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बिखरे मोती

बिखरे मोती भाग-56

आदर मिले न खैरात में, चाहता हर इंसान
गतांक से आगे….
आदर मिले न खैरात में,32-720x556
चाहता हर इंसान।
गुणों के बदले में मिले,
बनना पड़ै महान ।। 636 ।।

अर्थात इस संसार में सम्मान हर व्यक्ति चाहता है किंतु यह उपहार में नही मिलता है। इसे तो आप अपने विलक्षण गुणों के द्वारा अर्जित करते हैं। इस संदर्भ में अंग्रेजी की यह कहावत बड़ी विख्यात है-

मन में होवै मोद तो,
चेहरे पर मुस्कान।
उत्साह कहीं आहत हुआ,
मायूसी पहचान ।। 637 ।।

भक्ति अगर अनन्य हो,
निरंतर और निष्काम।
रहमत अविरल बरसतीं,
बंधन कटें तमाम ।। 638 ।।

मन रहता संसार में,
तन से ले हरिनाम।
ये तो आत्मप्रवंचना,
कैसे मिलेगा धाम? ।। 639 ।।

कर्माशय से ही मिलै,
लोक और परलोक।
मोक्ष-बंध मन से मिलें,
रोक सके तो रोक ।। 640 ।।

दीया बाती तेल जब,
अलग रहें नही खास।
इन तीनों के मेल तै,
चिनगी बनै प्रकाश ।। 641 ।।

भाव यह है कि किसी को महत्वहीन अथवा छोटा न समझ, सबको प्रेम, एकता, सहयोग की डोरी में सूत्रबध करके चलें। तभी व्यक्ति, परिवार अथवा राष्ट्र उन्नति के शिखर पर पहुंचकर प्रकाशमान होता है।

मोह माया के भंवर में,
डूबोगे मंझधार।
जो डूब्यो हरि प्रेम में,
भव से उतर्यो पार ।। 642।।

स्वर्ग के साथी जब मिलें,
तो धरती बन जाए स्वर्ग।
नरक निवासी जब मिलें,
तो छिन जाता है स्वर्ग ।। 643।।

दुनिया तृप्त न हो सके,
चाहे कितना लुटाओ प्यार।
प्रेम लुटा प्रभु-नाम पर
तृप्त हो प्राणाधार ।। 644 ।।

कैसी विडम्बना है, मनुष्य अपना जीवन इस जगत को प्रसन्न करने में लगा देता है, किंतु फिर भी ये दुनिया तृप्त नही होती। अंततोगत्वा बेटा अपने बाप से कहता है, मित्र मित्र से कहता है, पत्नी पति से कहती है-‘‘हमारे लिए आपने किया क्या है?’’ ये दुनिया ऐसी है, भगवान राम और कृष्ण को भी गाली देती है। उनसे भी यह तृप्त न हो सकी, हम तो किस खेत की मूली हैं? काश! मनुष्य अपने प्रेम की बहुमूल्य ऊर्जा को प्रभु भक्ति में लगाये तो संभव है कि प्रभु प्रसन्न हो जाएं, तृप्त हो जाएं और हमारे भवबंधन कट जाएं।

वाक चातुर्य व्यर्थ है,
गर वाकसंयम न हो।
वाणी की एक भूल से,
शौहरत दौलत खोय ।। 645 ।।

भाव यह है कि यदि वाणी में वाक चातुर्य तो है किंतु वाक संयम नही तो विद्वान व्यक्ति की विद्वत्ता खाक में मिल जाती है, और वाणी प्रभावशून्य हो जाती है। धन और यश की बर्बादी होती है जैसा कि महाभारत में हुआ। इस संदर्भ में बृहदारण्यक उपनिषद का ऋृषि कहता है-‘‘वाक चातुर्य और वाकसंयम में सर्वदा समन्वय बनाकर रखें, अन्यथा इनका अंतर आपकी जीवनी नैया को डुबा भी हो सकता है। ’’ क्रमश:

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