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भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद इस देश की मूल चेतना का नाम है। यह हमारी शाश्वत सनातन कहानी को अपने भीतर समाये हुए है। हम सब देशवासियों को इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हमारा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही हमारी जीवंतता का प्रतीक है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की इस मूल चेतना के आलोक में काम करना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। जिससे हमारा हिंदुत्व प्रबल हो और हम सब एक गुरुत्वाकर्षण शक्ति अर्थात हिंदुत्व के केंद्र के प्रति समर्पित होकर काम करने के प्रति समर्पित हों। जब हम हिंदुत्व की बात करते हैं तो तो समझना चाहिए कि हम अपने तेजस्वी राष्ट्रवाद की बात करते हैं। भारत के उस पुनरुज्जीवी पराक्रम की बात करते हैं जिसने भारत के तथाकथित गुलामी के काल में हमें बार-बार उठने और विदेशी आक्रमणकारियों या शक्तियों के विरुद्ध हमलावर होकर काम करने के लिए प्रेरित किया। अपने देश की उस पराक्रमी शक्ति को भुलाना या उसकी उपेक्षा करना आत्महत्या करने के समान है। अपने देश की महान परंपराओं को मिटाने वाली शक्तियों के विरुद्ध हमने उठ उठ कर बार-बार संघर्ष किया , उस संघर्ष को भूल जाना राष्ट्रीय पाप है । निश्चित रूप से उस पराक्रमी शक्ति का नाम इतिहास में हिंदुत्व ही रहा है । इसलिए हिंदुत्व नाम की इस शक्ति को देश की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का केंद्र बन कर काम करने की आवश्यकता है। जो राजनीतिक दल भारत में हिंदुत्व की इस पराक्रमी शक्ति को भूलने की बात इसलिए करते हैं कि इन्हें याद रखने से एक वर्ग विशेष को चोट पहुंचती है, तो समझना चाहिए कि वे राजनीतिक दल भारत की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के केंद्र को कमजोर करने का कार्य करते हैं । यदि इसके उपरांत भी वे  अपने ऐसे कार्य को लोकतंत्र की खूबसूरती कहते हैं तो मानना चाहिए कि उनका भारत के लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय मूल्यों में कोई विश्वास नहीं है।
        इस गुरुत्वाकर्षण शक्ति को और भी अधिक शक्तिशाली बनाने की दिशा में भारत की जो भी राजनीतिक पार्टी या केंद्र सरकार काम करे हमें उसका समर्थन करना चाहिए – यह भी हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। राष्ट्रीय मूल्यों और संस्कारों का सम्मान व समर्थन करना किसी भी सरकार की चाटुकारिता नहीं है, इसलिए किसी भी सरकार की अच्छी नीतियों के समर्थन में आवाज उठाना हमारे लिए अनिवार्य होना चाहिए। भारत की वर्तमान केंद्र सरकार जिस दिशा में कार्य कर रही है उसके विषय में यह निसंकोच कहा जा सकता है कि काम अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है , परंतु ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि उस दिशा में कुछ काम ही नहीं हुआ है। काम पिछले 8 वर्ष में बहुत किया गया है। इसके उपरांत भी आलोचनाओं के लिए पर्याप्त गुंजाइश है और लोकतंत्र में यह गुंजाइश रहनी भी चाहिए। आलोचनाओं की इस प्रकार की गुंजाइश का नाम ही लोकतंत्र की खूबसूरती है। इसके विपरीत किसी भी सरकार के अच्छे कार्यों का भी समर्थन नहीं किया जाना लोकतंत्र की बदसूरती है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ किया जाने वाला खिलवाड़ है। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सरकारों का विरोध करना ही नहीं है बल्कि मर्यादित आचरण अपनाते हुए सरकारों के उचित व राष्ट्रीय हित को दृष्टिगत रखकर लिए गए निर्णय का समर्थन करना भी है।
हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पूर्ण कोई भी नहीं होता है। यदि मनुष्य पूर्ण हो जाएगा तो पूर्ण अर्थात परमपिता परमेश्वर की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। इसलिए जो स्वयं ही अपूर्ण है, उसमें कमियां, दोष और आलोचनाओं के क्षेत्र रहने स्वाभाविक हैं।
     हमें ध्यान रखना चाहिए कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा दोष या बदसूरती जनता को मूर्ख बना कर काम करना है। जब सब गधे घोड़ों को एक समान अधिकार अर्थात मताधिकार दे दिया जाता है तो प्रत्येक राजनीतिक दल को कुछ न कुछ ऐसे नाटक करने पड़ते हैं जिससे जनता को मूर्ख बनाया जा सके। भारत में वयस्क मताधिकार का प्रावधान किया गया है।  यह तब किया गया है जबकि देश में अनपढ़ लोगों की बहुत बड़ी संख्या है। राष्ट्रीय मुद्दों से सर्वथा अनभिज्ञ रहने वाले लोगों को भी मताधिकार देने को भारत में लोकतंत्र की खूबसूरती कहा जाता है। जबकि यह लोकतंत्र की खूबसूरती नहीं ,बल्कि लोकतंत्र की बदसूरती है। क्योंकि जाति, संप्रदाय, क्षेत्र ,भाषा आदि के नाम पर अनपढ़ लोगों को बरगलाकर राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करने की अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक प्रक्रिया का सहारा लेते हैं। गरीबों की गरीबी का सहारा लेकर अर्थात उनका मूर्ख बनाकर सत्ता शीर्ष तक पहुंचते हैं और फिर देश को लूटने और चूसने का काम करते हैं। अब समय आ गया है कि लोकतंत्र की खूबसूरती के नाम पर होने वाले बदसूरती के खेल को रोकने के लिए जागरूक नागरिक सामने आएं और देश के मतदाताओं को सीमित मताधिकार देने की प्रक्रिया पर विचार करें।
     भारत मां को डायन कहने वाले लोगों को भी यदि कोई राजनीतिक दल अपनी पार्टी का प्रत्याशी बनाता है या ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ के लोगों को भी राजनीतिक दल मंच उपलब्ध कराकर उनके भाषण करवाकर जनता को बरगलाने का प्रयास करते हैं तो यह लोकतंत्र की खूबसूरती नहीं कही जा सकती। लोकतंत्र की खूबसूरती भाषण और अभिव्यक्ति के अधिकार को असीमित करना नहीं है बल्कि उसको मर्यादित करना है।  जो व्यक्ति इस मर्यादा का उल्लंघन करता है, उसके प्रति राजनीतिक दल और प्रत्येक राजनीतिज्ञ उपेक्षा और तिरस्कार का भाव प्रकट करे, यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। यदि किसी संप्रदाय विशेष के लोग ही भारत माता को डायन कहने पर ताली बजाते पाए जाते हैं या पाकिस्तान भारत के क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की जीत पर पटाखे फोड़ते देखे जाते हैं या किसी भी आतंकवादी की मौत पर आंसू बहाते देखे जाते हैं या सेना पर पत्थरबाजी करने वाले लोगों की पीठ थपथपाते देखे जाते हैं या किसी भी हिंदू के पूजा स्थलों को क्षति पहुंचाकर खुशी प्रकट करते हैं या कहीं भाजपा के झंडे पर गाय को लिटाकर उसकी हत्या करते देखे जाते हैं तो उन्हें ऐसा निरंतर करते रहने का असीमित अधिकार देना लोकतंत्र की खूबसूरती नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र की