vijender-singh-aryaमंजिल पर पहुंचे वही, जिनके चित में चाव
गतांक से आगे….
सन्तमत और लोकमत,
कभी न होवें एक।
अवसर खोकै समझते,
बात कहै था नेक।। 632 ।।

कैसी विडम्बना है? वर्तमान जब अतीत बन जाता है तो व्यक्ति की तब समझ में आता है कि मैं तत्क्षण कितना सही अथवा कितना गलत था? ठीक इसी प्रकार यह संसार सत्पुरूषों की बात को उनके जीते जी मान्यता देने की अपेक्षा आलोचना अधिक करता है। यहां तक कि उनका परिवार, समाज और राष्ट्र उन्हें उपेक्षित और अपमानित भी करता है, तरह-तरह के ताने कसता है, मनोबल गिराने का कुत्सित प्रयास भी करता है। किंतु उस सत्पुरूष के इस संसार से चले जाने के बाद जब उसके चिंतन को, उसकी प्रेरणा को, सत्संकल्प को अथवा कल्याणकारी विचारधारा को यह संसार समझ पाता है तो सिर धुनकर पछताता है, और सहज भाव से कहता है-वह बहुत ऊंची आत्मा थी। काश! हम उसे समझ पाते। यहां तक कि फिर उसकी प्रशंसा में कसीदे पढ़ते हैं, उसको महिमा मंडित करते हैं, उसकी मजार पर फूल चढ़ाते हैं, नतमस्तक होते हैं। ऐसा है, यह निष्ठुर संसार। उदाहरण एक नही अनेक हैं यथा-भगवान राम, भगवान कृष्ण, महात्मा गौतमबुद्घ, महात्मा गांधी, महर्षि देव दयानंद सरस्वती इत्यादि।

वेदमत और राजमत,
धु्रवों की तरह दूर।
इनके मिलन से हो धरा,
सुख शांति से भरपूर ।। 633 ।।

जिस प्रकार कोई कंपनी अपने उत्पाद का उपयोग करने के लिए उसके साथ संकेतिका अथवा ढ्ढठ्ठस्रद्बष्ड्डह्लद्बशठ्ठ क्चशशद्म देती है, ठीक इसी प्रकार परम पिता परमात्मा की बनायी सृष्टि में उसकी सर्वोत्तम कृति-मनुष्य है। इसलिए परमपिता परमात्मा ने भी मनुष्य को जीवन का सदुपयोग कैसे हो? इसके लिए संकेतिका देकर भेजा है जिसे वेद कहते हैं।
वेद ईश्वरीय ज्ञान है, इसकी विचारधारा को वेदमत कहते हैं। राजमत से अभिप्राय है राजनीति से। इन दोनों का मानवीय जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। कैसी विडंबना है? इन दोनों में फासला उत्तरी धु्रव और दक्षिणी धु्रव की तरह है। काश! ये दोनों व्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक हो जाएं तो यह पृथ्वी स्वर्ग बन जाए, तरह तरह के विवाद और युद्घ समाप्त हो जायें।
यदि हम सच्चे अर्थों में अमृत पुत्र बन जायें, ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्घांत को अपनायें, जीओ और जीने दो, के नियम को अपने आचरण में लायें तो वास्तव में यह पृथ्वी शांति से ओत प्रोत हो जाए। यदि राजमत अर्थात राजनीति में ‘वेदमत’ अर्थात अध्यात्म का समावेश हो जाए तो इस संसार से अज्ञान, अभाव, अन्याय, अत्याचार, भ्रष्टाचार, समाप्त हो जाएं तथा ‘जंगलराज’ अथवा मत्स्यराज भी समाप्त हो जाए। क्रू रता पर, सत्य, प्रेम करूणा और उदारता का अधिपत्य हो जाए।
राक्षसी प्रवृत्तियों पर दैवीय प्रवृतियों का साम्राज्य हो जाए।
संक्षिप्त सरल और सरस शब्दों में कहें तो दानवता पर मानवता की जीत हो जाए और आणविक अस्त्र शस्त्रों का सम्भावित भयंकर युद्घ भी टल जाए, जिससे यह हंसती खेलती सृष्टि महाविनाश से बच जाए।

रूचि से वृद्घि बुद्घि की,
परिष्कृत करता ज्ञान।
आचरण की शुद्घि से,
व्यक्ति बनै महान ।। 634 ।।

तन की शुद्घ जल करै,
हृदय की सदभाव।
मंजिल पर पहुंचे वही,
जिनके चित में चाव ।। 635 ।।

चाव से अभिप्राय उत्साह की निरंतरता से है हौंसले से है।
क्रमश:

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