A_neta_Mikeभारत का सर्वोच्च न्यायालय अपना औचित्य, महत्व, निष्पक्षता और प्रासंगिकता को अनेकों बार स्थापित कर चुका है। अभी हाल ही में उसने फिर एक बार अपने आपको सरकार का ‘मार्गदर्शक’ सिद्घ किया है। यद्यपि लोकतंत्र में विधायिका और न्यायपालिका की अपनी-अपनी सीमाएं हैं, और इन दोनों को कभी भी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नही करना चाहिए। परंतु कभी-कभी ऐसे क्षण भी आते हैं कि जब अपनी सीमाओं का ध्यान रखते हुए न्यायपालिका को विधायिका पर ‘शिकंजा’ कसना पड़ता है। तब लगता है कि न्याय, नियम और नैतिकता की बातों को विधायिका को पढ़ाने वाला कोई संस्थान भी देश में है। वैसे बहुत  सी बातों को विधायिका को स्वयं ही दुरूस्त रखना चाहिए, परंतु राजनीति है कि जो अक्सर ‘बहक’ ही जाती है।

देश की राजधानी को ‘कांग्रेस विहीन’ करने के भाजपा के श्री नरेन्द्र मोदी ने काफी सफलता प्राप्त की है। रीढ़ विहीन कांग्रेस ने देश में उपस्थित रहकर भी देश को यह अनुभूति करायी है कि अब देश में उसका अस्तित्व नही है। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने पार्टी की अपेक्षाओं और अपने समर्थकों व पार्टी कार्यकर्ताओं को अपने कार्यकलापों से निराश किया है। फलस्वरूप देश के कांग्रेस विहीन होने की भ्रांति जन्मी है। अब यह राहुल गांधी पर निर्भर है कि वह पार्टी को कैसे ऊपर लाते हैं। भविष्य में यदि भाजपा गलतियां करती है और उनका लाभ कांग्रेस को मिलता है तो यह राहुल गांधी की ‘जीत’ नही होगी, बल्कि ‘विकल्पहीनता’ की स्थिति में  जनता का ‘विवशतावश’ कांग्रेस की ओर लौटना होगा। वैसे कांग्रेस में जिस प्रकार ‘प्रियंका लाओ-पार्टी बचाओ’ की मुहिम चल रही है, और सोनिया गांधी इस मुहिम को जिस प्रकार गंभीरता से ले रही हैं, उससे ‘युवराज’को समझ लेना चाहिए कि आने वाले दिन अच्छे नही हैं।

कांग्रेस ने राजनीति में कई ‘मानदण्ड’ स्थापित किये थे। उनमें से एक ‘दागी मंत्री’ होने का मानदण्ड भी था। लोकतंत्र में दागी कहा जाना सभ्य समाज का एक अपशब्द (गाली) है। दागी राजाओं का बोलबाला यूं तो कांग्रेस में आरंभ से ही रहा, पर ये ‘दागी राजा’ नरसिंहाराव और मनमोहन सिंह के जमाने में अधिक मुखर हुए। इसका अभिप्राय ये नही कि नेहरू गांधी परिवार के पी.एम. के रहते ये ‘दागी राजा’ मुखर नही थे, और इसमें इस परिवार की कोई विशेष भागीदारी थी। इसका अभिप्राय तो ये है कि जब सत्ता नेहरू गांधी परिवार से बाहर गयी तो उस समय सत्ता के असंवैधानिक केन्द्रों का जन्म हुआ और राजनीतिज्ञ मंत्रियों की निष्ठाएं अपने पी.एम. के प्रति न रहकर अपने ‘सुपर पी.एम.’ या दूर से डोर हिलाने वाले  नेता की ओर अधिक रहीं। जिससे तत्कालीन पी.एम. ने अपने प्रति अपने मंत्रियों की निष्ठाएं बनाये रखने के लिए उनके काले कारनामों की ओर से आंखें बंद कर लीं। इस प्रकार सरकार की बदनामी हुई, परंतु इस बदनामी में ‘हाथ’ तो कांग्रेस  के प्रमुख परिवार का ही रहा, और आज उसी ‘हाथ’ का परिणाम कांग्रेस का ये प्रमुख परिवार भोग रहा है। नेता होते हुए भी जब कोई संगठन नेता विहीन हो जाया करता है, तब वह सचमुच संकट से गुजर रहा होता है। 1977 ई. में कांग्रेस हारी पर कांग्रेस तब नेतृत्वविहीन नही थी। इसलिए 1980 में ही वह दुबारा सत्ता में लौट आयी। पर अब स्थितियां दूसरी हैं।

कांग्रेस ने देश को दागी लोगों के मंत्री बनने का कुसंस्कार दिया। यद्यपि इसमें भाजपा समेत कोई भी पार्टी पीछे नही रही है। इसलिए मनोज नरूला ने साहस करके एक जनहित याचिका माननीय सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल की। जिस पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय देते हुए स्पष्टकिया कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को अपना मंत्रिमंडल चुनने का हक है। इस विषय में उन्हें आदेश नही दिया जा सकता। पर अदालत ने उन्हें संवैधानिक दायित्वों का अहसास कराते हुए भ्रष्टाचार और गंभीर अपराधों के आरोपियों को मंत्री न बनाने की नसीहत भी दे दी।

बात साफ है कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को अपने मंत्रिमंडल चुनने का असीमित अधिकार नही है। लोकअभिस्वीकृति सदा ही लोकतंत्र के प्रत्येक कार्य के लिए  प्राप्त करनी आवश्यक होती है। यदि किसी कार्य पर लोक अभिस्वीकृति प्राप्त नही की गयी है तो चाहे वह कार्य लोकतंत्र  में कितना ही वैधानिक और लोकतांत्रिक क्यों न हो, उसे उचित नही कहा जा सकता।

लोकतंत्र में चोर दरवाजे से या पार्टी की लहर के प्रवाह से या बाहुबल का रास्ता अपनाकर गुण्डागर्दी से कोई व्यक्ति यदि सांसद या विधायक बन जाता है, तो उसे इस ‘योग्यता’ के आधार पर मंत्रिपद दिया जाना लोक-अभिस्वीकृति प्राप्त नही करा पाता। हमारे प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों को ऐसी योग्यता प्राप्त सांसदों और विधायकों के चरित्र और चित्र दोनों का भली प्रकार ज्ञान होता है। इसलिए सार्वजनिक जीवन में शुचिता स्थापित करने के दृष्टिïगत उनका प्रथम दायित्व होता है कि वे दागी को बागी होने के लिए तो खुला छोड़ दें पर उसे सत्ता में भागी ना बनायें। सर्वोच्च न्यायालय ने सावधानी से कार्यपालिका को अपनी जो सलाह दी है, उसका सारतत्व यही है और हमारी सरकारों को इस ओर समय रहते ध्यान देने की आवश्यकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह दिया है। यह अच्छी परंपरा है और इस परंपरा का निर्वाह करना प्रत्येक लोकतांत्रिक सरकार का दायित्व है।

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş