Categories
राजनीति

आपातकाल की आपदाओं की आपबीती व्यथा-कथा

emergency-in-india-300x155हिमाचल में इससे भी ज्यादा क्रूर व्यवहार भारतीय मजदूर संघ के प्यारे लाल बेरी के साथ किया गया था। शांता कुमार, दौलतराम चौहान, कंवर दुर्गा चंद, किशोरी लाल सब सलाखों के पीछे पहुंच गए थे। उधर फिरोजपुर से जब पुलिस हमें पेशी के लिए जालंधर लेकर आती थी तो एक बुजुर्ग सिपाही हमें समझाता रहता था कि इस उम्र में हमें जेबकतरे का घटिया काम नहीं करना चाहिए, कोई और काम करना चाहिए। शायद पुलिस ने हम पर जेब कतरने का केस दर्ज किया होगा। हम उसको बहुत समझाते कि हम जेबकतरे नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक कैदी हैं जो देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए लड़ रहे हैंज्आपातकाल की घोषणा 25 जून, 1975 को हुई थी। रेडियो पर खबर आई होगी। मैंने तो नहीं सुनी थी, लेकिन सतीश ने सुन ली थी। मैं उन दिनों भारतीय जनसंघ का जिला स्तर का अधिकारी था। सतीश के पास भी मंडल स्तर की कोई जिम्मेदारी थी। जयप्रकाश नारायण ने सरकार के खिलाफ देश भर में आंदोलन छेड़ा हुआ था। उसमें उस समय के भारतीय जनसंघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ही जबरदस्त भागीदारी थी। उसी समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उस समय की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का चुनाव भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते रद्द कर दिया। इंदिरा गांधी ने उच्च न्यायालय के इस प्रश्न का जवाब देश में आपात स्थिति की घोषणा से दिया। खैर सतीश ने ही मुझे आकर बताया कि आपातकाल की घोषणा हो गई है, लेकिन इसका क्या अर्थ है, इसका आभास न मुझे हुआ और न ही उसे। बंगा के समीप मुकंदपुर छोटा सा गांव है। आपात स्थिति का विरोध करना जरूरी है, इसके लिए पार्टी के निर्देश की प्रतीक्षा की जरूरत नहीं थी। विरोध करने का हमने अपने गांव में एक तरीका विकसित कर रखा था। गांव में लाला हरिदेव केसर मंडल कांग्रेस के प्रधान थे। बाजार में उनकी कपड़े की दुकान थी। हम सब इक_े होकर उनकी दुकान के सामने कुछ समय के लिए प्रदर्शन और भाषणबाजी करते थे। मैंने 25 जून की रात्रि को ही कार्यकर्ताओं को बता दिया कि प्रदर्शन के बारे में गांव की दीवारों पर चाक से नारे लिख दिए जाएं। 26 जून को दस बजे प्रदर्शन निश्चित हो गया। लेकिन सुबह होते-होते मुझे आपात स्थिति क्या है, इसका कुछ-कुछ अंदाजा भी हो गया था। रेडियो खबरें दे रहा था कि जयप्रकाश समेत सभी प्रमुख विरोध करने वाले नेता पकड़ लिए गए हैं। जयप्रकाश नारायण को भी कोई पकड़ कर जेल में डाल सकता है, ऐसा उस समय हम सोच भी नहीं सकते थे। लेकिन प्रदर्शन की घोषणा तो हो चुकी थी। हरिदेव की दुकान के आगे प्रदर्शन हुआ। मैंने भाषण दिया। आधे घंटे में रैली खत्म हो गई। शायद आपातकाल का क्या अर्थ है, इसका अंदाजा हरिदेव केसर को भी नहीं था। लेकिन लगभग दो घंटे बाद हरिदेव ने मुझे संदेश भेजकर घर से बुलवाया और बताया कि बंगा थाना से संदेश आया है कि पुलिस मुझे गिरफ्तार करने के लिए आ रही है। आपातकाल में सरकार के खिलाफ बोलना भी गुनाह की श्रेणी में आ गया था। मेरे सामने समस्या खड़ी हो गई कि मैं कहां जाऊं? हमारे गांव का ही एक लडक़ा सुभाष पराशर दिल्ली अपनी मासी के पास कुछ दिनों के लिए गया हुआ था। मैंने उनके घर से उसका पता लिया, लेकिन दिल्ली जाने के लिए पैसे भी तो चाहिए थे। मैंने हरिदेव केसर से ही दो सौ रुपए उधार लिए और पुलिस के आने से पहले ही दिल्ली के लिए रवाना हो गया। आपात स्थिति का क्या अर्थ है, यह सबसे पहले दिल्ली आकर ही पता चला। उन दिनों दिल्ली आना यानी सांप के मुंह में हाथ डालना था। सुभाष की मासी का घर शायद सरोजिनी नगर  या ऐसे ही किसी स्थान के कूचों में था। दो-तीन दिन बाद ही सुभाष को चिंता होने लगी, क्योंकि किसी घर में कौन नया मेहमान आया है, ऐसी सूचना पुलिस अपने माध्यमों से पता कर रही थी और फिर नए मेहमान की पूरी जन्मपत्री की छानबीन की जाती थी। गृहपति मेहमाननबाजी करता-करता किसी संकट में न फंस जाए, यह सोच कर मैं और सुभाष दोनों ही वहां से रुखसत हो लिए। दिल्ली सचमुच एक बहुत बड़ी जेल में तबदील हो चुका था। अलबत्ता इसका इतना असर जरूर हुआ था कि हमारे गांव में भी चाय बेचने वाले ने चाय का कप आठ आने का कर दिया था। बाद की कहानी लंबी है। जल्दी ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आपातकाल के विरोध में सत्याग्रह शुरू कर दिया था।

