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अध्यात्मवाद की वैदिक पद्घति : संध्योपासन-भाग दो

गतांक से आगे……

आचार्य भद्रसेन

महाराज कृष्ण गीता में कहा है-

इंद्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन:।

हे अर्जुन! इंद्रियां बड़ी बलवान हैं। ये जबरदस्ती मन को अपनी ओर खींच लेती हैं। अत: इंद्रियों के बलवान होने के साथ साथ उनका सन्मार्गगामी होना भी परमआवश्यक है। यह तभी होगा, जब उनके अंदर से राग द्वेष आदि मल दूर होकर पवित्रता का संचार हो जाएगा। इसीलिए तीसरे मार्जन मंत्र में इंद्रियों को पवित्र बनाने की प्रार्थना की गयी है।

इंद्रियों के पवित्र हो जाने पर भी यदि मन पवित्र नहन्ी, मन में मल, विक्षेप और आवरणरूपी दोष मौजूद है, अर्थात जब तक मन मैला है, चंचल है और उस पर अज्ञानता का आवरण अर्थात पर्दा पड़ा हुआ है, तब तक न  तो वह स्वयं ही सन्मार्ग गामी बन सकता है, और न ही इंद्रियों को सत्पथगामी बना सकता है। अत: साधक का कत्र्तव्य है कि वह इंद्रियों की पवित्रता के साथ साथ मन को भी चंचलता आदि दोषों से हटाकर उसे सन्मार्गगामी बनाने का प्रयत्न करे। किंतु मन बड़ा चंचल है। उसकी चंचलता सरलता से दूर होनी बड़ी कठिन है। अर्जुन जैसे विश्व विजयी को भी कहना पड़ा-

‘‘चंचलं हि मन: कृष्ण प्रमाथि बलवद्घढम्।’’

अत: इसकी चंचलता पर विजय प्राप्त करने का हमारे ऋषियों ने एकसरल उपाय ढूंढ़ निकाला वह है प्राणों को अपने वश में करना। प्राण और मन का परस्पर बड़ा घनिष्ठ संबंध है। जहां प्राणों की गति होगी, मन भी वही गति करेगा। योग ग्रंथों में प्राण और मन को दूर मिले जल की उपमा देकर कहा गया है-

दुग्धाम्बुवत सम्मिलितावुभौ तौ, तुल्यक्रियौ मानसमारूतौ हि।

यतो मरूत तत्र मन: प्रवृत्तिर्यतो मनस्तत्र मरूत्प्रवृत्ति:।।

‘‘यह मन और प्राण दूध और पानी की तर मिले हुए हैं। अत: वे दोनों एक साथ गति करने वाले हैं। इसीलिए जहां प्राण होंगे, मन भी वही गति करेगा, और जहां मन होगा, प्राण भी वहीं प्रवृत्त होंगे। अत: यदि इन दोनों में से एक को हम अपने वश में कर लेते हैं, तो दूसरा स्वत: ही हमारे वश में हने जाता है। सूक्ष्म पदार्थ की अपेक्षा स्थूल पदार्थ जल्दी तथा सरलता पूर्वक वशवर्ती हो जाता है-यह एक सार्वभौम नियम है। पानी की गति को वश में करना इतना कठिन नही जितना वायु के वेग को वश में करना। क्योंकि जल वायु की अपेक्षा स्थल है, वायु अर्थात प्राण जल की अपेक्षा से तो सूक्ष्म है, किंतु मन की अपेक्षा वे भी स्थूल हैं। अत: मन की अपेक्षा प्राणों को वश में करना अधिक सरल है। और प्राणों के वशवर्ती हो जाने पर मन स्वयं ही वश में हो जाता है, क्योंकि ये दोनों परस्पर घनिष्ठ मित्र हैं। इसीलिए योग गं्रथों में कहा है-

चले वाते चलं चित्तं, निश्चलो भवेत।

अर्थात प्राणों के चलायमान होने पर चित्त भी चलायमान हो जाता है और प्राणों के निश्चल होने पर मन भी स्वत: निश्चल हो जाता है और प्राणों को वश में करन्ने का यदि कोई सर्वोत्तम उपाय है, तो वह है-

प्राणायाम :-इसीलिए योगदर्शन में कहा है-

‘‘प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।’’

अर्थात प्राणों को निकालने तथा धारण करन्के रोकने अर्थात कुम्भक करने से भी मन वश में हो जाता है। अतत्: संध्या के चौथे मंत्र में प्राणायाम का वर्णन है। प्राणायाम के द्वारा इंद्रियां भी विषय भोगों से हटकर साधक के वशवर्तिनी हो जाती हैं। अर्थात प्राणायाम जहां योग के चतुर्थ अंग-

प्रत्याहार : में सहायक होते हैं, वहां इसके मन तथा बुद्घि के मौल भी धुल जाते हैं, अज्ञान का पर्दा हट जाता है। योगदर्शन में कहा है-

‘‘तत: क्षीयते प्रकाशावरणम’’

अर्थात मन तथा बुद्घि के प्रकाश के ऊपर जो अज्ञान का पर्दा पड़ा है। वह प्राणायाम से नष्टहो जाता है। तब मन अपनी चंचलता को छोडक़र प्रभु के ध्यान में मग्न हो जाता है और प्रभु के गुणों को अपने जीवन में धारण करने में समर्थ हो जाता है। इसलिए मंत्र में प्रभु के सात गुणों का भी वर्णन किया गया है जिन्हें प्राणायाम द्वारा साधक को अपने जीवन में धारण करना आवश्यक है। यही योग का छठा अंग-

धारणा

है। अत: प्राणायाम के द्वारा जहां साधक के मन का मैल धुल जाता है, वहां वह योग के छठे अंग धारणा में भी प्रवेश करने का अधिकारी हो जाता है। योगदर्शन में कहा है-

धारणासु च योग्यता मनस:।

क्रमश:

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