Categories
महत्वपूर्ण लेख

यूक्रेन की बर्बादी की कहानी के पीछे आखिर किसका हाथ है ?

नीरज

रूस यूक्रेन युद्ध को आज एक हफ्ता हो गया। हर दिन लड़ाई भीषण होती जा रही है। पूरी दुनिया की हमदर्दी यूक्रेन के साथ है। अमेरिका और यूरोप ने रूस पर कई प्रतिबंध भी लगा दिए हैं। दुनिया की तरह भारत में भी एक बड़ा वर्ग रूस को विलेन के रूप में देख रहा है। मगर मुझे ये पूरा विवाद यूक्रेनी राष्ट्रपति की नासमझी और अमेरिका की बदमाशी ज़्यादा लगता है।
पहले बात यूक्रेन की नासमझी की कर लेते हैं। यूक्रेनी राष्ट्रपति को अच्छे से पता था कि रूस को क़तई मंज़ूर नहीं है कि यूक्रेन नाटो का हिस्सा बने। रूस को लगता था कि यूक्रेन के नाटो का पार्ट बनने पर नाटो सेनाओं की पहुंच रूस तक हो जाएगी। इससे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा को ख़तरा होगा। अमेरिका जैसा उसका दुश्मन देश उसकी सीमा के बहुत करीब आ जाएगा। ये चिंताए बिल्कुल वैसी ही हैं जैसे पीओके में किसी निर्माण कार्य के बहाने चीनी सैनिकों की मौजूदगी पर भारत की होती है। जैसे श्रीलंका या बांग्लादेश के तट पर चीन के अपना ठिकाना बनाने पर भारत की रही हैं। दुनिया में कोई भी देश नहीं चाहता कि उसका दुश्मन राष्ट्र किसी भी बहाने उसकी सीमाओं के करीब आ जाए। वो देश तो कतई नहीं जो 30 साल पहले आपके 15 टुकड़े कर चुका हो!

अब सवाल पूछा जा सकता है कि रक्षा चिताएं क्या सिर्फ रूस की हैं, यूक्रेन की नहीं है? यही रूस अगर क्रीमिया पर कब्ज़ा कर सकता है, जॉर्जिया में घुस सकता है तो यूक्रेन में एंट्री क्यों नहीं कर सकता? और यही चिंता यूक्रेनी सरकार की भी थी इसीलिए वो नाटो को हिस्सा बनकर खुद को रूस के हमले से सुरक्षित कर लेना चाहता था।
ये बात तर्क के लिहाज़ से सही है लेकिन कूटनीति में अक्सर हमें अपने दुश्मन की हैसियत को भी आंककर कदम उठाने पड़ते हैं। जब यूक्रेन को ये साफ था कि अगर उसे यूरोपीय यूनियन या नाटा का हिस्सा बनने की जिद्द नहीं छोड़ी तो रूस किसी भी हद तक जा सकता है, तो फिर उसने बात इस हद तक बिगड़ने क्यों दी…अगर उसकी खुद की सैनिक हैसियत या ताकत रूस से मुकाबला करने की होती, तब ये ज़िद्द या स्टेंड समझा जा सकता था लेकिन इस उम्मीद में ये कदम उठा लेना कि जंग हुई तो यूरोप और अमेरिका हमारे साथ आ जाएंगे, सरासर बेवकूफी भरा आंकलन था और आज ये साबित भी हो रहा है।

यूरोपीय देशों ने साफ कर दिया है कि हथियार ले लो लेकिन लड़ने नहीं आएंगे। अमेरिका ने प्रतिबंध लगाकर अपनी जान छुड़ा ली है। और कुल मिलाकर वही हो रहा है जो अमेरिका चाहता था। यूक्रेन नाटो का हिस्सा बनता तब भी अमेरिका को फायदा था और इस कवायद में रूस को यूक्रेन पर हमला करना पड़ा, तो भी अमेरिका को ही फायदा है। इससे हुआ ये कि रूस एक बार Aggressor के तौर पर सामने आया है। उससे घबराए यूरोपीय देश अमेरिका से हथियार खरीद रहे हैं। उसकी हथियार लॉबी जो अमेरिका के अफगानिस्तान से निकल आने पर मंदी से गुज़ार रही थी वो फिर से गुलज़ार हो गई है।

