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गणित में गिनने के अलावा भी बहुत कुछ सिखाया भारत ने : द्वितीय भाग

भारत का अद्भुत अवदान है गणित। यह गणित का देश है। यह भी ताज्जुब की बात है कि यहां सबका अपना अपना गणित है! आदमी से लेकर आदम तक का! कोई गणित से बाहर नहीं! सब गणित करते हैं और हर सवाल का हल निकाल लेते हैं!

ताज्जुब यह भी है कि हर समय का भी अपना गणित है, जैसा चाहा वैसा बताया और मनवाया! कौरवों का “कहा गणित” और पांडवों का “सहा गणित”। शासक का आंकड़ा गणित, प्रजा का सांकड़ा गणित! ग्रंथों का अपना गणित, विवेचना का अपना! दुनिया के ग्रंथ भंडारों और पुस्तकालयों में भारतीयों की गणित गणना की पांडुलिपियां और उनमें सूत्र, विधि, उपपत्ति, निष्पत्ति, समाहार, हल के उदाहरण मिलेंगे, मालूम है?

बेजोड़ और बेहद रोचक। रस आया तो छहों रस गणित में और न आया तो निरस तक ठहराया गया है गणित को… हमारी संस्कृति में गणित कुछ ऐसी रची-बसी है कि कोई काम गणित बगैर नहीं होता। पहले काम को विचारने से लेकर पूर्ण होने तक गणित ही गणित।

गणित कितनी? जबानी से लेकर पाटी तक और जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक, अंक से लेकर बीज तक और नपित से मपित तक, लंब से चौड़ाई तक, गोल से घन तक, भुज से चौकोर तक, रेखा सेे अनंत बिंदु तक…। क्या आपको विश्वास है कि भारत के पास गणित की 100 पुस्तकें हैं! और, ज्यादा ही होगी, कम नहीं! क्या हमारे पास अपनी गणित की कोई किताब है?

भस्काराचार्य की लीलावती की लीला देखिए कि दुनिया देख आई, कई भाषाओं में समाई… मगर गणित की यह परंपरा बहुत पुरानी है। मित्रो! मैं तो गणित के ग्रंथों को देखकर ही देश के इस ज्ञान गौरव को अनुभव करता हूं, आप भी कीजिए।
✍🏻डॉ श्रीकृष्ण जुगनु

विज्ञान की पढ़ाई में भी जब आप स्नातकोत्तर से आगे बढ़ जाएँ तो पीएचडी होता है यानि डॉक्टरेट इन फिलोसोफी और भारत में फिलोसोफी की छह आस्तिक धाराएं तो कुछ हज़ार साल से हैं ही। गणित और विज्ञान के कई सूत्र भी इधर उधर बिखरे मिल जाते हैं। जैसे कर्णाटक संगीत में कटापयादि सूत्र होते हैं। इस के हिसाब से ही मेलकर्ता चक्र पर राग सजे होते हैं। आज की तारिख में इसे सब्स्टीट्यूशन साइफर (Substitution cypher) कहा जाता है जो कूट सन्देश भेजने के लिए इस्तेमाल होता है।

इस किस्म के कूट सन्देश भेजने के तरीके का जिक्र वात्स्यायन के कामसूत्र में भी आता है। वहां एक प्रेमिका में सजने-सँवरने के गुणों का होना ही जरूरी नहीं बताया जाता, उससे कूट सन्देश भेजने में कुशल होने की अपेक्षा भी की जाती है। वात्स्यायन जिस कूट सन्देश को उदाहरण के तौर पर इस्तेमाल करते हैं वो सब्स्टीट्यूशन साइफर है। कटपयादि सूत्र में क, ट, प आदि अक्षरों को 1 का मान दिया जाता है। उदाहरण के लिए ये श्लोक देखिये :-

गोपीभाग्यमधुव्रात-श्रुग्ङिशोदधिसन्धिग ॥
खलजीवितखाताव गलहालारसंधर ॥

इसमें गोपी शब्द पढ़ते ही समझ में आ गया होगा कि ये श्री कृष्ण के बारे में है। इस श्लोक का अर्थ है – गोपियों के भाग्य, मधु (दानव) को मारने वाले, सींग वाले पशुओं (गायों) के रखवाले, समुद्र में जाने वाले, दुष्टों का नाश करने वाले, कंधे पर हल रखने वाले और अमृत रखने वाले आप हमारी रक्षा करो।

