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ऑपरेशन गंगा की सफलता पर विपक्ष की काली भूतनी की कोशिश

 ललित गर्ग

मोदी ने जनता को यूक्रेन में फंसे भारतीयों को सुरक्षित भारत लाने का केवल आश्वासन ही नहीं दिया बल्कि जो कहा उसे पूरा भी कर दिखाया। उन्होंने देश की सुरक्षा एवं भारतीयों की रक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनकी भाजपा सरकार ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि उसके लिये सत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण जनता का हित एवं उसकी रक्षा है। उसने रूस एवं यूक्रेन बीच चल रहे घमासान युद्ध एवं आपदा में फंसे अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सबसे बड़ी राहत की खबर है कि यूक्रेन के घमासान वाले शहर सूमी में फंसे करीब सात सौ भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकालने में उसे सफलता मिली है, इससे पूर्व 17 हजार भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाया जा चुका है। आपरेशन गंगा के तहत चले इस अभियान में उसे यह अभूतपूर्व सफलता मिली है और वह भी तब, जब कई देशों ने अपने लोगों को वहां से निकालने के मामले में हाथ खड़े कर दिए थे। यह भारत की विदेश नीति, मोदी की अन्तर्राष्ट्रीय छवि एवं भारत की लगातार बढ़ती साख एवं शक्ति का परिणाम है। इसलिये आपरेशन गंगा के उजालों पर कालिख पोतने की बजाय उसकी प्रशंसा होनी चाहिए।

यह मोदी के दृढ़ संकल्प का ही परिणाम है कि एक बड़ी चुनौती के बीच भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाया गया। इसीलिये भी यह सफलता उल्लेखनीय है क्योंकि कभी रूस तो कभी यूक्रेन युद्धविराम के लिए बनी सहमति का उल्लंघन कर रहे थे। इससे सूमी में फंसे भारतीय छात्रों की मुसीबत बढ़ रही थी, उनका जीवन पल-पल खतरों से घिरा था। उन्हें संकट से बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को न केवल यूक्रेन और रूस के राष्ट्रपति से बात करनी पड़ी, बल्कि संयुक्त राष्ट्र में भारतीय प्रतिनिधि को इन दोनों देशों के रवैये पर आपत्ति भी जतानी पड़ी। रूस पर यूक्रेन के हमले के बाद वहां फंसे भारतीयों को सुरक्षित बचाकर लाना एक जटिल काम था, इन जटिल हालातों में 17 हजार से अधिक भारतीयों को सुरक्षित निकाल कर लाना एक साहस का काम है। इस काम को किस तरह सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई, इसे इससे समझा जा सकता है कि इसके लिए न केवल चार केंद्रीय मंत्रियों को यूक्रेन के पड़ोसी देशों में भेजा गया, बल्कि भारतीय वायुसेना की भी सेवाएं ली गईं।
मोदी ने जनता को यूक्रेन में फंसे भारतीयों को सुरक्षित भारत लाने का केवल आश्वासन ही नहीं दिया बल्कि जो कहा उसे पूरा भी कर दिखाया। उन्होंने देश की सुरक्षा एवं भारतीयों की रक्षा को प्राथमिकता देते हुए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। वे एक साहसी एवं कर्मयोद्धा की भांति अपनी तमाम राजनीतिक व्यस्तताओं के बावजूद युद्धरत क्षेत्रों में फंसे भारतीयों को सुरक्षित भारत लाने के काम को बड़ी सूझबूझ एवं जीवटता से सफल कर सके। वे सफल जननायक हैं, ऐसे राजनेताओं के लिये जॉन एडम्स कहते है ‘सार्वजनिक नीतिमत्ता, व्यक्तिगत नीतिमत्ता से अलग नहीं होती। सार्वजनिक नीतिमत्ता गणराज्य की आधारशिला है। शासनकर्ताओं में सार्वजनिक हित, सार्वजनिक सम्मान, सार्वजनिक हित संबंधों के विषय में सकारात्मक रुख होना चाहिए। इन बातों के साथ ही सम्मान, शक्ति, तेजस्विता भी लोगों के मन में पैदा की जानी चाहिए।’ मोदी ने एक अरब तीस करोड़ की विशाल आबादी वाले देश के जन-जन में यह आस्था एवं विश्वास पैदा किया है।
मोदी ने देश की जनता को सुरक्षित, भयमुक्त एवं सम्मानजनक जीवन का कोरा नारा ही नहीं दिया, बल्कि ऐसा करके दिखाया है। रूस एवं यूक्रेन युद्ध में फंसे भारतीयों को सुरक्षित निकाल कर ही नहीं बल्कि कोरोना महामारी एवं पूर्व के आतंकवादी दौर में भी जनता को शांति एवं भयमुक्त जीवन प्रदत्त किया। जैसा कि सर्वविदित है कि पूर्व सरकारों के दौर में देशवासी सबसे अधिक भयभीत आए दिन होने वाले आतंकवादी हमलों और सीरियल बम विस्फोटों से थे। नागरिकों में यह भय समा गया था कि न जाने कब, कहां, कैसे आतंकवादी हमला हो जाए। लेकिन मोदी सरकार आने के बाद नागरिकों ने सुरक्षा के मामले में राहत की सांस ली है। मोदी के शासनकाल में नागरिक निर्भय एवं निःसंकोच होकर कहीं भी देश के किसी भी कोने में आ-जा रहे हैं। एक ओर राष्ट्र की सुरक्षा एवं जनता की रक्षा के लिए अनेकानेक उपाय-योजनाएं और नीतियां लागू की जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर भारत तेजी के साथ विकास व प्रगति की ऊंचाइयों को छू रहा है।

