Categories
संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा

स्वतंत्रता के महायोद्घा:उदयसिंह, भरतपाल, वाग्भट, जैत्रसिंह एवं वीर नारायण

hiपिछले पृष्ठों पर हमने शाहिद रहीम साहब का उद्घरण प्रस्तुत किया था, जिसमें उन्होंने भारत के आर्यावत्र्तीय स्वरूप का उल्लेख किया है। अपने अतीत के गौरवमयी पृष्ठों के आख्यान के लिए उनका वह उद्घरण बड़ा ही अर्थपूर्ण और तर्कपूर्ण है। उनके इस तथ्य की पुष्टिके लिए मनुस्मृति (1.2.22.29) का यह श्लोक भी ध्यातव्य है-

आ समुद्रात् वै पूर्वाद् समुद्रात पश्चिमात्। तयोरेवान्तरे गिर्योराय वत्र्तेतिविदुर्बुधा:।।
सरस्वती दृष द्वत्पोर्देवनद्योरन्तरम्।
तं देवनिर्मित: देशमार्यवर्तेति प्रचक्षते।।

यहां मनुमहाराज आर्यावत्त देश का पूरा मानचित्र प्रस्तुत करते हुए उसकी भौगोलिक सीमाओं का चिन्हीकरण कर स्पष्टकर रहे हैं कि पश्चिमी भूमध्यसागर तथा पूर्वी प्रशांत महासागर के मध्य स्थित, पर्वतों से घिरे हुए सरस्वती तथा दृष्द्वती देवनदियां जिसके अंदर बहती हैं, उस सृष्टिके प्रारंभ में उत्पन्न मानवों अर्थात देवपुरूषों द्वारा निर्मित देश को आर्यवत्र्त  कहते हैं।

इस  आर्यावत्र्तीय भौगोलिक मानचित्र की आज देश में अंगुलिगणेय मात्र लोगों को ही जानकारी है। यद्यपि किसी भी प्रगतिशील देश और समाज के लोगों को अपने इतिहास के सार्थक बोध के दृष्टिगत अपने अतीत का यथार्थ ज्ञान होना अपेक्षित है।

पर जब अल्तमश जैसे तुर्क सुल्तान इस देश पर अपना राजनैतिक प्रभुत्व स्थापित कर, इसके आर्थिक संसाधनों को हड़प कर इसे धर्मभ्रष्टऔर संस्कृति भ्रष्टकरने का अमानुशिक प्रयास कर रहे थे, उस समय हमें अपने अतीत का यथार्थ ज्ञान था। इसलिए हम स्वयं को पतित कहलाने के स्थान पर देशधर्म के ‘पथिक’ कह लाना अधिक श्रेयस्कर मान रहे थे।

जालौर ने चलाया स्वतंत्रता आंदोलन

अल्तमश के पैर उखाडक़र खोए हुए हिंदू साम्राज्य को पुन: प्राप्त करने के लिए जैसे दिल्ली और उसका निकटवर्ती क्षेत्र विद्रोहपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम पर उतर आया था, उसी का अनुकरण देश के अन्य राजे-रजवाड़ों ने करना आरंभ किया। आजकल का जालौर उस समय का जावालिपुर बाड़मेर -वाग्भटमेरू , मण्डोर-माण्डव्यपुर, सांचोर-सत्यपुर था। यहां का शासक उदयसिंह था। उसके अपने साम्राज्य की इस वृद्घि को विदेशी शासकों से ‘मुक्त भारत’ करने के अभियान के रूप में देखा जाना चाहिए। अपने इस अभियान के अंतर्गत हिंदू राजा उदयसिंह ने अल्तमश के किसी सेनापति को पराजित कर दिया था, जो किसी सीमावर्ती क्षेत्र का शासक बन गया था। हिंदू राजा के इस कृत्य का दण्ड देने के लिए अल्तमश ने जालौर पर हमला कर दिया। जिसमें उसके कई उच्च सैन्याधिकारी भी सम्मिलित थे।

जब राजा उदयसिंह को इस हमला का ज्ञान हुआ, तो वह निस्संकोच अपने दुर्ग में ही रहकर युद्घ का सामना करने के लिए उद्यत हो गया। कई मुस्लिम इतिहासकारों ने राजा उदयसिंह द्वारा क्षमायाचना कर अल्तमश से संधि करने का विभ्रम उत्पन्न किया है, और कहा है कि उसने सौ ऊंट तथा 20 घोड़े देकर अल्तमश से संधि कर ली। परंतु इतना बड़ा सैन्य दल लेकर जो मुस्लिम शासक जालौर में एक आक्रांता के रूप में पहुंचा वह मात्र सौ ऊंट और 20 घोड़े लेकर ही संधि करने को तैयार हो गया हो, यह उपहासास्पद सा लगता है। कई लोगों को इस पर विश्वास नही है। अल्तमश ने कभी भी किसी हिंदू शासक को इतनी छोटी सी भेंट लेकर उसका राज्य नही लौटाया। इससे यही सिद्घ होता है कि दोनों पक्ष युद्घ में या तो बराबर की शक्ति वाले प्रमाणित हुए या हिंदू राजा ने अल्तमश की सेना को परास्त किया। यह घटना 1215 ई. की है।