जब इसे कटपयादि सूत्र के हिसाब से देखें तो ये दशमलव के 31 स्थानों तक पाई का शुद्ध मान देता है। वेदान्त देशिक रचित पादुका सहस्रम् नाम के संस्कृत चित्रकाव्य में 1008 श्लोकों में श्रीराम की खड़ाऊँ की वन्दना-आराधना की गयी है। इसमें एक श्लोक में शतरंज के जाने माने नाइट्स टूर (Knight’s Tour) का समाधान छुपा हुआ है। काव्यालंकार में नाइट्स टूर को ‘तुरंगपद्बंध’ कहा गया है। नौवीं शताब्दी की रुद्रट रचित काव्यालंकार में ही ये तुरंगपदबंध पहली बार आता है।

हो सकता है आपने तुरंगपदबंध की समस्या का नाम पहली बार सुना हो, लेकिन कंप्यूटर प्रोग्रामिंग करने वालों के लिए नाइट्स टूर प्रोग्रामिंग के अभ्यास का एक जरूरी हिस्सा होता है। संस्कृत ग्रंथों को किसी और से आँख मूँद कर अहो-महो करते हुए सुनते रहने की भारत के एक बड़े वर्ग की पुश्तैनी आदत रही है। इस वजह से किसी और के मुंह से ‘संस्कृत मतलब धर्म की किताब’ का झूठ लोग आसानी से मान लेते हैं। कुछ किताबें टिन का चश्मा (सेकुलरिज्म) उतारकर, आँखे खोलकर पढ़नी चाहिए।
✍🏻आनन्द कुमार

#ज्ञानोपाषक_भारत

रूबिक क्यूब के बारे मे आपने जरूर पढ़ा होगा, Anand Kumar जी अपने एक लेख मे रूबिक क्यूब की विस्तृत जानकारी दी थी…

एक भारतीय मूल के वैज्ञानिक हैं मोहन भार्गव, भार्गव ने ब्रह्मगुप्त के संस्कृत में लिखे सिद्धांत को फेमस रयूबिक क्यूब पर लागू किया और 18वीं शताब्दी के गॉस के लॉ को अधिक सरल ढंग से समझाने में सफलता प्राप्त की।

अमेरिका की प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में मैथ्स के प्रोफेसर भारतीय मूल के मंजुल भार्गव (44 वर्ष) ने मैथमैटिक्स का नोबल पुरस्कार कहा जाने वाला ‘फील्ड्स मेडल’ प्राप्त किया है। यह मेडल 1936 ई. से निरंतर दिया जा रहा है और श्री मंजुल इस पुरस्कार को प्राप्त करने वाले पहले भारतीय मूल के व्यक्ति हैं। मंजुल ने ज्यामिती में कुछ नये तरीके विकसित किये और इस क्षेत्र में उनके पुरूषार्थ और उद्यम को देखते हुए उन्हें यह पुरस्कार दिया गया है।

उन्होंने संस्कृत की सहायता से दो सौ वर्ष पुराने नंबर थ्योरी लॉ को सरल करके दिखा दिया था। संस्कृत के प्रति इतना आकर्षण श्री मंजुल को मानो उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है। क्योंकि उनके पितामह राजस्थान में संस्कृत के प्रोफेसर रहे थे। मंजुल का कहना है कि अपने दादाजी के पास उन्होंने 628 ई. पू. की भारत के सुप्रसिद्ध गणितज्ञ ब्रह्मगुप्त की संस्कृत में लिखी पांडुलिपि देखी थी। जिसका संस्कार बालक मंजुल के मनमस्तिष्क पर पड़ा और वह सफलता के नये नये आयामों को छूने लगा। श्री मंजुल का कहना है कि उक्त पांडुलिपि में जर्मनी के गणितज्ञ कार्ल फ्रैंडरिच गॉस के जटिल नंबर थ्यौरी लॉ जैसे सिद्घांत को साधारण ढंग से समझाया गया है। इस लॉ के अनुसार दो परफेक्ट एक्वेयर्स के जोड़ से प्राप्त दो नंबरों को परस्पर गुणा किया जाए तो परिणाम भी दो परफेक्ट स्क्वेयर्स के जोड़ जितना ही होगा। भार्गव ने ब्रह्मगुप्त के संस्कृत में लिखे सिद्धांत को फेमस रयूबिक क्यूब पर लागू किया और 18वीं शताब्दी के गॉस के लॉ को अधिक सरल ढंग से समझाने में सफलता प्राप्त की।

