सत्यार्थ प्रकाश ने विधर्मी ईसाई होने से बचाया था


डॉ. विवेक आर्य

सठियाला गांव, जिला अमृतसर के रहने वाले डॉ विश्वनाथ जी बोताला में प्रतिदिन पढ़ने जाया करते थे। वहां एक ईसाई मिशनरी रहता था, जो ईसाई मत का खूब प्रचार करता था। स्कूल के विद्यार्थियों को वह सदा रिझाने की फिराक़ में रहता था। वह विद्यार्थियों में बाइबिल की कहानियां सुनाने , छोटे छोटे ट्रैक्ट बाँटने के चक्कर में हिन्दू धर्म के विरुद्ध उपदेश करता था। डॉ विश्वनाथ जी “मैं आर्यसमाजी कैसे बना?” नामक ग्रन्थ में लिखते है-
“मुझे भी उस मिशनरी ने कई ट्रैक्ट पढ़ने को दिए तथा एक प्रति बाइबिल की भी दी। मैंने बाइबिल को बड़े ध्यान से पढ़ा। उसको पढ़ने से मेरे विचारों में परिवर्तन होने लगा एवं मुझे हिन्दू धर्म से घृणा होने लगी। मैं उस इसे मिशनरी से हर रोज वार्तालाप किया करता था। मेरे विचारों में परिवर्तन देख कर ईसाई मिशनरी ने मुझे कहा कि आप दीनानगर चलें, मैं आपकी हर प्रकार से सहायता करूँगा। मैंने दूसरे दिन विचार कर उत्तर देना मान लिया।
दूसरे दिन प्रातः मुझे बोताला की तरफ आते हुए एक साधु मिले। उन्होंने मुझसे पूछा- तुम कहाँ जा रहे हो? मैंने कहा मैं स्कूल जा रहा हूँ। उन्होंने फिर मुझसे पूछा कि पढ़कर क्या करोगे? मैंने उत्तर दिया कि सांसारिक ज्ञान प्राप्त हो जायेगा। मैंने साधु का नाम पूछा। उन्होंने अपना नाम स्वामी योगेन्दर पाल बताया और कहा की उनके गुरु का नाम स्वामी दयानंद है। उन्होंने मुझसे पूछा की क्या मैंने स्वामी दयानंद नाम का नाम सुना है? मैंने कहा नहीं। फिर उन्होंने कहा तुम्हारे स्कूल पहुंचने का समय हो गया है ,तुम मुझे चार बजे साँय मिलना। मैं स्वामी जी से साँय को चार बजे मिला तो उन्होंने कहा तुम्हारे विचार अच्छे है। मैं तुम्हें उपदेश देता हूँ कि प्रतिदिन सत्यार्थ प्रकाश पढ़ा करो और सच्चे दिल से इसकी प्रतिज्ञा करो। मैंने सत्यार्थ प्रकाश को पढ़ने की प्रतिज्ञा की और इस ग्रन्थ रत्न को अनेक बार पढ़ा। सत्यार्थ प्रकाश के पाठ से मेले सारे सन्देहों की निवृति हो गई और जिस बाइबिल से मुझे प्रेम था, उस पर मेरा विश्वास न रहा। मैंने बाइबिल की असत्य मान्यताओं का खंडन और वेद की सत्य सिद्धांतों का मंडन प्रारम्भ कर दिया। स्वामी योगेन्दरपाल जी की कृपा से सत्यार्थ प्रकाश पढ़कर मैं दृढ़ वैदिक धर्मी बन गया और ईसाई होने से बच गया। ”
मैं जीवन भर स्वामी दयानंद के उपकार का ऋणी रहूँगा।

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