उदयसिंह ने बनाया हिंदू संघ

अल्तमश की पराजय का संदेह तब और बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि उसी जालौर नरेश उदयसिंह ने 1221 ई. में अल्तमश के विरूद्घ तब एक हिंदू संघ बनाया था जब वह नागदा अर्थात मेवाड़ पर चढ़ाई करने जा पहुंचा और उसके पश्चात गुजरात की ओर बढऩे लगा था। तब उदयसिंह ने मारवाड़ शासक सोमसिंह सहित छोटे-2 सामंतों व प्रमुख लोगों को लेकर धारा वर्ष के धोलका के वीर धवल और उसके मंत्री वस्तुपाल के साथ मिलकर एक संयुक्त सेना बनायी, जिससे कि विदेशी आक्रांता का विरोध किया जा सके। सभी इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि अल्तमश इस संघ का सामना किये बिना ही अपनी राजधानी लौट आया था। अब यदि वह बिना सामने किये ही अपनी राजधानी लौट गया था, तो यह भी सत्य है कि इसके पश्चात उसने कभी पुन: गुजरात जाने का संकल्प नही लिया? एक विदेशी शासक को (जिसे विजेता जाति का माना जाता रहा है) इतना भयभीत कर देना कम गौरव की बात नही है।

भरतपाल ने ली सवा लाख तुर्क सेना की बलि

चौहान वंशी लोगों ने अपनी पराजय को अभी तक भुलाया नही था, उन्हें तरायन का अपमान रह-रहकर दु:खी व त्रस्त कर रहा था। अत: उन लोगों ने अजमेर से हटकर गहड़वाल राज्य के चंदवाड़ नामक स्थान पर अपनी शक्ति का संचय  किया और वहीं एक शक्ति के रूप में स्थापित हो गये। ‘चंदवाड़ का चौहान राज्य’ नामक पुस्तक के लेखक दशरथ शर्मा के शोध से हमें इस तथ्य का पता चलता है। शक्ति का यह संचय भी ये अवशिष्टचौहान स्वतंत्रता की साधना के रूप में इसे एक समुचित उपाय मानकर कर रहे थे। उन्हें स्वतंत्रता प्रिय थी और वे अपने प्रतापी एवं पराक्रमी राजा पृथ्वीराज चौहान की यश पताका को किसी प्रकार से भी कलंकित या अपमानित होने देना नही चाहते थे। इसलिए शीघ्र ही उनके वास्तविक उद्देश्य का पता चलने लगा कि वे अंतत: किस उद्देश्य से प्रेरित होकर अपनी शक्ति का संचय कर रहे थे? उन्होंने अपने शासक भरतपाल के नेतृत्व में  अपने आसपास से मुसलमानों को भगाना आरंभ कर दिया।

महान स्वतंत्रता प्रेमी भरतपाल

राजा भरतपाल की इस स्वतंत्रता प्रेमी भावना को कुचलने के लिए उधर अल्तमश भी सावधान हुआ। उसने अवध प्रांत का अधिपति बनाकर 1226 ई. में अपने लडक़े नासिरूद्दीन को भेजा। अब नासिरूद्दीन का सामना भरतपाल से होना निश्चित हो गया। ‘तबकाते नासिरी’ का लेखक मिनहाज हमें बताता है कि पृथ्वीराज चौहान के इस यशस्वी उत्तराधिकारी ने हिंदू अस्मिता का प्रतिशोध लेने के लिए एक लाख बीस हजार मुस्लिम सेना का अंत कर दिया था।

यह प्रतिशोध बहुत बड़ी उपलब्धि थी और यदि मध्यकालीन विश्व इतिहास को समीक्षित, निरीक्षित और परीक्षित करने का महाभियान चलाया जाए तो यह घटना अपने ढंग की अनुपम भी सिद्घ हो सकती है कि जब किसी पराजित योद्घा के वीर वंशजों ने अपने खौलते रक्त को शांत करने के लिए अपनी सर्वथा विनष्टहुई शक्ति का इस प्रकार संचय किया हो और इतने बड़े स्तर पर शत्रु सेना का संहार कर अपनी प्रतिशोधाग्नि को शांत किया हो। इस पर भी हम अपने आपको ‘कायर’ मानते रहें तो इन वीरकृत्यों की समाधि पर पुष्प कौन चढ़ाएगा?