एक धर्मनिष्ठ हिन्दू “मंजुल भार्गव” को 2014 में गणित के विश्व का सबसे प्रतिष्ठित एवं नोबल पुरस्कार के समकक्ष पुरस्कार फील्ड मेडल दिया गया है जो अपने आप में एक बहुत बड़े गर्व की बात है और मंजुल भार्गव उन सभी के लिए एक उदाहरण हैं जो संस्कृति और शिक्षा को परस्पर विरोधाभाषी मानते हैं|

भार्गव जी को उनकी प्रतिभा के कारण मोदी सरकार ने 2015 में पद्म भूषण से भी नवाजा |

मंजुल भार्गव जी को मै तब जाना जब उन्हें रामानुजन पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और वास्तव में इतने कम समय में उन्होंने गणित में जो योगदान दिया है वो अद्भुद और आश्चर्यजनक है | और इन्हें वर्तमान “रामानुजन” कहना अतिशयोक्ति नहीं है |

भार्गव जी एक धर्मनिष्ठ हिन्दू ब्राह्मण परिवार से सम्बंधित हैं जो दो पीढ़ियों से कनाडा और अमेरिका में रहते हुए भी भारतीय संस्कृति के प्रति प्रेम अटूट बनाये हुए हैं | भार्गव जी मंचों पर अक्सर हिन्दू परिधानों में ही नजर आते हैं |

भार्गव जी जितनी सधी अंग्रेजी बोल सकते हैं उतना ही अच्छा “संस्कृत संभाषण” भी कर सकते हैं | आप के बाबा जी श्री पुरुषोत्तम लाल भार्गव जी एक अति प्रसिद्ध संस्कृत व्याकरण के विद्वान हैं और इनके संस्कृत के गुरु भी |

मंजुल ने संस्कृत की कविताओं के रिदम में गणित ढूंढ निकाला। संस्कृत के अक्षरों के क्रम में भी उन्होंने गणित की संरचना बताई है। वह यूनिवर्सिटी में अपने स्टूडेंट्स को समझाने के लिए भी संस्कृत कविताओं और मैथ्स की समानता के उदाहरण पेश करते हैं। भार्गव जी बहुत अच्छे तबला वादक भी हैं और जाकिर हुसैन से उन्होंने तबला के गुर सीखे हैं |

इनकी माता जी श्री मति मीरा भार्गव भी एक गणितज्ञा और विदुषी हैं | अमरीकी विश्वविद्यालय में गणित की प्रोफेसर हैं |

310 बहुत ही कठिन प्रमेयों को हल करना, जोर्ज पोल्या का दशकों पुराना कंजुगेट हल करना, गणित में कोहेन लंस्त्रा मार्टिनेज ह्युरिस्टिक यानि “गणित का प्रेत” को भी हल करने वाले भार्गव जी ने भारतीय मेधा का नाम विश्व स्तर पर किया है |

एक बेहद साधारण और सरल से चेहरे और जीवनशैली के पीछे आज धरती की सबसे सशक्त मेधा मंजुल भार्गव ने सिद्ध किया की दिखावे और आधुनिकता के कृत्रिम जीवन में कुछ नहीं रखा है |

“सनातन विद्या से 𝗖𝘆𝗯𝗲𝗿 𝘀𝗲𝗰𝘂𝗿𝗶𝘁𝘆”

जी हाँ, शास्त्रों में एक ऐसी भी विद्या है जिससे आप अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रख सकते हैं,
उस विद्या का नाम है “कटपयादी सन्ख्या विद्या”

हम में से बहुत से लोग अपना Password, या ATM PIN भूल जाते हैं इस कारण हम उसे कहीं पर लिख कर रखते हैं पर अगर वो कागज का टुकड़ा किसी के हाथ लग जाए या खो जाए तो परेशानी हो जाती
पर अपने Password या Pin No. को हम लोग “कटपयादि संख्या” से आसानी से याद रख सकते है।
“कटपयादि”( क ट प य आदि) संख्याओं को शब्द या श्लोक के रूप में आसानी से याद रखने की प्राचीन भारतीय पद्धति है

चूँकि भारत में वैज्ञानिक/तकनीकी/खगोलीय ग्रंथ पद्य रूप में लिखे जाते थे, इसलिये संख्याओं को शब्दों के रूप में अभिव्यक्त करने हेतु भारतीय चिन्तकों ने इसका समाधान ‘कटपयादि’ के रूप में निकाला।

