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वैचारिक तरंगों से ही है सृष्टि का व्यापार

जैसा मन होता है वैसा परिवेश सृजित होता है। इसलिए जीवन में हमेशा कल्पनाओं, लक्ष्यों और भावनाओं को इतना ऊँचा रखें कि इनके साकार हो जाने पर शाही और आनंदमय जीवन प्राप्त हो सके। जो हमारे मन में सूक्ष्म धरातल पर होता है वही कालान्तर में अनुकूलearth businessताएं और वैचारिक भावभूमि का सुदृढ़ आधार पाकर स्थूल रूप में परिणित हो जाता है।

बीज से लेकर वटवृक्ष तक निर्माण की ही तरह कोई सा विचार हो, वह पहले सूक्ष्म होता है और उसके प्रति जितना अधिक चिंतन, मनन और तीव्रतर कर्षण होगा उतना वह अधिक अनुकूलताएं प्राप्त करता है। एक बार कोई विचार या कल्पना मन में उठने के बाद इनका सूक्ष्म धरातल पर तरंगायित होना शुरू हो जाता है। यह अपनी समानधर्मा वैचारिक तरंगों और अनुनादों को अपनी ओर आकर्षित करना आरंभ कर देता है, चाहे वे ब्रह्माण्ड के किसी भी कोने में व्याप्त क्यों न हो।

विचार की शुद्धता और उसके प्रति समर्पित निरन्तर चिंतन, उसे साकार करने की ललक तथा पाने की तीव्रता जैसे कारक मिलकर इन वैचारिक तरंगों के अनुनादीय आभामण्डल को विस्तार भी देते हैं और साथ ही घनत्व भी बढ़ाते रहते हैं।

एक बार विचार या कल्पनाओं की तरंगें उठने के बाद कभी समाप्त नहीं होती। इनका अस्तित्व पृथ्वी के रहने तक बना रहता है। हो सकता है किसी कालखण्ड में उस विचार को आगे बढ़ने और विस्तार पाने का अवसर न मिले, लेकिन कभी न कभी यह मौका आता ही है जब यह सुप्त पड़ा विचार अपनी बराबरी की वैचारिक तरंगें प्राप्त कर शक्तिशाली हो जाता है और शक्ति पुंज के रूप में परमाण्वीय क्षमताओं के साथ स्थूल रूप में साकार हो उठता है।

इसलिए जीवन में जो कुछ कल्पना करें, विचार हों और लक्ष्यों को पाने के लिए तमन्नाएं हों, उन्हें हर मंच पर अभिव्यक्त जरूर करें और उसके अनुरूप प्रयास भी करते रहें। कई बार हम शुरूआत भर कर देते हैं और उसी संदर्भ की तरंगों का महा आभामण्डल पहले से ही व्योम में विद्यमान होता है और उसे सिर्फ हमारी थोड़ी सी ताकत की ही आवश्यकता भर होती है, जो प्राप्त होते ही वह साकार हो उठता है।

यही कारण है कि कई बार हमें मामूली प्रयासों से ही इतना बड़ा श्रेय प्राप्त हो जाता है कि हम इसकी न तो आशा ही कर पाते हैं और न ही कोई कल्पना। कारण यह कि हमसे पहले के लोगों और पूर्ववर्ती दशकों एवं युगों से इस प्रकार के विचारों का पल्लवन होता रहा है और हमारे वैचारिक स्पंदनों तक पहुंचते-पहुंचते यह पूर्ण परिपक्वता के स्तर तक पहुंच चुका होता है। ऎसे में कोई दूसरा भी थोड़ी सी वैचारिक ऊर्जा संवहित कर देता है तो यह श्रेय उसके भाग्य में लिख दिया जाता है।

यही कारण है कि जिस किसी व्यक्ति पर ईश्वरीय अनुकंपा बरसने लगती है वह इस प्रकार के कल्याणकारी और अभिनव विचारों की श्रृंखला से जुड़ कर उसे परिपूर्णता प्रदान करने का सामथ्र्य पा लेता है और इससे सारा श्रेय उसी को प्राप्त हो जाता है।

कभी भी यह न सोचें कि हमारे सोचने से क्या होता है। इस प्रकार का विचार हर इंसान के लिए त्याज्य है। न केवल अपने जीवन बल्कि परिवेश, विश्व और ब्रह्माण्ड के स्तर पर भी जो-जो परिवर्तन होते हैं वे पहले बीज रूप में सूक्ष्म होते हैं और बाद में इसके अनुरूप वैचारिक तत्वों का आभामण्डल जुड़ता चला जाता है, जो इस सूक्ष्म विचार को निरन्तर परिपुष्ट करता रहता है, इसका आकार असीमित कर देता है और एक समय ऎसा आता है कि जब इस विचार को उतनी परम ऊर्जा प्राप्त हो ही जाती है कि यह अपने आप साकार हो जाए।

इन सभी का मूलाधार विचार है। दुनिया में जो कुछ हो रहा है वह सारा वैचारिक सूक्ष्मता से विराट तक के सफर को ही अभिव्यक्त करता है। हमारे दिमाग में जो-जो विचार आते हैं वे सारे के सारे कर्म इससे पहले के युगों में हो चुके होते हैं तभी हमारी कल्पनाओं में आते हैं। हमें हवा में उड़ने की कल्पना हमेशा रहती है, यह इसलिए कि पुष्पक विमानों का युग भी रहा है। कभी हमें यह कल्पना क्यों नहीं आती कि इंसान सर के बल चलने लगे। क्योंकि ऎसा पहले कभी नहीं हुआ, न आवश्यकता पड़ी, सिवाय शीर्षासन योेग के।

सार यही है कि विचार का प्रस्फुटन अनिवार्य है। यह अलग बात है कि इसके लायक ऊर्जा हम संकलित कर पाएं या नहीं, मिल पाए या नहीं, इसकी चिन्ता कभी न करें।  हर विचार सूक्ष्म से विराट का सफर तय करता है। इसलिए जीवन में हमेशा उच्च और शुद्ध-बुद्ध वैचारिक भावभूमि रखें, दिव्य और कल्याणकारी वैचारिक तरंगों का ही विस्फुरण करें क्योंकि एक न एक दिन वे स्थूल आकार प्राप्त करेंगी ही।

अपने ही विचारों से ही जगत से लेकर व्योम तक में नकारात्मक और सकारात्मक माहौल स्थापित होता है। इन दोनों का संतुलन हमेशा न्यूनाधिक रूप में परिवर्तित होता रहता है। जिस समय नकारात्मक भाव हावी रहते हैं तब दुनिया में विध्वंसकारी शक्तियों को संबल प्राप्त होता है और वे अंधकार फैलाने के प्रयासों में सफल हो जाते हैं,हिंसक माहौल पैदा करते हैं, भय, अशांति और आतंक का ताण्डव मचाने लगते हैं। जिस समय सकारात्मक चिंतन प्रबल होता है उस समय सात्ति्वक भावों का संचार एवं परिभ्रमण होने लगता है, अहिंसा और शांति का प्रभाव दिखने लगता है और सकारात्मक सोचने वाले लोगों को संबल एवं सुकून प्राप्त होता है।

समूचे ब्रह्माण्ड में माहौल कैसा हो? यह हम पर निर्भर है। हम सभी सकारात्मक और कल्याणकारी दिशा में सोचने लगें तो अपने आप माहौल में अच्छाइयों का घनत्व बढ़ जाएगा और इसका सीधा प्रभाव जीव तथा जगत सभी चराचर पर पड़ेगा ही। इसके लिए यह जरूरी नहीं कि नकारात्मक लोगों के खिलाफ हथियार उठाकर ही लड़ा जाए, हमारा वैचारिक चिंतन सकारात्मक हो जाने पर अपने आप चारों तरफ सकारात्मक तरंगों का प्रभाव छाने लगता है।

बात परिवेश की हो या आदमी के जीवन व्यवहार की। हमारे वैचारिक चिंतन की दिशा और दशा को अच्छी तरह समझ कर व्यष्टि से लेकर समष्टि तक सब को बदला जा सकता है कोई भी इंसान हो, वह जैसा सोचता है वैसा बन सकता है। लेकिन हमारी समस्या यह है कि हमें अपनी वैचारिक क्षमता और विचारों से वैश्विक परिवर्तन का ज्ञान नहीं है, न ही हम इस दिव्य रहस्य पर विश्वास कर पा रहे हैं।

जीवन का कोई सा पक्ष हो, हमेशा चिंतन और वैचारिक भावभूमि स्वच्छ, साफसुथरी और उच्चतम लक्ष्यों से भरी हुई रखें और इस बात का पक्का विश्वास रखें कि आज जो हम सोच रहे हैं वह कल जरूर पूरा होगा ही। हमेशा अपने आपको उच्चतम शिखर पर स्थापित करने की सोचें और उसी दिशा में प्रयास जारी रखें।

अपने लक्ष्य और विचार के प्रति अनन्य भाव, चरम श्रद्धा, तीव्र आकर्षण और अनुकरण के माध्यम से हम कैसा भी महान उल्लेखनीय स्थान या उपलब्धि पा सकते हैं, सांसारिक भोग-विलास और समृद्धि के प्रतीक उपकरणों एवं संसाधनों की प्राप्ति तो सामान्य बात है। इसी प्रकार नकारात्मक मानसिकता रखने पर हम अपने पास सब कुछ होते हुए भी इतने नीचे गिर जाते हैं कि दूसरे लोग हमें इंसान तक मानने को स्वीकार नहीं होते।

यह तय मानकर चलें कि सब कुछ मन, विचारों और तरंगों का ही विराट स्वरूप है। आज जो विराट रूप में हमारे सामने है, वह किसी समय सूक्ष्म विचार के रूप में पैदा हुआ और कालान्तर में समृद्ध होते-होते इस स्थिति तक पहुँचा है।  विचारों से मजबूत बनें, मजबूती पाएं।

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