मैं, हरीश कुमार और सतीश कुमार तीनों ही डीएवी कालेज जालंधर के आगे सत्याग्रह करते हुए गिरफ्तार हो गए। पुलिस कोतवाली ले गई और थाने में हवालात का क्या अर्थ होता है, यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। हमने सर्दियों में सत्याग्रह किया था और हवालात  में गर्मी हो या सर्दी दरवाजा नहीं होता, खुली सलाखें होती हैं। कई दिन का मलमूत्र वहीं जमा रहता है। रात को सर्दी में क्या हालत होती होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। उसके बाद जालंधर जेल में और कुछ दिन बाद फिरोजपुर जेल में रहे। फिरोजपुर जेल में मित्रसेन भी थे। लुधियाना के प्रतिष्ठित उद्योगपति। पुलिस ने उन पर केस दर्ज किया था, किसी की भैंस चुराने का। भैंस का पता लगाने के लिए पुलिस ने उनकी पैंट में चूहे छोड़ कर नीचे से पैंट को बांध दिया था। हिमाचल में इससे भी ज्यादा क्रूर व्यवहार भारतीय मजदूर संघ के प्यारे लाल बेरी के साथ किया गया था। शांता कुमार, दौलतराम चौहान, कंवर दुर्गा चंद, किशोरी लाल सब सलाखों के पीछे पहुंच गए थे। उधर फिरोजपुर से जब पुलिस हमें पेशी के लिए जालंधर लेकर आती थी तो एक बुजुर्ग सिपाही हमें समझाता रहता था कि इस उम्र में हमें जेबकतरे का घटिया काम नहीं करना चाहिए, कोई और काम करना चाहिए।

शायद पुलिस ने हम पर जेब कतरने का केस दर्ज किया होगा। हम उसको बहुत समझाते कि हम जेबकतरे नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक कैदी हैं जो देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन उसका मानना था कि सभी जेबकतरे ऐसी ही बातें करते हैं और मैं तो इस बिरादरी पर कभी विश्वास कर ही नहीं सकता। विश्वास न करने का कारण यह था कि जब वह अमृतसर में तैनात था और किसी जेबकतरे को रंगे हाथों पकड़ लेता था तो थाने आकर वह जेबकतरने वाला मिन्नतें करता था। वह पैर पकड़ता था और दूसरे दिन घंटाघर चौक में मिलने का वादा करता था। दूसरे दिन यह सिपाही घंटाघर में उस जेबकतरे का लंबा इंतजार करता रहता, लेकिन वह कंबख्त आता ही नहीं था। इसलिए इस सिपाही का जेबकतरों पर से विश्वास उठ गया था। मैंने सिपाही से पूछा कि आप जेबकतरे का घंटाघर पर इंतजार करते क्यों थे? दरअसल जेबकतरा सिपाही को बताता था कि इस समय तो उसके पास पैसे नहीं हैं, लेकिन कल वह इतने बजे घंटाघर पर उसे पैसे दे देगा। सौदा पट जाता था और सिपाही जेबकतरे को छोड़ कर दूसरे दिन पैसा लेने घंटाघर पहुंच जाता था। इस प्रकार वह कई जेबकतरों से धोखा खा चुका था और अब जेबकतरों की किसी भी बात पर विश्वास नहीं करता था। ठीक भी है। दूध का जला छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। वह हमें बार-बार यह तो कहता रहता था कि तुम मेरे बच्चों जैसे हो, इसलिए यह जेबकतरे का काम छोड़ दो। लेकिन इस बात पर विश्वास करने को तैयार नहीं था कि हम राजनीतिक कैदी हैं, लेकिन पुलिस तो पुलिस है। पुलिसिया चश्मा लगने के बाद तो पूरी दुनिया चोर उचक्कों से भरी पड़ी दिखती है। जो सबसे कमजोर किस्म का अपराधी होता है, जिसमें थोड़ी सज्जनता दिखती है, पुलिस उसे स्वाभाविक रूप से जेबकतरा मान लेती है। इसलिए हमने भी बार-बार उसका भाषण सुनने के स्थान पर उससे यह वादा करना ही ठीक समझा कि हम आगे से जेब कतरने का काम नहीं करेंगे। जेल का जीवन कैसा था, इसकी चर्चा का न समय है और न ही अखबार में स्पेस है। लेकिन मुझे अभी भी याद है जब इंदिरा गांधी हारीं तो पंजाब विश्वविद्यालय के होस्टलों में सारी रात ढोल बजते रहे थे। उनकी आवाज आज भी मेरे कानों में गूंज रही है।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
kralbet
betnano
betnano
betnano
kralbet
kralbet
kralbet
setrabet
setrabet
kralbet
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla Lenf Drenaj
Kolaybet Giriş
Betgaranti Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
Hititbet Giriş
kralbet
betnano
kralbet
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
meritking giriş
matbet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
kralbet
kralbet
betnano
betnano
kralbet
kralbet
imajbet giriş
xslot giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
betvole giriş
gobahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
sahabet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
grandpashabet
grandpashabet
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
xslot giriş
sahabet
sahabet
xslot giriş
xslot giriş
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
kralbet
kralbet
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş