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पुस्तक समीक्षा

पुस्तक समीक्षा : बूढ़े बागवानों की कहानियां

एक समय था जब बड़े बूढ़ों के पास बैठकर लोग उनसे या तो ज्ञानवर्धक कहानियां सुनते थे या उनके अनुभवों को सुन समझकर उनसे लाभ उठाने का प्रयास किया करते थे । तब बड़े बुजुर्गों के पास महफिलें लगा करती थीं और तरह-तरह की बात पूछते हुए लोग देखे जाते थे । परंतु आजादी के बाद की पीढ़ी ने जितनी तेजी से पश्चिमी संस्कृति से जुड़ना आरंभ किया उतनी ही तेजी से उसने अपने बड़े-बुजुर्गों की उपेक्षा करना भी आरंभ कर दिया। जिसका परिणाम यह निकला है कि आज प्रत्येक   बुजुर्ग घर के एक कोने में उपेक्षित हुआ पड़ा है। उसके अनुभवों से लाभ लेने वाला कोई नहीं है। यहां तक कि कई बुजुर्गों के सामने तो खाने-पीने की समस्या भी भयंकर रूप में आ खड़ी हुई है। संतान मुंह मोड़ चुकी है और खाने-पीने रहने सहने का कोई साधन नहीं है । संस्कारों की बात करने वाला भारतीय समाज संस्कारों के मामले में खोखला होता जा रहा है, जो कि बहुत ही चिंता का विषय है।
   प्रत्येक सफल साहित्यकार अपने समकालीन परिवेश पर और सामाजिक परिस्थितियों पर अवश्य लिखता है। जिससे समाज को सही दिशा दी जा सके और समाज में आती हुई विकृतियों को रोकने की ओर भी समय रहते उचित कदम उठाया जा सके।
‘बूढ़े बागवानों की कहानियां’ – रामगोपाल ‘राही’ जी के द्वारा लिखी गई ऐसी ही कहानियां हैं। राही जी ने वर्तमान समाज में वृद्धावस्था में जिस प्रकार की स्थिति-परिस्थिति का प्रत्येक वृद्ध को सामना करना पड़ रहा है, उसका अपनी कहानियों के माध्यम से सटीक चित्रण किया है। प्रस्तुत पुस्तक में उनके द्वारा लिखी गई प्रत्येक कहानी आज के समाज की सच्चाई को कह रही है और हमें बता रही है कि भारतीय समाज में इस समय अनेकों वृद्धजन ऐसे हैं जो अपने जीवन को जैसे-तैसे किसी न किसी प्रकार ढो रहे हैं। जीवन के प्रति उनका आकर्षण समाप्त हो चुका है। वह बहुत ही नीरस और उदासी के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं । प्रस्तुत पुस्तक में दी गई कहानियों के माध्यम से ऐसे बुजुर्गों की व्यथा-कथा प्रत्येक पाठक को भीतर से मथ डालती है, हृदय को झकझोर देती है।
   ‘न्याय पथ पर न्यायाधीश’ नामक अपनी कहानी में लेखक लिखते हैं – ‘बेटा अपनी बात मकान खाली करने पर अड़ा था, अब रोज-रोज बाप-बेटे में तकरार होने लगी। बुजुर्ग सेवानिवृत्त न्यायाधीश त्रिवेदी जी की प्रतिष्ठा दांव पर थी ।पति पत्नी दोनों सोचते, नितिन का आंख का पानी मर गया। जो इतना बेमुरव्वत- निर्लज्ज हो गया। मां रचना त्रिवेदी बोली – हां, कलेजे का टुकड़ा ही आज बेरुखी का व्यवहार कर रहा है।
इस पर बुजुर्ग सेवानिवृत्त न्यायाधीश त्रिवेदी बोले- क्या करें  रचना, क्या न करें ? फिर कहा – एक ही तो लड़का है, अच्छा है, बुरा है, है तो अपना, कमीज गंदी हो जाए , तो उसे फेंका नहीं जाता, हम अपने लड़के को समझा ही सकते हैं।’
   न्यायाधीश त्रिवेदी जी की भांति आज बहुत से घरों में हर पिता न्याय की तलाश में है। जिनकी स्थिति को देखकर बड़ी दया आती है। जिस देश में पितृ देवो भव: मातृ देवो भव: – का संदेश सुना जाता था और लोग उसी के अनुसार आचरण भी करते थे उस देश में वृद्धाश्रम बड़ी तेजी से बनते जा रहे हैं। आने वाले समय में इनमें वही लोग रहेंगे जो आज की पीढी के पहरेदार हैं। सब को यह पता है कि बुढ़ापा सभी को आना है, परंतु इसके उपरांत भी युवा पीढ़ी अपने बुजुर्गों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रही है।
   बहुत सहज सरल भाषा में विद्वान लेखक ‘एक घर के दो घर’ नामक कहानी में लिखते हैं – ‘अब ससुर-बहू के झगड़े की बात बेटे तक पहुंचती ही पहुंचती। इस पर बेटा पीयूष पत्नी का पक्ष लेता और बोलता – पिताजी यह रोजाना क्या चिक-चिक करने लग गए आप ? – फिर कहता आपको रोटी खानी है, खाना खा कर आराम किया करो। आगे कहता – मम्मी को मरे अभी दो महीना ही हुआ है। पिछले दो महीने में एक दिन भी ऐसा नहीं गया, जिस दिन आपने चिक-चिक नहीं की हो। बेटे की बात सुन बृजभूषण जी बेटे से कहते पत्नी की बात तो तुमने कह दी, फिर कहा – मेरे दुखों की अनुभूति होती है क्या तुम्हें ? बेटे से ही प्रश्न  कर पूछते – मुझ बुड्ढे के लिए डेढ़ दो बजे खाना रखना ठीक है क्या ? बेटे , भूख के मारे मैं परेशान हो जाता हूं। कभी सोचा है तुमने ?’
    इस पुस्तक की प्रत्येक कहानी जहां समाज की वर्तमान दुर्दशा को प्रकट करती है वहीं बहुत महत्वपूर्ण संदेश देती हुई भी दिखाई देती है। प्रत्येक कहानी का अंत लेखक ने किसी न किसी गहरी शिक्षा के साथ ही किया है। ऐसा संदेश देने का प्रयास किया है जिससे परिस्थितियों में सुधार हो सके या कोई गहरी शिक्षा लेकर वर्तमान समाज और युवा पीढ़ी किसी सकारात्मक चिंतन के साथ जीना सीख जाए। कहानियों के इस प्रकार शानदार अंत में ही विद्वान लेखक की विद्वता और गहरी समझ कर राज छुपा है।
आज टीवी और सोशल मीडिया में खोए हुए युवा को इस पुस्तक को अवश्य पढ़ना चाहिए। जिससे कि वह वर्तमान को समझ सके और आने वाले कल के लिए संभल सके। जीवन बड़ी तेजी से गुजर रहा है और इससे पहले कि जीवन की सांझ हो आज के समाज और युवा को संभल जाना चाहिए, अन्यथा आज जहां बड़े बुजुर्गों को भेजने के लिए स्थान बनाए जा रहे हैं वहां आज का युवा ही बुढापे के रूप में रो रहा होगा।
  इस पुस्तक को साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर 302003 द्वारा प्रकाशित किया गया है। पुस्तक प्राप्ति के लिए 0141- 2310785, 4022382 पर संपर्क किया जा सकता है। पुस्तक का मूल्य ₹200 है। पुस्तक की कुल पृष्ठ संख्या 104 है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
  
   
 

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