कटपयादि प्रणाली के उपयोग का सबसे पुराना उपलब्ध प्रमाण, 869 AD में “शंकरनारायण” द्वारा लिखित “लघुभास्कर्य” विवरण में मिलता है

तथा “शंकरवर्मन” द्वारा रचित “सद्रत्नमाला” का निम्नलिखित श्लोक इस पद्धति को स्पष्ट करता है –
इसका शास्त्रीय प्रमाण –

नज्ञावचश्च शून्यानि संख्या: कटपयादय:।
मिश्रे तूपान्त्यहल् संख्या न च चिन्त्यो हलस्वर: ॥

[अर्थ: न, ञ तथा अ शून्य को निरूपित करते हैं। (स्वरों का मान शून्य है) शेष नौ अंक क, ट, प और य से आरम्भ होने वाले व्यंजन वर्णों द्वारा निरूपित होते हैं।
किसी संयुक्त व्यंजन में केवल बाद वाला व्यंजन ही लिया जायेगा। बिना स्वर का व्यंजन छोड़ दिया जायेगा।]

अब चर्चा करते हैं कि आधुनिक काल में इस की उपयोगिता क्या है और कैसे की जाए ?
कटपयादि – अक्षरों के द्वारा संख्या को बताकर संक्षेपीकरण करने का एक शास्त्रोक्त विधि है, हर संख्या का प्रतिनिधित्व कुछ अक्षर करते हैं जैसे

1 – क,ट,प,य
2 – ख,ठ,फ,र
3 – ग,ड,ब,ल
4 – घ,ढ,भ,व
5 – ङ,ण,म,श
6 – च,त,ष
7 – छ,थ,स
8 – ज,द,ह
9 – झ,ध
0-ञ,न,अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ॠ,लृ,ए,ऐ, ओ,औ
हमारे आचार्यों ने संस्कृत के अर्थवत् वाक्यों में इन का प्रयोग किया, जैसे गौः = 3, श्रीः = 2 इत्यादि ।

इस के लिए बीच में विद्यमान मात्रा को छोड देते हैं । स्वर अक्षर ( vowel) यदि शब्द के आदि (starting) मे हो तो ग्राह्य ( acceptable) है, अन्यथा अग्राह्य (unacceptable) होता

जैसे समझिए कि मेरा ATM PIN 0278 है- पर कभी कभी संख्या को याद रखते हुए ATM में जाकर हम Confuse हो जातें हैं कि 0728 था कि 0278 ? यह भी अक्सर बहुत लोगों के साथ होता है, ये इन से बचने के उपाय हैं

जैसे ATM PIN के लिए कोई भी चार अक्षर वाले संस्कृत शब्द को उस के कटपयादि मे परिवर्तन करें ( उस शब्द को सिर्फ अपने ही मन मे रखें, किसी को न बताएं )

उदाहरण के लिए –

इभस्तुत्यः = 0461

गणपतिः = 3516

गजेशानः = 3850

नरसिंहः = 0278

जनार्दनः = 8080

सुध्युपास्यः = 7111

शकुन्तला = 5163

सीतारामः = 7625

इत्यादि ( अपने से किसी भी शब्द को चुन लें )
ऐसे किसी भी शब्द को याद रखें और तत्काल “कटपयादि संख्या” मे परिवर्तन कर के अपना ATM PIN आदि में प्रयोग करें ।
✍🏻कुमार यस