भरतपाल ने भी किया अपना बलिदान

जब नासिरूद्दीन महमूद भरतपाल के क्षेत्र में घुसा तो यह तो स्पष्टहो ही गया था कि अब उसका संघर्ष भरतपाल से होना निश्चित है। अत: चंदवार के प्रसिद्घ रणक्षेत्र में दोनों सेनाओं का आमना-सामना हो ही गया। भरतपाल ने अपने पूर्वजों का ‘श्राद्घ तर्पण’ तो सवा लाख मुस्लिम सेना के विनाश के साथ कर ही दिया था जो कि उसका प्रमुख उद्देश्य था, परंतु इसके पश्चात भी साहस के साथ शत्रु सेना से जा भिड़ा। शत्रु से सीधे-सीधे होने वाले युद्घ का परिणाम वह रणबांकुरा जानता था, पर युद्घ से भागना भी वह चौहान परंपरा और अपने पूर्वज या अपने चौहान वंश के सिरमौर पृथ्वीराज चौहान के यश पर धब्बा ही मानता था, इसलिए शत्रु की ललकार पर उसका सामना करना ही उसने वीरोचित परंपरा के अनुकूल समझा। युद्घ में भयंकर रक्तपात करते हुए वह रणबांकुरा भरतपाल अदम्य शौर्य एवं साहस के साथ युद्घ करता हुआ ‘वीरगति’ को प्राप्त हो गया। कहते हैं कि भरतपाल का एक पुत्र भी मुस्लिम तुर्क सेना के द्वारा कैद कर लिया गया, जिसे दिल्ली ले जाया गया।

संघर्ष फिर भी नही रूका

पृथ्वीराज चौहान की वीरता और युद्घ भरी परंपरा को और भरतपाल की ‘शहादत’ को  सम्मानित करने के लिए उसकी समाधि पर दीप जलाकर उस समाधि से प्रकाश पाने वाले भरतपाल के लोगों ने भी इस शहीदी परंपरा को निरंतर जीवित रखा। यह अलग बात है कि हम उस परंपरा को इतिहास के पन्नों में समुचित स्थान देकर समादृत नही कर सके। दशरथ शर्मा जैसे कई शोधकर्ता इतिहासकारों का मानना है कि भरतपाल के पश्चात उसके वंश में जाहड़, बल्लाल, आहवमल्ल राजा बने, उनकी राजधानी का नाम रायबिद्दय (जिसे आगरा जिले के रायभा नामक स्थान से जोडक़र देखा जाता था) थी। देखिए, चौहान वंश की विशिष्टता कि इसने देश की स्वतंत्रता के लिए दिल्ली छोड़ दी, अजमेर छोड़ दिया, चंदवाड़, छोड़ दिया और अब रायभा तक आ गये, पर एक बात थी जिसे ये किसी भी मूल्य पर छोडऩे को उद्यत नही थे- और वह थी देश के प्रति इनकी देशभक्ति, धर्म के प्रति समर्पण और संस्कृति के प्रति असीम अनुराग। कदाचित इसी गुण ने इन्हें भारत का शौर्य संपन्न अद्भुत स्वतंत्रता सैनानी बना दिया। तभी तो संपूर्ण समर्पण के साथ आज यह लेखनी चौहानवंशी इन स्वतंत्रता सेनानियों का हार्दिक अभिनंदन कर रही है। आहवमल्ल के विषय में समकालीन कवि लक्ष्मण ने लिखा है कि-‘‘उसने शत्रु का मण्डल उजाड़ दिया। छल, बल, नीति और नयार्थ में वह अनुपम था। दुष्पेक्ष्यम्लेच्छ से रणरंग में भिडऩे वाला वही एक मल्ल था। वीर हम्मीर (एक मुस्लिम) के हृदय में वह शल्य की भांति खटकता था।’’

नागदा-मेवाड़ ने भी अल्तमश को चटा दी थी धूल

मेवाड़ का राणा वंश अपने जन्मकाल से ही बहुत ही गौरवमयी इतिहास और इतिहास परंपराओं का स्वामी रहा है। अल्तमश के समय इस वीर शिरोमणि वंश का प्रतापी हिंदू वीर शासक जैत्रसिंह था। उस समय इस वंश की राजधानी नागदा थी। ‘हम्मीरमदमर्दन’ नामक पुस्तक से हमें बड़ी स्पष्टसाक्षी मिलती है, जिससे इस वंश के गौरव में और भी अधिक अभिवृद्घि होती है। बताया जाता है कि अल्तमश ने जब मेवाड़ पर आक्रमण किया तो एक बार तो सारे राजपूत भौंचक्के रह गये। परंतु कुछ समयोपरांत उन्हें गुजरात के शासक वीरधवल की सेना के आगमन का समाचार मिला। हमारा मानना है कि यह सेना एक पूर्व नियोजित योजना के अंतर्गत ही आयी होगी, और इसके आने तक राजपूतों ने आत्मरक्षार्थ युद्घ किया होगा, जिसे कुछ इस प्रकार दिखाया गया है कि अल्तमश के आक्रमण से नागदा वाले भौंचक्के रह गये थे। परंतु उन्हें जैसे ही ये पता चला कि वीर धवल  की सेना निकट आ चुकी है तो उन्होंने दूने उत्साह से युद्घ करना आरंभ कर दिया।

