल में हम सभी धर्मों को बराबरी का दर्जा देते है और कुछ लोग हिंदुत्व के बहाने दोबारा से नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं, इसका हम पुरजोर विरोद्ध करते हैं।
नेपाल का पुनः एक हिंदू राष्ट्र बनना भारत के भी हित में हैं क्योंकि एक तो इससे नेपाल में किसी भी राजनैतिक दल के लिए भारत विरोधी रूख अपनाना आसान नहीं होगा। दूसरे, भारत और नेपाल का कालांतर में एक तरह से साझा इतिहास रहा है तथा दोनों देशों की सांस्कृतिक विरासत भी एक ही है तो इसके चलते नेपाल एक हिंदू राष्ट्र के रूप में अपने आप को सदैव ही भारत के करीब महसूस करता रहेगा। तीसरे, नेपाल के पुनः हिंदू राष्ट्र बनने के बाद वह चीन को अपना करीबी मित्र बनाने में अपने आप को असहज महसूस करेगा। वैसे अब यह नेपाल को भी समझ में आने लगा है कि उसके आर्थिक एवं राजनैतिक हित भारत से अच्छे सम्बंध बनाए रखने में ही सधे रहेंगे न कि चीन के साथ अपनी मित्रता बढ़ाने से। चीन ने अभी हाल ही में जिस प्रकार श्रीलंका को आर्थिक परेशानी में डाल दिया है, इसको देखकर अब नेपाल भी सचेत होता दिखता है।

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