Categories
भारतीय संस्कृति

-दयानन्द सन्देश मासिक का वेदार्थ-समीक्षा विशेषांक- “पं. राजवीर शास्त्री द्वारा वर्णित महर्षि दयानन्द के वेदभाष्य की प्रमुख विशेषतायें”

ओ३म्

=========
दयानन्द सन्देश मासिक पत्रिका आर्यजगत में सिद्धान्तों की पोषक एक प्रमुख पत्रिका है। हम इसके आरम्भ काल से ही पाठक व सदस्य रहे हैं। इस पत्रिका का नवम्बर-दिसम्बर, 1976 संयुक्तांक एक विशेषांक के रूप में प्रकाशित हुआ था जिसका शीर्षक था ‘वेदार्थ-समीक्षा’। यह भी बता दें कि इस पत्रिका का प्रकाशन महान ऋषिभक्त लाला दीपचन्द आर्य जी, दिल्ली द्वारा किया जाता था तथा इस पत्रिका के सम्पादक थे वेदों के सुप्रसिद्ध विद्वान ऋषिभक्त पं. राजवीर शास्त्री जी। 206 पृष्ठों के इस पुस्तकाकार विशेषांक में पं. राजवीर शास्त्री जी के दो विस्तृत लेख तथा पं. सुदर्शनदेव आचार्य जी का एक विस्तृत लेख ‘वेद के विभिन्न विषयों पर विचार’ प्रकाशित हुआ था। पं. राजवीर शास्त्री जी के लेखों व समीक्षाओं के शीर्षक थे ‘वेदार्थ-समीक्षा’ एवं ‘ऋग्वेद-भाष्यों की समीक्षा’। पत्रिका में ऋषि दयानन्द के वेदभाष्य पर विस्तृत प्रकाश डालने के साथ उनकी वेदार्थ प्रक्रिया एवं वेदार्थ का पोषण किया गया है। आज अपनी पुरानी पत्र पत्रिकाओं एवं पुस्तकों को देखते समय यह विशेषांक हमें दृष्टिगोचर हुआ। पुस्तक में पं. राजवीर शास्त्री जी के वेदार्थ-समीक्षा शीर्षक से प्रथम लेख में ‘महर्षि दयानन्द के वेद-भाष्य की प्रमुख विशेषताएं’ देते हुए 20 विशेषतायें प्रस्तुत की गई हैं। इन्हीं विशेषताओं को हम इस लेख में प्रस्तुत कर रहे हैं। यह विशेषताएं निम्न हैं:-

1- वेद सत्य विद्याओं का पुस्तक है। इसकी पुष्टि (ऋषि दयानन्द जी ने) अपने वेद-भाष्य के द्वारा की है।
2- वेद ईश्वरीय ज्ञान है।
3- वेदों का ज्ञान सार्वभौम है और वह सृष्टि के आदि में ऋषियों को मिला।
4- ‘बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे’ इस वैशेषिक दर्शन के सूत्र के फलितार्थ का प्रबल समर्थन किया है।
5- चारों वेदों में एकेश्वरवाद का प्रतिपादन है। और वह सर्वव्यापक, निराकार तथा सच्चिदानन्द स्वरूप है।
6- वेदों के शब्द आख्यातज (यौगिक) हैं, रूढि नहीं।
7- मन्त्रों का देवता प्रतिपाद्य विषय होता है।
8- मन्त्रों के प्रारम्भ में लिखे ऋषि ऐतिहासिक पुरुष थे।
9- वेदों में अनित्य इतिहास व्यक्ति, जाति, देशादि का बिलकुल अभाव है।
10- इन्द्र सूर्यादि जड देवता उपासना के योग्य नहीं। एक परमदेव परमेश्वर ही उपासनीय है। इन्द्रादि देवों का प्रकरणानुसार ही अर्थ संगत होता है।
11- महर्षि के भाष्य का आधार प्राचीन निरुक्त ब्राह्मणादि ग्रन्थ हैं। अन्यों का आधार भगवतादि पुराण भी हैं।
12- यज्ञ श्रेष्ठतम कर्मों का नाम है। केवल आहुत्यात्मक ही यज्ञ नहीं होता। यज्ञों में पशुबलि वेदविरुद्ध है।
13- वेद पढ़ने का अधिकार मानव-मात्र को है। जैसे मानव को अन्य नेत्रादि इन्द्रियों की सहायता के लिए परमेश्वर ने सूर्यादि को बनाया, वैसे ही बुद्धि को बढ़ाने के लिए वेदो का ज्ञान दिया।
14- ऋग्वेदादि चार मूल-संहिताओं का नाम ही वेद है और वे स्वतः प्रमाण हैं।
15- वेदार्थ में भागवतादि पुराणों के सहयोग की काई आवश्यकता नही, वेदों पर पुराणों (भागवतादि) का कोई प्रभाव नहीं।
16- वेद-मन्त्रों के श्लेषादि के द्वारा अनेक अर्थ भी होते हैं। किन्तु जहां-जहां उपमालंकार है, वहां-वहां महर्षि ने एक ही अर्थ किया है। त्रिविध-प्रक्रिया के आधार पर जो विद्वान् प्रत्येक मन्त्रों के तीन प्रकार के अर्थ मानते हैं वह उनकी भ्रान्ति ही है। क्योंकि महर्षि दयानन्द ने अपने भाष्य में किसी भी मन्त्र का इस प्रकार त्रिविध प्रक्रिया से अर्थ नहीं दिखाया है। सत्यार्थप्रकाशादि अपने ग्रन्थों में महर्षि ने इस त्रिविध प्रक्रिया के विरुद्ध यह स्पष्ट लिखा है कि मन्त्रों के अर्थ प्रकरणानुसार होने चाहिए।
17- महर्षि दयानन्द ने मन्त्रार्थ ज्ञान, कर्म तथा उपासना के अनुसार यथास्थान किया है। किन्तु दूसरे भाष्यकारों ने ऐसा नहीं किया।
18- महर्षि ने मन्त्रों में पठित पदों के विशेषण-विशेष्य भाव को समझकर प्रकृति, जीव, परमेश्वरादि का वर्णन किया है। किन्तु दूसरे भाष्यकारों ने अपनी स्वयं कल्पित मान्यताओं के आधार पर या तो प्रकृति का ही वर्णन माना है अथवा ब्रह्म का ही।
19- महर्षि ने अपने भाष्य में जिस सार्वभौम वैदिक-धर्म का प्रतिपादन किया है, उसमें किसी का भी वैमत्य नहीं। परन्तु दूसरे भाष्यकारों का आश्रय करके मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्धादि मिथ्या वादों की तथा विभिन्न सम्प्रदायों की उत्पत्ति हुई है।
20- महर्षि ने वैदिक आख्यानों का सत्यार्थ सप्रमाण दिखाया है। किन्तु अन्य भाष्यकार आख्यानों को स्पष्ट नहीं कर सके। इसीलिए वेदों में इतिहास का भ्रम हुआ है।