जब तुर्क सेना को भागना पड़ा

उनके युद्घ में अचानक आए उत्साह को देखकर अब मुस्लिम तुर्क सेना भौंचक्की रह गयी। जब उसे पता चला कि उस उत्साह के पीछे कारण ये है कि वीरधवल की सेना भी युद्घ के लिए आ रही है। तब क्या था? बस, मुस्लिम सेना सिर पर पांव रखकर भागने लगी। इस भागती हुई सेना को इतिहास में चित्रित नही किया जाता। ‘हम्मीरमदमर्दन’ से हमें ज्ञात होता है कि इस भागती हुई सेना का मेवाड़ वालों ने दूर तक पीछा किया। इस भागती हुई सेना के कितने तुर्क सैनिकों को मार काटकर ‘मां काली’ की बलि चढ़ा दिया गया होगा- किसी ने नही गिना।

रणथम्भौर ने भी दी चुनौती

‘हम्मीरमहाकाव्य’ सर्ग 4 , ताजुलम आसिर व इलियट आदि के माध्यम से हमें ज्ञात होता है कि तुर्कों द्वारा दिल्ली छीने जाने पर पृथ्वीराज के चाचा हरिराज ने उसके पुत्र गोविन्द को निष्कासन देकर अजमेर से बाहर कर दिया था। तब मुसलमानों के करद के रूप में गोविन्द रणथम्भौर (पी.एन. ओक के अनसार-रण-स्तंभ-भ्रमर) में जाकर अपने छोटे से राज्य की स्थापना की। गोविन्द के पश्चात उसका पुत्र बाल्हाण और उसके पश्चात प्रहलाद वहां का शासक बना। प्रहलाद के पश्चात उसका अल्पव्यस्क पुत्र वीर नारायण शासक बना, जिसके संरक्षक का दायित्व उसके चाचा वाग्भट ने निर्वाह किया।

वाग्भट एक शूरवीर चौहान था, उसने उचित अवसर आते ही स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित करना चाहा। तब अल्तमश को इस सुदृढ़ दुर्ग को अपने अधीन रखने के लिए रणथंभौर पर चढ़ाई करनी पड़ी। ‘हम्मीर महाकाव्य’ की साक्षी के अनुसार एक षडय़ंत्र के अंतर्गत वीरनारायण को दिल्ली बुलाकर मार दिया गया और वाग्भट अपमानित होकर मालवा की ओर चला गया।

परंतु मिनहाज ‘तबकाते नासिरी’ में कहता है कि ईश्वर की कृपा से दुर्ग पर (अल्तमश का) नियंत्रण हो गया, जिसे लेने में 70 बादशाहों को असफल होना पड़ा था। हमें जो साक्षी ‘हम्मीरमहाकाव्य’ से ही मिलती है, वो ये है कि वाग्भट ने मात्र बारह वर्ष पश्चात ही रणथम्भौर को पुन: अपने नियंत्रण में ले लिया था। अल्तमश की मृत्यु (1236 ई.) के पश्चात रणथम्भौर पर फिर हिंदू केसरिया लहराने लगा, जो वाग्भट की स्वतंत्रता प्रेमी भावना का प्रतीक था।

यह दुर्भाग्य है हमारे देश का कि यहां भरतपाल और वाग्भट को इतिहास से निकाल दिया गया है। परंतु अब हमें इन जैसे शूरवीरों को अपनी स्वतंत्रता का महायोद्घा घोषित करना चाहिए। आजादी जिन बीहड़ जंगलों से रास्ता बनाती आगे बढ़ी, उन रास्तों में इन शूरवीरों की समाधियों ने मील का पत्थर बन देशप्रेमियों का मार्ग दर्शन किया है। इस तथ्य को हमें भूलना नही चाहिए।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
deneme bonusu
vaycasino giriş
betpark giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
winxbet giriş
winxbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
ikimisli giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
safirbet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
betnano giriş
betpas giriş
betpas giriş
safirbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betasus giriş
betasus giriş
betpark giriş
betpark giriş
hitbet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
ikimisli giriş
savoybetting giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
betorder giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpas giriş
betpas giriş
betorder giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
betpas giriş
betorder giriş
betnano giriş
betnano giriş
mariobet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betnano giriş
betper giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betticket giriş
betnano giriş
betper giriş
betpark giriş
betpark giriş
savoybetting giriş