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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

कांग्रेस :  लगता है पापों का घड़ा भर चुका है

पंजाब का अपना शानदार इतिहास रहा है। यहां पर गुरु नानक द्वारा डाली गई गुरु परंपरा में हुए कई गुरुओं ने देश के धर्म, संस्कृति और इतिहास की रक्षा के लिए अपने अनेकों बलिदान दिए हैं। हिंदू धर्म और हिंदू संस्कृति की रक्षा के लिए जन्मे सिक्ख पंथ के लोगों की जितनी भी प्रशंसा की जाए, उतनी कम है। आज भी पंजाबी न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी कई क्षेत्रों में बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं और अपनी विशेष पहचान बनाने में सफल रहे हैं। देश में विदेशी शासकों से लड़कर देश की अस्मिता के लिए गौरवशाली बलिदान दिए हैं। उसके बाद देश की आजादी के आंदोलन में भी सिखों ने बढ़-चढ़कर योगदान दिया। जब देश का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर जिन्नाह की नीतियों के चलते हुआ तो उस समय भी पंजाब और पंजाब के लोगों ने सबसे अधिक कष्ट उठाए थे। ननकाना साहिब सहित कई ऐसे स्थान खोने का दर्द न केवल पंजाबियों को बल्कि पूरे देश को है, जो आज पाकिस्तान के पास हैं।
  शत्रु देश पाकिस्तान को पंजाब के लोगों की खुशियां कभी रास नहीं आईं। सांप्रदायिक विद्वेष की भावना में झुलसा हुआ पाकिस्तान जहां 1947 – 48 में पंजाबियत को कष्ट दे रहा था वहीं उसने 1971 में अपनी मूर्खतापूर्ण नीतियों के चलते अपने से ही दूर हुए बांग्लादेश का बदला भारत से लेने के लिए 1972 में आनंदपुर साहिब प्रस्ताव पास कराकर भारत के पंजाब प्रान्त में आग लगाने का घृणास्पद कार्य किया। फलस्वरूप पंजाब अगले लगभग डेढ़ दशक तक आतंकवाद की आग में झुलसता रहा । भारत को बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ा। जिन सिखों पर पूरा देश गर्व करता था उनमें से कई लोग पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली बनकर अपने ही देश के विरुद्ध कार्य करने लगे। यद्यपि सिक्ख समाज की बड़ी संख्या निरंतर भारत की मुख्यधारा के साथ जुड़कर कार्य करने में विश्वास करती रही। उस समय केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी , जिन्होंने पहले भिंडरावाले को तैयार किया और उसके पश्चात अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर कार्यवाही करके उसका अंत भी किया। परिणाम यह हुआ कि इंदिरा गांधी को भी अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। उसके बाद नवंबर 1984 के दंगों से पूरा देश दहल गया।
  1984 के दंगों के समय कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने कहा था कि जब बड़ा वृक्ष गिरता है तो धरती हिलती है । इस प्रकार उन्होंने एक बचकाना बयान देकर 1984 के दंगों के प्रति अपनी संवेदनहीनता प्रकट कर दी, जिसे पंजाब के लोगों ने कभी माफ नहीं किया। कांग्रेस ने भाषाई आधार पर पंजाब का विभाजन किया और आज का हरियाणा व हिमाचल प्रांत पंजाब से अलग कर पंजाब में केवल पंजाबी भाषा बोलने वालों का वर्चस्व स्थापित किया । यद्यपि वहां पर हिंदी बोलने वाले हिंदू फिर भी रह गए थे। भाषायी आधार पर किया गया यह विभाजन वास्तव में सांप्रदायिक आधार पर किया गया विभाजन सिद्ध हुआ। क्योंकि कई सिखों ने अपने आपको एक अलग देश के लोग मरने के लिए ढिंढोरा पीटना आरंभ किया।
     कांग्रेस ने जिस प्रकार पंजाब में आग लगाई उससे वहां के जनमानस ने कांग्रेस के प्रति अपने आक्रोश को कई बार व्यक्त किया है। आज का कांग्रेसी नेतृत्व यह भली प्रकार जानता है कि उसके गलत निर्णयों के कारण पंजाब को बहुत बड़ी क्षति उठानी पड़ी है। उस क्षतिपूर्ति के लिए कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व वहां पर जिस प्रकार की राजनीति कर रहा है, उससे और भी अधिक खतरनाक संकेत मिल रहे हैं। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी जिस प्रकार हिंदू विरोध की राजनीति करती रही हैं, उसी का अनुकरण उनके बेटे राहुल गांधी और बेटी प्रियंका गांधी भी कर रही हैं।