विषय के उपसंहार में पं. राजवीर शास्त्री जी लिखते हैं कि महर्षि के वेदभाष्य की ये कुछ प्रमुख विशेषताएं दिग्दर्शन मात्र ही हैं। उनके वेद-भाष्य की पूर्ण विशेषताओं को दिखाया भी कैसे जा सकता है।

हमें वेदार्थ-समीक्षा विशेषांक की सामग्री महत्वपूर्ण प्रतीत होती है। इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन होना चाहिये जिससे यह सामग्री वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित हो सके, ऐसा हम समझते हैं।

वेदार्थ-समीक्षा संयुक्तांक के अन्त में आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली के कुछ प्रकाशनों के विज्ञापन भी हैं। इनमें से एक प्रमाण-सूची पुस्तक की जानकारी भी दी गई है। इसका विवरण देते हुए बताया गया है कि यह पुस्तक प्रमाण सूची महर्षि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश से लेकर वेदभाष्यपर्यन्त तथा समस्त जीवन चरित्रों, पत्रव्यवहार, उपदेश और शास्त्रार्थों से उद्धृत ग्रन्थों के क्रम से तथा मतवादियों के ग्रन्थों के अप्रमाण वचनों की पृथक्-पृथक् ग्रन्थ के नाम उल्लेख पूर्वक प्रकरणादि क्रम से बड़े पुरुषार्थ से यह सूची तैयार की गई है। इसकी सहायता से स्वाध्यायशील आर्य विद्वान् किसी प्रामाणिक तथा अप्रामाणिक वचन का व्याख्यान बड़ी सरलता से प्राप्त कर सकते हैं। लेखकः धर्मपाल व्याकरणाचार्य। मूल्यः सजिल्द छह रुपये। प्रकाशकः आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट।

यह महत्वपूर्ण प्रकाशन विगत अनेक वर्षों से अनुपलब्ध है। हम उन दिनों किसी कारण से इसका क्रयण कर इसे देख व पढ़ नहीं सके थे। अब हमें काफी समय से इसे देखने की इच्छा होती है। पुराने विद्वानों के संग्रह में तो यह अवश्य होगा परन्तु वर्तमान तथा भावी पाठकों के लिए यह उपलब्ध नहीं है। आर्यसमाज के किसी प्रकाशक महोदय को इस ओर ध्यान देना चाहिये और साहित्य की रक्षा तथा पाठकों के हित में इसका प्रकाशन करना चाहिये, ऐसा हम आवश्यक समझते हैं। वेदार्थ समीक्षा विशेषांक में आर्ष साहित्य प्रचार ट्रस्ट, दिल्ली के एक अन्य प्रकाशन ‘दयानन्द-यजुर्वेदभाष्य-भास्कर’ व्याख्याता पं. सुदर्शनदेव जी आचार्य, एम.ए. का विज्ञापन भी है। यह भाष्य-भास्कर टीका चार खण्डों में तथा इस पर आधारित यजुर्वेद भाषा-भाष्य दो खण्डों में प्रकाशित हुए थे। यह दोनों ग्रन्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। वर्षों से यह अनुपलब्ध एवं अप्राप्य है। इनका प्रकाशन किया जाना भी आवश्यक प्रतीत होता है। हम समझते हैं कि पुरानी पीढ़ी के विद्वानों द्वारा लिखी कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें उनके अप्राप्य हो जाने के कारण भविष्य में शायद ही उन्हें उपलब्ध हो सकेंगी।

हमने इस लेख में दयानन्द-सन्देश मासिक पत्रिका के नवम्बर-दिसम्बर, 1976 में प्रकाशित वेदार्थ-समीक्षा विशेषांक की जानकारी दी है और इसमें से महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के वेदभाष्य की प्रमुख विशेषताओं को उद्ध्त किया है। हम आशा करते हैं कि पाठक इस सामग्री से लाभान्वित होंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
savoybetting giriş
grandpashabet giriş
jojobet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
restbet giriş
safirbet giriş
betnano giriş
restbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
sonbahis giriş
betgaranti giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
pumabet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betnano giriş
betwild giriş
betnano giriş
dedebet giriş
betnano giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş