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नदियों के नाम
जिन शब्दों से यहां लोक की नदियां पुकारी जाती हैं, वेदों में उन्हीं शब्दों के कई अर्थ होते हैं। उन शब्दों का जो धात्वर्थ है, वह चलने वाला-बहने वाला-वेगवाला आदि होता है। नदियां भी इसी प्रकार का गुण रखती हैं। वे भी चलने वाली, बहने वाली और वेगवाली होती हैं, इसीलिए लोक में वे शब्द केवल नदियों के ही लिए रूढ़ हो गये हैं, किंतु वेद में उन शब्दों से किरण, नदी, वाणी आदि अनेक भावों का वर्णन किया गया है, पर जिन लोगों को वेद में परिश्रम करना मंजूर नही है, वे दूसरे भावों को निकालने का कष्ट न करके नदी अर्थ करके ही छुट्टी पा जाते हैं।
वेद में गंगा-यमुना और सरस्वती आदि नामों के आ जाने मात्र से संयुक्त प्रांत में बहने वाली उक्त नदियों का वर्णन बताना बहुत ही सरल प्रतीत होता है, पर जिन मंत्रों में नदियों का वर्णन बतलाया जाता है, उन्हीं मंत्रों में नदीवाची शब्दों के अतिरिक्त जो अनेक चमत्कारिक शब्द आते हैं (जिनमें आकाश अथवा मनुष्य शरीर से संबंध रखने वाली बातें हैं) उन वर्णन नही किंतु आलस और बेपरवाही का चित्र है। लेखकों ने यह भी ध्यान नही रखा कि इनको पढक़र लोग क्या कहेंगे?
आगे हम कुछ मंत्रों के वे अंश उद्धृत करके दिखलाना चाहते हैं, जिनमें नदीवाची और चमत्कारपूर्ण शब्दों का दिग्दर्शन होता है। हम उचित समझते हैं कि इस विषय में अपने उस सिद्घांत की फिर याद करा दें, जिसमें हमने बतलाया है कि पौराणिक काल में चमत्कारिक वर्णनों के साथ ऐतिहासिक वर्णनों का सम्मिश्रण हुआ है, अतएव उस को लक्ष्य में रख करके ही समस्त वर्णन पढऩा चाहिए।
गंगा और यमुना के लिए प्रसिद्घ है कि गंगा विष्णु के चरण से निकली है और यमुना सूर्य की कन्या है। इदं विष्णुर्विचक्रमे आदि मंत्रों से सिद्घ हो चुका है कि वेद का विष्णु सूर्य के सिवा और कुछ नही है। जब गंगा और यमुना का संबंध सूर्य से है तो वे संयुक्तप्रांत में बहने वाली नदियां नही हो सकतीं। अमरकोश में लिखा है कि-
गंगा विष्णुपदी जहनुतनयासुरनिम्नगा।
भागीरथी त्रिपथगा त्रिस्रोता भीष्मसूरपि।।
अर्थात गंगा का नाम विष्णुपदी है, निम्नगा अर्थात नीचे जाने वाली है और तीन रास्तों तथा तीन स्रोतों वाली है। विष्णु सूर्य है। सूर्य के पैर से गंगा निकली है और नीचे जाने वाली है। यमुना के लिए भी लिखा है कि कालिंदी सूर्यतनया यमुना शमनस्वा अर्थात यमुना और सूर्यतनया एक ही वस्तु है। सूर्य से उत्पन्न होने वाली ये दोनों क्या सूर्य की किरणें नही हैं? अश्विनी नदी के लिए ऋग्वेद 4/17/15 में लिखा है कि अस्विन्यां यजमानो न होता। अर्थात अश्विनी का संबंध यज्ञ से है। दूसरी जगह ऋग्वेद 4/21/14 में लिखा है कि यो वायुना यजति गोमतीषु अर्थात जो वायु द्वारा गोमती में होम करता है। तीसरी जगह ऋग्वेद 10/17/9 में है कि सरस्वती यां पितरो हवंते अर्थात उस सरस्वती को जिसमें पितर हवन करते हैं। यहां से तीनों नदियां यज्ञ और हवन से संबंध रखने वाली हैं, इसलिए स्पष्ट ही वे किरण की बोधक हैं। वेद में सूर्य की दश रश्मियों का वर्णन है। ऋग्वेद 8/72/8 में खेदया और ऋग्वेद 9/97/23 में रश्मिभिर्दशाभि: आया है। दूसरी जगह ऋग्वेद 10/27/16 में है दशानां मेकं कपिलं अर्थात इन दश में एक का नाम कपिल है। शेष नव के लिए जो नाम आए हैं, वे वही गंगा यमुना आदि हैं यथा-
इमं मे गंगे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परूष्णि आ।
अस्धिन्या मरूदवृधे वितस्तया आर्जीकीये शृणुहि आ सुषोमया।।
अर्थात गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री, परूष्णी, अश्विनी, मरूद्ववृधा, वितस्ता और आर्जिकीया आदि सोम से संबंध रखती हैं। वे गंगा आदि नाम उक्त नव किरणों के हैं, दशवीं किरण कपिल कहलाती है। अन्य स्थान में इनके नव नाम ही गिनाये गये हैं।
इन दशों के लिए ऋग्वेद 5/47/4 में कहा है कि दशा गर्भ चरसे घापयन्ते अर्थात उक्त दशों पृथ्वी में गर्भ धारण करती है। सूर्य की दश किरणें पृथ्वी पर आकर गर्भ भर्ग प्रकाश को देती है। इन्हीं दश किरणों को सूर्य के दस पुत्र भी कहा गया है जो पृथ्वी में पैदा होते हैं। वह प्रसिद्घ मंत्र यह है।
क्रमश:

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