भारत ने मोदी के शासन में संकट एवं आपदा के समय जनता की रक्षा के अनूठे कीर्तिमान स्थापित किये हैं। कुछ वर्ष पहले ऐसा ही काम यमन में ऑपरेशन रात के तहत किया था। तब तो उसने बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका के अलावा, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा समेत दो दर्जन देशों के नागरिकों को भी वहां से निकाला था। ऐसे अभियान न केवल भारत की बढ़ती क्षमता को रेखांकित करते हैं, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी देते हैं कि वह एक बड़ी और जिम्मेदार शक्ति बन रहा है। रूस के यूक्रेन पर हमले के बीच भारत का ऑपरेशन गंगा अभियान देश के साथ ही समूची दुनिया और विशेषतः पड़ोसी देशों से भी तारीफ हासिल कर रहा है। ऑपरेशन गंगा से भारत ने एक बार फिर साबित किया है कि वह संकट की घड़ी में खुद के साथ ही मानवीय आधार पर दूसरे देशों की मदद करने से भी कभी गुरेज नहीं करता है। भारत ने यूक्रेन में फंसे भारतीयों के साथ ही बांग्लादेश, नेपाल और ट्यूनीशिया के नागरिकों को भी वहां से निकाला। भारत ने बांग्लादेश के 9 और पड़ोसी देश नेपाल के 3 छात्रों को यूक्रेन से रेस्क्यू किया था। चूंकि जिन भी भारतीयों ने यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क किया था, उन सभी को निकाल लिया गया है, इसलिए उम्मीद की जाती है कि अब वहां हमारा कोई नागरिक नहीं फंसा होगा। यदि किसी कारण कोई भारतीय वहां रह भी गया होगा तो आशा की जाती है कि उसे भी निकाल लिया जाएगा।
विपक्षी सांसदों ने यूक्रेन में फंसे भारतीयों को निकालने के सरकार के प्रयासों पर एकजुटता भी दिखाई। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इस बैठक में गए विपक्षी सांसदों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ आए निंदा प्रस्ताव पर मतदान से अनुपस्थित रहने के सरकार के फैसले का आम तौर पर समर्थन किया। विदेश नीति के मामले में ऐसा ही होना चाहिए, क्योंकि विदेश नीति किसी दल की नहीं, बल्कि देश की होती है। इसी कारण विदेश नीति के मामले में पक्ष-विपक्ष में सहमति की एक समृद्ध परंपरा रही है। इस परंपरा का निर्वाह होता रहे, इसके लिए सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों को ही सभी आग्रह-पूर्वाग्रह छोड़कर प्रयास करने चाहिए।
कतिपय विपक्षी नेता इतना सब होने के बावजूद तर्कहीन आलोचना करते हुए दिखाई दे रहे हैं, जो निन्दनीय है। यह जगजाहिर है कि विपक्षी दलों का काम आलोचना करना है, उसे गलत भी नहीं कहा जा सकता। लेकिन समय एवं स्थितियों की नजाकत को देखते हुए हर समय आलोचना एवं छिद्रान्वेषण उचित नहीं कहा जा सकता। मानवीय सोच एवं मानवता भी कुछ कहती है कि ऐसे मौकों पर अगर प्रशंसा नहीं कर सकते तो इन मुद्दों पर जहर तो न उगलें। ऐसी नकारात्मक राजनीति करने वालों को याद रखना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि विदेश नीति से जुड़े मामलों में एकजुटता का अभाव न केवल राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से भारत के प्रति बैर-द्वेष रखने वाले देशों को गलत संदेश भी देता है। ऐसी नकारात्मक सोच देश के अस्तित्व एवं अस्मिता को दुनिया में धुंधलाती है, इससे विपक्षी दलों को बचना चाहिए। थॉमस पेन नामक एक बड़े विचारक हुए। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक का शीर्षक है ‘द राइट्स ऑफ मेन’। इस पुस्तक में वे कहते हैं कि व्यक्ति को जन्मतः अनेक अधिकार प्राप्त होते हैं। इन अधिकारों पर अतिक्रमण करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। फिर वह राजा हो या सांसद।’ निश्चित ही विपक्षी दलों को जिम्मेदार प्रतिनिधित्व का दायित्व निभाना चाहिए और ऐसे उद्देश्यहीन, विध्वंसात्मक, उच्छृंखल एवं गैर-जिम्मेदाराना आलोचना से बचना चाहिए।

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