“महत्वपूर्ण पुस्तक स्वामी ‘स्वामी वेदानन्द तीर्थ के आत्म संस्मरण’ का प्रकाशन”

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ओ३म्

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वैदिक साहित्य के प्रकाशन केन्द्र ‘हितकारी प्रकाशन समिति, हिण्डौनसिटी’ की ओर से समय-समय पर महत्वपूर्ण नवीन एवं दुर्लभ वैदिक साहित्य का प्रकाशन होता रहता है। कुछ महीने पहले सन् 2021 में समिति की ओर से ऐसा ही एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है जिसका नाम है ‘स्वामी वेदानन्द तीर्थ के आत्म संस्मरण’। इस पुस्तक के संकलनकर्ता व सम्पादक स्वामी वेदानन्द तीर्थ जी के अन्तेवासी शिष्य पं. सत्यानन्द शास्त्री जी हैं। पुस्तक लम्बे समय से अनुपलब्ध थी। इस पुस्तक के प्रकाशन से पुरानी एवं नई पीढ़ी के पाठकों को आर्यसमाज के एक प्रमुख विद्वान संन्यासी के जीवन के अनेक प्रमुख पहलुओं वा प्रसंगों को पढ़ने वा जानने का अवसर मिलेगा। बहुत पहले हमने भी स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी पर एक लेख लिखा था। तब हमें यह पुस्तक पं. सत्यानन्द शास्त्री के अमेरिका में प्रवास कर रहे पुत्र डा. अरुणाभ जी से शास्त्री जी के चित्र सहित प्राप्त हुई थी। पुस्तक अत्यन्त महत्वपूर्ण है। सभी आर्य बन्धुओं वा पाठकों को इसका अध्ययन करना चाहिये। इससे पाठकों के स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी के जीवन विषयक ज्ञान के साथ आर्यसमाज के इतिहास की कुछ घटनाओं को जानने में सहायता मिलेगी। पुस्तक का प्रकाशन हितकारी प्रकाशन समिति, पताः- ‘अभ्युदय’ भवन, अग्रसेन कन्या महाविद्यालय मार्ग, स्टेशन रोड, हिण्डौन सिटी, (राजस्थान)-322230 से हुआ है। प्रकाशक महोदय से उनके मोबाइल नम्बर 7014248035 एवं 9414034072 पर सम्पर्क किया जा सकता है। पुस्तक का मूल्य 80.00 रुपये है। पुस्तक की पृष्ठ संख्या 144 है।

पुस्तक की प्रस्तावना स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी के शिष्य पं. सत्यानन्द शास्त्री जी ने लिखी है। प्रस्तावना में वर्णन किया गया है कि संस्कृत पठनपाठन में निरन्तर लगे रहने के कारण स्वामी वेदानन्द तीर्थ का ज्ञान परिपक्वता को प्राप्त हो चुका था। वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों और उपनिषदों के आप मर्मज्ञ थे, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष इन छहों वेदांगों में आप पारंगत थे, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग, मीमांसा और वेदान्त इन छः शास्त्रों पर आप को पूर्ण अधिकार था, काव्य, नाटक, छन्द, अलंकार आदि सब लौकिक विषय आपको उपस्थित थे। कोई भी व्यक्ति, कहीं से भी कोई स्थल ले आता, आप तुरन्त उसकी प्रसंगोचित संगति लगा संतोषजनक व्याख्या कर दिया करते थे। विद्यार्थिगण जिस किसी भी विषय को जहां कहीं व्यक्त करते, उसका पाठ उज्जवल मोतियों की लड़ी की भांति तुरन्त ही स्वामी जी महाराज के मुखारबिन्दरूपी झरने से शब्दायमान होता हुआ निकलने लगता था। आर्य भाषा (हिन्दी), बंगला, गुजराती, मराठी, सिन्धी, काश्मीरी, पश्तो, उर्दू आदि देशीय भाषाओं पर आपको पूरा अधिकार हासिल था। अंग्रेजी भाषा के विद्वान् होने के अतिरिक्त आपको फारसी, अरबी, जर्मन, फ्रेंच, लैटिन, ग्रीक, हिब्रू आदि विदेशी भाषाओं का भी कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त था। अपने साठ-पैंसठ वर्ष के जीवन में आपने पचास से अधिक वर्ष सरस्वती की आराधना में गुजारे थे। यही कारण था कि विद्यार्थियों के झुण्ड के झुण्ड आप के निवास स्थान पर अध्ययन लेने के लिये एकत्रित होते थे। यदि कहा जाय कि ‘‘आपने आर्यसमाज को सौ से अधिक विद्वान् संन्यासी, उपदेशक और कार्यकर्ता दिये” तो इसमें कोई अत्युक्त न होगी। यह भी बता दें कि प्रस्तावना साढ़े चार पृष्ठों में पूर्ण हुई है जिसमें पाठकों को स्वामी जी के विषय में अनेक बातें जानने को मिलेंगी। यह प्रस्तावना शास्त्री जी ने न्यूयार्क, अमेरिका में जनवरी, 2006 में लिखी थी।