    2014 वर्ष 2014 में जब देश में आम चुनाव हुए थे तो उस समय कांग्रेस की बड़ी ही दयनीय स्थिति हो गई थी। तब कांग्रेस ने अपनी उस दुर्दशा का पता लगाने के लिए ए0के0 एंटोनी जांच कमेटी का गठन किया था। जिसे इस बात का पता लगाना था कि चुनाव में कांग्रेस की दुर्गति क्यों हुई ,? इस जांच कमेटी ने बड़ी निष्पक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए यह स्पष्ट किया था कि देश में कांग्रेस की हिंदू विरोधी होने की छवि बन चुकी है। तब जांच कमेटी के इस निष्कर्ष को कांग्रेस के नेतृत्व को स्वीकार कर अंतरावलोकन करना चाहिए था। उसके लिए उचित था कि अपने आचरण की निष्पक्ष समीक्षा करके कमेटी के निष्कर्ष को आत्मसात करती और देश के हिंदू समाज के प्रति अपनी निष्पक्षता और न्यायप्रियता का प्रमाण देते हुए अपने आचरण में सुधार करती, परंतु ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस का गांधी परिवार इस अहम भाव में जीता है कि वह जो कुछ करता है , ठीक करता है । वास्तव में कांग्रेस के नेता और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के समय ही इस परिवार को ‘बेताज का बादशाह’ कहने का जिस प्रकार अलोकतांत्रिक प्रचलन आरंभ हुआ था, उसने इस परिवार के लोगों के भीतर झूठा बहम और अहम पैदा कर दिया। लोगों ने चाटुकारिता करते हुए परिवार के बहम और अहम को और भी अधिक बढाया । ‘इंदिरा इज इंडिया एन्ड इंडिया इज इंदिरा’ के बोल इसी चाटुकारिता के लक्षण थे।
       प्रसिद्ध लेखक मदनलाल बिरमानी ने एक पुस्तक ‘भारत विभाजन का दुखान्त और संघ’ लिखी है। जिसमें उन्होंने एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि जब देश का विभाजन हुआ था तो उस समय पंजाब में मुस्लिम लीग के हथियारबंद लोगों का बहुत अधिक दबदबा था। उसी समय पंडित जवाहरलाल नेहरु पंजाब के दौरे पर आए थे। उस समय मुसलमानों से अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित और दु:खी हिंदू व सिक्ख लोगों ने एक शिष्टमंडल के रूप में देश के प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी और उन्हें बताया था कि उन्हें आत्मरक्षा के लिए कुछ हथियार उपलब्ध करवाए जाएं।
   पंजाब के हिंदू और सिखों की यह मांग किसी भी दृष्टिकोण से अनुचित नहीं थी। देश के प्रधानमंत्री को भी यह समझना चाहिए था कि उनकी मांग का बहुत ही अधिक महत्व है। विशेष रूप से तब जब उनके लिए उस समय अपने प्राणों की रक्षा करना बड़ा कठिन काम हो चुका था। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू से अपेक्षा थी कि वे पंजाब के हिंदू और सिखों को यह भरोसा दिलाते कि उन्हें किसी भी स्थिति में मुसलमानों से घबराने की आवश्यकता नहीं है और सारा शासन प्रशासन उनके साथ है । यदि आवश्यकता होगी तो उन्हें हथियार भी उपलब्ध करवाए जाएंगे। नेहरू ने उस शिष्टमंडल को उसकी मांग पर जिस प्रकार प्रत्युत्तर दिया उससे शिष्टमंडल के लोगों को बहुत निराशा हाथ लगी। पंडित नेहरू ने कह दिया था कि ‘यदि उन्होंने हिन्दू-सिखों को हथियार उपलब्ध करवाए तो मुसलमानों को भी ये सुविधा देनी होगी।’
इस पर शिष्टमण्डल के नेता ने कहा कि ‘ठीक है, हमें मरना ही है तो कम से कम इतना करें कि, आप ही हमें मार दें।’ एक दैनिक में छपे एक लेख के अनुसार हमें पता चलता है कि इस पर नेहरू जी के पास कोई उत्तर नहीं था।
