रक्त प्रवाह रुपी जीवन नदी में आ गई प्लास्टिक!

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रसायन शास्त्र/ अभियांत्रिकी में प्लास्टिक एक क्रांतिकारी खोज मानी गई …. प्लास्टिक एक पॉलीमर अर्थात बहुलक है जिसका मतलब है कार्बनिक अणु की मजबूत लंबी लड़ी ।प्लास्टिक के विविध रूप पीवीसी सीपीवीसी पॉलिथीन ट्रैफिक्टक्लीन हमारे जीवन में इतने शामिल हो गये है ,हम सोच भी नहीं सकते इनके बगैर हमारा गुजारा कैसे होगा ?हम पूरे दिन भर में 100 से अधिक वस्तुओं को छुते हैं उनमे में से 90 फीसदी प्लास्टिक से निर्मित होती है पानी की बोतल, किराने की थैली क्रोकरी ,स्मार्टफोन ऐसी टीवी का रिमोट, कार का स्टूरियोयो, खाद्य सामग्री की पैकिंग कुछ भी वगैरा-वगैरा। इंसान ने विज्ञान के ज्ञान पर इतरा कर प्लास्टिक के सस्ते टिकाऊ हल्के नये नये प्रारूप बनाए।

अभी तक तो सब कुछ ठीक था। इंसान की फितरत के मुताबिक प्लास्टिक से पृथ्वी के गर्भ को छलनी किया। जानवरों की अंतडियो को बर्बाद कर दिया। जलचर जीवों कछुआ, मछली, नभचर परिंदों को क्या-क्या मुसीबतें नही झेलनी पड़ी कितनी ही दर्दनाक तस्वीरें हम सोशल मीडिया पर देखते थे। इंसान अपने आप को सुरक्षित मान रहा था लेकिन ब्रिटेन में हुए एक शोध जिसने पूरे चिकित्सा जगत में तहलका मचा दिया है वह मानव रक्त में प्लास्टिक को लेकर है। आप जो भी कुछ प्रकृति को देते हैं प्रकृति उसे 100 गुना वापस लौटाती है देर से ही सही लौटाती जरूर है , शोध के मुताबिक इंसान के रक्त में प्लास्टिक के सूक्ष्म कण पाए गए हैं जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है अर्थात इंसानी रक्त में प्लास्टिक आ गई है अब आएगा मजा पॉलिथीन के रूप में प्रदूषण फैला कर कितने जीव धारियों के अस्तित्व के लिए संकट पैदा कर चुका इंसान आज खुद उस संकट का शिकार हो गया है, शिकारी खुद शिकार हो गया है। अब हम सोचेंगे प्लास्टिक के सीमित उपयोग न्यूनतम उपयोग के विषय में अब तक तो कितने ही कानून बनते थे। प्लास्टिक पॉलिथीन को लेकर हम जागरूक नहीं होते थे। एक कहावत है” जिसके फटे न बिवाई ,वो क्या जाने पीर पराई” मेरा मकसद किसी को डराना नहीं है बात उस शोध की ही करते हैं ।वैज्ञानिकों को पहली बार इंसान के खून में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी के साक्ष्य मिले हैं, जो हैरान कर देने वाले हैं। यह अध्ययन साइंटिफिक जर्नल ‘एनवायरनमेंट इंटरनेशनल’ में प्रकाशित हुआ है। इसमें बताया गया है कि हमारे आसपास के वातावरण में पाए जाने वाले प्लास्टिक पार्टिकल्स का हिस्सा इंसानों के रक्त प्रवाह में भी अवशोषित हो रहा है।

खून के नमूने या सैंपल्स में प्लास्टिक आइटमों में सबसे ज्यादा सामान्य रूप से पाए जाने वाले पॉलीइथाइलीन टेरेपिथालेट (पीईटी) और स्टायरिन के पॉलीमर मिले हैं। इनके साथ ही पॉली मिथाइल मेथाक्राइलेट भी पाए गए हैं। विश्लेषण में पॉलीप्रोपाइलिन भी मिला, लेकिन उसकी मात्रा इतनी कम थी कि उसे मापा नहीं जा सका।
पीईटी आम तौर पर सोडा, पानी, दूध की बोतलों और घरेलू साफ-सफाई के पदार्थो के कंटेनर, ग्रासरी बैग, टोपी और खिलौने में एवं स्टायरिन के पॉलीमर डिस्पोजबल कटलरी, प्लास्टिक मॉडल, सीडी और डीवीडी में इस्तेमाल किए जाते हैं।

एम्सटर्डम स्थित व्रिजे यूनिवर्सिटी में पर्यावरण विषाक्तता मामलों की विशेषज्ञ हीदर लेस्ली ने बताया कि हमने यह साबित कर दिया कि हमारे शरीर में बहने वाले रक्त प्रवाह में भी प्लास्टिक मौजूद हैं।

अध्ययन करने वाली टीम ने इंसानी खून में माइक्रो और नैनोप्लास्टिक पार्टिकल्स की मौजूदगी को साबित करने के लिए एक विश्लेषणात्मक तरीका विकसित किया है। अध्ययन में शामिल किए गए 22 प्रतिभागियों के खून में प्लास्टिक के निर्माण घटकों या पॉलीमर की मौजूदगी की जांच की गई। तीन-चौथाई जांच में खून में प्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई।

इस नए अध्ययन में पाया गया कि इंसान अपने दैनिक जीवन में वातावरण से माइक्रोप्लास्टिक को अवशोषित करता है और इसकी मात्रा मापे जाने के स्तर तक पहुंच गई है।

अध्ययन में शामिल 22 प्रतिभागियों के खून के सैंपल्स में प्लास्टिक पार्टिकल्स की औसत मात्रा 1.6 माइक्रोग्राम प्रति मिलीलीटर (यूजी/एमएल) पाई गई। इस मात्रा को आम तौर पर एक हजार लीटर पानी में एक चम्मच के रूप में समझ सकते हैं।

एक चौथाई खून के सैंपल्स में पता लगाने योग्य मात्रा में प्लास्टिक पार्टिकल्स पाए गए। यूनिवर्सिटी की एनालिस्ट केमिस्ट मार्जा लैमोरी ने बताया कि यह अपने तरह का पहला डेटासेट है और इसे और विस्तार देने की आवश्यकता है, जिससे पता चल सके कि प्लास्टिक का प्रदूषण किस तरह से हमारे शरीर में दाखिल हो रहा है और यह कैसे नुकसान पहुंचा रहा है।
इससे हम यह भी पता लगा सकते हैं कि ये प्लास्टिक के कण किस तरह से सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। रिसर्च करने वाली टीम अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि इन प्लास्टिक कणों के लिए रक्त प्रवाह में शामिल होकर ऊतकों और मस्तिष्क समेत अन्य अंगों में पहुंचना कितना आसान होता है।
यह रिसर्च जहां प्लास्टिक से पैदा होने वाले गंभीर खतरे के प्रति आगाह करती है वही प्लास्टिक के विकल्प पर भी बात कर रही है ।प्लास्टिक अब हमारे खून में आ गयी है जल वायु आदि विभिन्न माध्यमों से। इंसान अब सबक सीख ले प्लास्टिक का प्राकृतिक आधारहीन विकल्प तलाशें। विकल्प तो अब तलाशने ही पड़ेगा वरना सर्वश्रेष्ठ चतुर मनुष्य के लिए कोई विकल्प नहीं बचेगा।

जैसी करनी, वैसी भरनी।
आर्य सागर खारी ✍✍✍

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