अमेरिका को यूएन के बहाने रूस पर प्रतिबंध लगाने का बहाना मिल गया है और रूस जो कई यूरोपीय देशों के मुकाबले बहुत सारी बेहतर गुणवत्ता और कम दाम वाली चीज़ें बनाकर यूरोप में आर्थिक शक्ति बन रहा था, ताज़ा प्रतिबंधों ने उस पर भी लगाम लगा दी है।
सवाल पूछे जा रहे हैं कि अगर यूक्रेन पर चढ़ाई करने के लिए रूस पर इतने प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं तो इराक और अफगानिस्तान में बीस साल तक जबरन बने रहने पर अमेरिका को क्या सज़ा दी गई? और सजा देता भी कौन? जो यूएन सबसे ज़्यादा (27 फीसदी) आर्थिक मदद ही अमेरिका से लेता है उसकी क्या औकात की वो अमेरिका पर ही कोई एक्शन ले ले और यही आज यूएन के मूल ढांचे की सबसे बड़ी त्रासदी है।
हैरानी ये है कि इतना सब कुछ होने के बावजूद यूक्रेनी राष्ट्रपति को अपने देश की सलामती से ज्यादा नाटो में शामिल होने की अपनी ज़िद्द ज़्यादा प्यारी है। यूरोप का कोई बड़ा देश शांति की बात करने के बजाए रूस को गाली देने और यूक्रेन को ही उकसाने में लगा है।
मुझे मशहूर अमेरिकी सिटकॉम ‘ऑफिस’ का 10-12 साल पुराना एक एपिसोड याद आता है जिसमें बॉस माइकल स्कॉट एक मैगज़ीन में ये पढ़कर परेशान हो जाता है कि चीन बड़ी तेज़ी से हर मामले में आगे बढ़ रहा है। ये सब पढ़कर वो बड़ा परेशान हो जाता है। इससे घबराकर वो ऑफिस में सभी को कहता है कि आप लोग भी ऐसे आइडियाज़ दीजिए जिससे अमेरिका की दुनिया में सुपर पावर की हैसियत बनी रहे। भले ही ये एक कॉमेडी सीरियल था मगर ये उस अमेरिका सोच को अच्छे से दर्शाता है कि जिसमें ये कूट कूटकर भरा गया है कि अमेरिका के अलावा पूरी दुनिया में और कोई सुपर पावर हो ही नहीं सकता।
शीत युद्ध के बाद यूएसएसआर को तोड़ने में अमेरिका ने जो रोल निभाया वो सबके सामने हैं। तब उसे लगा कि उसने हमेशा के लिए अपना सबसे बड़ा दुश्मन ख़त्म कर दिया। मगर पुतिन ने जिस तरह पिछले 20 सालों में रूस को फिर से खड़ा किया उसने अमेरिका को फिर से बेचैन कर दिया है। आज यही बेचैनी उसकी चीन को लेकर भी है। और उसकी कूटनीति इतनी कारगर है कि हमेशा की तरह इस बार भी वो अपने घर में युद्ध नहीं लड़ रहा। सीधे तौर पर कहीं चर्चा में भी नहीं है। लेकिन सब कुछ वैसा ही हो रहा है जैसा वो चाहता था। एक भले देश का नासमझ राष्ट्रपति उसके हाथों की कठपुतली बनकर अपने देश को ख़त्म कर रहा है और कहानी में विलेन वही है जिसे वो हमेशा इस रोल में देखना चाहता था….रूस!

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
ikimisli giriş
grandpashabet giriş
bonus veren siteler
grandpashabet giriş
betnano giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet
grandpashabet giriş
betlike giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betnano giriş