इस प्रकार नेहरू के समय ही यह स्पष्ट हो गया था कि उनके लिए मुसलमान कहीं अधिक प्रिय हैं, हिंदू और सिख उतने प्रिय नहीं हैं। मुस्लिम सांप्रदायिकता के सामने हिंदू सिखों को मेमने की भांति परोसने का काम करना भी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के समान ही था। यह बहुत ही दु:खद है कि उस समय नेहरू जी ने हिंदू और सिखों को उपेक्षित करना राष्ट्र हित में उचित माना । कांग्रेस का यह कुसंस्कार कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व के भीतर भी गहराई से बैठा हुआ दिखाई देता है । देश विरोधी शक्तियों के सामने हिंदू समाज को मेमने के रूप में परोसने की कांग्रेस की इस परंपरा का वर्तमान नेतृत्व भी पूर्ण मनोयोग के साथ पालन कर रहा है।
   यही कारण रहा कि उसने कैप्टन अमरिंदर सिंह की विदाई के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री के चयन में हिंदू के प्रति उपेक्षा का दृष्टिकोण अपनाया। इस संदर्भ में श्री जाखड़ का कहना है कि उस समय पंजाब प्रदेश अध्यक्ष चौधरी सुनील कुमार जाखड़ के साथ 79 में से 42 विधायक उनके साथ थे। इसके उपरांत भी कांग्रेस नेतृत्व ने 2 विधायकों को साथ लेकर चलने वाले चन्नी को प्रदेश की कमान सौंप दी।
  वास्तव में बहुमत के नेताओं की उपेक्षा कर अपनी मनपसंद के नेता को नेता बनाने यह कुसंस्कार भी कॉंग्रेस को महात्मा गांधी की देन है। महात्मा गांधी के विषय में हम सभी यह भली प्रकार जानते हैं कि उन्होंने अपने जीवन काल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अध्यक्ष बनने के उपरांत भी अध्यक्ष पद से हटने के लिए मजबूर कर दिया था और इसी प्रकार स्वतंत्रता की प्रभात में देश का प्रधानमंत्री बनने से सरदार पटेल को रोक दिया था। गांधी नेहरू और उसके पश्चात इंदिरा गांधी ने रीढ़विहीन कठपुतली नेताओं को आगे बढ़ने का अवसर दिया । इसके पीछे कारण केवल एक ही था कि वे नहीं चाहते थे कि जमीन से जुड़ा नेतृत्व आगे आकर उनका सामना करे। कांग्रेस के बड़े नेताओं की इस प्रकार की सोच ने ही कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया है।
    पंजाब में श्री जाखड़ के साथ जो कुछ हुआ है उससे पता चलता है कि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व इतिहास की गलतियों से शिक्षा लेने के लिए तैयार नहीं है । एक परिवार की परिक्रमा होती चलती रहे , सारा कांग्रेसी नेतृत्व इसी जुगाड़ में लगा हुआ दिखाई देता है। अब कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी ने जिस प्रकार उत्तर प्रदेश के और बिहार के लोगों के प्रति अभद्र भाषा बोल रहे पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी की बातों पर ताली बजाई है, उससे स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस का नेतृत्व दिमागी रुप से दिवालिया हो चुका है। देश के लोगों के प्रति ही ऐसी भाषा बोलने वाले मुख्यमंत्री को कांग्रेस की नेता उसी समय रूकती तो अच्छा लगता।
      यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के चुनावों के परिणाम आने से पहले ही सारे प्रदेश से अपना बोरिया बिस्तर बांध लिया है। उसने मान लिया है कि पिछले 32 – 33 वर्ष से जिस प्रदेश में उनकी सरकार नहीं बनी है, उसमें अब चुनाव लड़ने का कोई लाभ नहीं है। कांग्रेस अपने भविष्य के प्रति भी चिंतित दिखाई नहीं देती । वह जहां हिंदू के प्रति उपेक्षा भाव के लिए कुख्यात हो चुकी है वहीं अब अपनी ही जड़ों को खोदने में लगी होकर उपहास का कारण भी बनती जा रही है। लोगों में अक्सर चर्चा सुनने को मिलती है कि जब गीदड़ का समय बुरा आता है तो वह गांव की ओर भागता है अर्थात आत्मघाती नीति चुनना कांग्रेस को गीदड़ के समान मानसिकता वाली पार्टी के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। लगता है पापों का घड़ा भर चुका है। यद्यपि हमारा यह भी मानना है कि देश को इस समय एक सशक्त विपक्ष की आवश्यकता है कांग्रेस अपने राष्ट्र धर्म से पीछे हटकर जिस प्रकार केंद्र की मोदी सरकार के लिए मैदान खुला छोड़ रही है उसका सबसे अधिक नुकसान उसे स्वयं ही भुगतना पड़ेगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक :  उगता भारत

   

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