पुस्तक में विषय-सूची नहीं है। छोटे-छोटे अध्यायों में स्वामी वेदानन्द जी के विषय में जानकारियां प्रस्तुत की गई हैं। जिन विषयों वा शीर्षकों के अन्तर्गत सामग्री को प्रस्तुत किया है वह हैं 1- स्वामी वेदानन्द तीर्थ के आत्म-संस्मरण, 2- जन्म-स्थान और परिवार, 3- नाम, 4- चक्षुर्विहीन होना, 5- दृढ़ संकल्प, 6- आर्यसमाज से सम्पर्क, 7- वेद कितने बड़े हैं, 8- गृह त्याग, 9- अष्टाध्यायी कण्ठस्थ करना, 10- दिव्य दर्शन, 11- मकर जाल, 12- संन्यास-दीक्षा, 13- घोर अन्धेरी रात, 14- सब पथ प्रशस्त हो गये, 15- गुरुजनों के चरणों में, 16- पादरी से नोक झोंक, 17- पुस्तकों से प्रेम, 18- राजज्योतिषी जेल में, 19- एनफ्लुएंजा पीड़ितों की सेवा, 20- आर्य छात्रावास, 21- लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम, 22- साहसी सभा संचालक, 23- वैदिक संस्कारों का महत्व, 24- देवासुर संग्राम, 25- तिवाड़ी जी, 26- सम्बन्धियों का ढूंढ़ते आना, 27- जलियांवाला बाग त्रासदी, 28- ऋषिकृत वेदभाष्य का अध्ययन, 29- शास्त्रार्थ महारथी, 30- वशिष्ठों की शुद्धि, 31- एकान्तवास, 32- रावलपिण्डी में कयाम, 33- आदर्श भिक्षुक, 34- महान् साधक, 35- अद्भुत संयमी, 36- कुरान शरीफ पढ़ाना, 37- शिव संकल्प एवं 38- श्री स्वामी विज्ञानानन्द सरस्वती (यह स्वामी विज्ञानानन्द जी का 6 पृष्ठों में संक्षिप्त जीवन परिचय है)। इसके बाद परिशिष्ट-1 है जिसमें चोरी, छुआछूत सम्बन्धी भयंकर भूल तथा अन्तिम समय शीर्षक से विषयों का प्रतिपादन है। परिशिष्ट-2 में स्वामी वेदानन्द जी की पुस्तक ‘राष्ट्ररक्षा के वैदिक साधन’ पुस्तक से प्राक्कथन को उद्धृत किया गया है जिसे भारत के प्रथम विधि मंत्री डा. बी.बार. अम्बेडकर जी ने लिखा है। पुस्तक के अन्त में पुस्तक के लेखक पं. सत्यानन्द शास्त्री जी की संक्षिप्त परिचय (मात्र एक पृष्ठ) है। शास्त्री जी का वय 93 वर्ष (1916-2009) रहा है। पुस्तक के अन्त में स्वामी वेदानन्द सरस्वती जी का एक चित्र है और आभार रूप में बताया गया है कि इस पुस्तक का प्रकाशन पं. सत्यानन्द शास्त्री जी के अमेरिका निवासी पुत्र डा. अरुणाभ जी एवं पुत्रियों के आर्थिक सहयोग से हुआ है।

हम पाठकों से पुनः निवेदन करेंगे कि इस भव्य पुस्तक को सभी आर्यबन्धु प्राप्त कर अध्ययन करें जिससे इस पुस्तक के लेखक का पुरुषार्थ सफल होने सहित पाठकों को भी पुस्तक में निहित ज्ञान व जानकारियों का लाभ प्राप्त हो सके। प्रकाशक महोदय ऋषिभक्त यशस्वी श्री प्रभाकरदेव आर्य जी ने इस पुस्तक को प्रकाशित करके आर्य साहित्य में वृद्धि करने के साथ एक अभाव की पूर्ति भी की है। इसके लिए वह आर्यजगत की ओर से हार्दिक बधाई के पात्र हैं। ईश्वर आर्य जी को स्वस्थ जीवन एवं दीर्घायु प्रदान करें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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