कल्पसूत्र ग्रंथों के अनेक अध्यायों में एक अध्याय ” शुल्ब सूत्रों ” का होता है। ” वेदी ” नापने की रस्सी को ” रज्जू अथवा शुल्ब ” कहते हैं। इस प्रकार ” ज्यामिति ” को ” शुल्ब या रज्जू गणित ” भी कहा जाता था। अत: ” ज्यामिति ” का विषय ” शुल्ब सूत्रों ” के अन्तर्गत आता था।
भिन्न आकारों की वेदी‌ बनाते समय ऋषि लोग मानक सूत्रों (रस्सी) का उपयोग करते थे । ऐसी प्रक्रिया में रेखागणित तथा बीजगणित का आविष्कार हुआ।
शुल्बसूत्र का एक खण्ड बौधायन शुल्ब सूत्र है। बौधायन शुल्ब सूत्र में ऋषि बौधायन ने गणित ज्यामिति सम्बन्धी कई सूत्र दिए | उनमें ” बोधायन ऋषि ” का ” बोधायन प्रमेय ” भी है ।
” बोधायन ” और ” आपस्तम्ब ” दोनों ने ही किसी वर्ग के कर्ण और उसकी भुजा का अनुपात बताया है, जो एकदम सही है।
” शुल्ब-सूत्र ” में
किसी त्रिकोण के क्षेत्रफल के बराबर क्षेत्रफल का वर्ग बनाना,
वर्ग के क्षेत्रफल के बराबर का वृत्त बनाना,
वर्ग के दोगुने, तीन गुने या एक तिहाई क्षेत्रफल के समान क्षेत्रफल का वृत्त बनाना आदि विधियां बताई गई हैं।
निम्नलिखित शुल्ब सूत्र इस समय उपलब्ध हैं:
०१ ) आपस्तम्ब शुल्ब सूत्र
०२ ) बौधायन शुल्ब सूत्र
०३ ) मानव शुल्ब सूत्र
०४ ) कात्यायन शुल्ब सूत्र
०५ ) मैत्रायणीय शुल्ब सूत्र ( मानव शुल्ब सूत्र से कुछ सीमा तक समानता है)
०६ ) वाराह (पाण्डुलिपि रूप में)
०७ ) वधुल (पाण्डुलिपि रूप में) हिरण्यकेशिन (आपस्तम्ब शुल्ब सूत्र से मिलता-जुलता)
भिन्न आकारों की वेदी‌ बनाते समय ऋषि लोग मानक सूत्रों (रस्सी) का उपयोग करते थे । ऐसी प्रक्रिया में रेखागणित तथा बीजगणित का आविष्कार हुआ।
—- भास्कराचार्य की ” लीलावती ” में यह बताया गया है कि किसी वृत्त में बने समचतुर्भुज, पंचभुज, षड्भुज, अष्टभुज आदि की एक भुजा उस वृत्त के व्यास के एक निश्चित अनुपात में होती है।
—- आर्यभट्ट ने त्रिभुज का क्षेत्रफल निकालने का सूत्र भी दिया है। यह सूत्र इस प्रकार है-
त्रिभुजस्य फलशरीरं समदल कोटी भुजार्धासंवर्ग: ।
पाई ( ) का मान- आज से १५०० वर्ष पूर्व आर्यभट्ट ने का मान निकाला था।
किसी वृत्त के व्यास तथा उसकी परिधि के (घेरे के) प्रमाण को आजकल पाई कहा जाता है। पहले
इसके लिए माप १० (दस का वर्ग मूल) ऐसा अंदाजा लगाया गया। एक संख्या को उसी से गुणा करने पर आने वाले गुणनफल की प्रथम संख्या वर्गमूल बनती है।
जैसे- २ x २ = ४ ; अत: २ ही ४ का वर्ग मूल है।
लेकिन १० का सही मूल्य बताना यद्यपि कठिन है, पर हिसाब की दृष्टि से अति निकट का मूल्य
जान लेना जरूरी था।
इसे आर्यभट्ट ऐसे कहते हैं-
चतुरधिकम् शतमष्टगुणम् द्वाषष्ठिस्तथा सहस्राणाम् अयुतद्वयनिष्कम् भस्यासन्नो वृत्तपरिणाह:॥ (आर्य भट्टीय-१०)
अर्थात् एक वृत्त का व्यास यदि २०००० हो, तो उसकी परिधि ६२२३२ होगी।
परिधि – ६२८३२, व्यास – २००००
आर्यभट्ट इस मान को एकदम शुद्ध नहीं परन्तु आसन्न यानी निकट है, ऐसा कहते हैं। इससे
ज्ञात होता है कि वे सत्य के कितने आग्रही थे।
अकबर के दरबार में मंत्री अबुल फजल ने अपने समय की घटनाओं को ‘आईने अकबरी‘ में लिखा है। वे लिखते हैं कि ” यूनानियों ” को ” हिन्दुओं ” द्वारा पता लगाये गए ” वृत्त के व्यास ” तथा ” उसकी परिधि ” के मध्य सम्बंध के रहस्य की जानकारी नहीं थी।
इस बारे में ठोस परिज्ञान प्राप्त करने वाले हिन्दू ही थे। आर्यभट्ट को ही पाई का मूल्य बताने वाला प्रथम व्यक्ति बताया गया है।
जब सम्पूर्ण पाश्चात्य ज्ञान,विज्ञान और साहित्य का आधार भारत और संस्कृत है तो भारत में संस्कृत को ये सम्मान क्यों नहीं…?

ये आंकड़े हमें ये बताने के लिए काफी है की भारतवर्ष और सनातन धर्म इतना गौरवशाली क्यों है…?

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