मूल भावना को कलंकित और अपमानित करने का घिनौना प्रयास है, इसलिए इसे लोकतंत्र की बदसूरती ही कहा जाना चाहिए। प्रत्येक राजनीतिक दल को इस विषय पर अपनी स्पष्ट नीति बनानी चाहिए । उसे स्पष्ट करना चाहिए कि मैं ऐसा करने वालों को अपने राजनीतिक मंच पर काम नहीं करने दूँगा और अपनी पार्टी की ओर से किसी भी चुनाव में प्रत्याशी बनाने का कार्य भी नहीं करूंगा। ऐसी स्पष्ट नीतियों को यदि राजनीतिक दल लागू करते हैं तो इससे उनके देश भक्ति प्रकट होगी।
   यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारतवर्ष में अनेकों राजनीतिक दल ऐसे हैं जो इन कामों को होते रहने देने के समर्थक हैं। और भी अधिक दुर्भाग्य की बात यह है कि वे इसे संविधान और लोकतंत्र की भावना के नाम पर होने देना चाहते हैं। यदि कोई हिंदूवादी राजनीतिक संगठन या दल ऐसा करने को उनकी देश के प्रति निष्ठा पर प्रश्नचिन्ह बताता या मानता है तो वे चिल्ला चिल्लाकर कहते हैं कि देश भक्ति किसी की बपौती नहीं है। हमें देशभक्ति मत सिखाओ। हम स्वयं देशभक्त हैं। यदि देश का लोकतंत्र राजनीतिक दलों को देशभक्ति की सर्वमान्य परिभाषा पर भी सहमत नहीं कर पाया है तो इसे लोकतंत्र की खूबसूरती नहीं, बदसूरती ही कहा जाएगा। भारत को विश्व का महान लोकतंत्र कहने वाले इस देश में बहुत हैं। वे भारत के लोकतंत्र की महानता इस बात में देखते हैं कि देश विरोधी और संविधान विरोधी कार्य करने वालों को भी काम करने दिया जाए। उनका तर्क होता है कि हमारा लोकतंत्र विविधताओं से भरा हुआ है । इसलिए विविधताओं को हवा देते हुए देश को तोड़ने वाले लोगों को भी सम्मानित करते रहना चाहिए। वास्तव में वे जब इस प्रकार का कुतर्क देते हैं तो इससे देश का संविधान और उसकी मूल चेतना जहां आहत होती हैं वहीं देश की एकता और अखंडता को खतरा पहुंचाने वाले लोगों का मनोबल भी बढ़ता है। ऐसे कुतर्क देने वाले लोगों के विषय में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उनके इस प्रकार के कुतर्क के पीछे उनका संप्रदाय विशेष की वोटों को हड़पने का लालच होता है। उनके इस प्रकार के संविधानविरोधी और अलोकतांत्रिक कार्यों की समीक्षा के लिए चुनाव आयोग के पास कुछ विशेष अधिकार होने चाहिए। जब देश में चुनाव सुधारों की बात हो रही हो तो देश के चुनाव आयोग को भी मजबूत करने के लिए सरकारों का ध्यान इस ओर जाना चाहिए। देश के संविधान संविधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक मूल्यों से खिलवाड़ करने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता समाप्त करनी चाहिए। उन राजनीतिक दलों की मान्यता भी समाप्त होनी चाहिए जो देश विरोधी और समाज विरोधी काम करते रहने वाले लोगों को या तो टिकट देते हैं या फिर ऐसे लोगों का किसी न किसी प्रकार से महिमामंडन करते हैं जो देश में रहकर पाकिस्तान के गीत गाते हैं, वंदे मातरम का विरोध करते हैं, भारत माता को डायन कहते हैं, देश की एकता और अखंडता को तार-तार करने के लिए ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे- इंशाल्लाह इंशाल्लाह’ – का राग अलापते हैं।
   भारत में लोकतंत्र जिस दिन इतना साहसी हो जाएगा कि वह राजनीतिक दलों की नाक में नकेल डालने में सफल हो जाएगा उस दिन सचमुच लोकतंत्र की खूबसूरती राजपथ पर आकर अपना सबसे बेहतर प्रदर्शन करने में सफल होगी। हमें उस दिन की प्रतीक्षा करनी चाहिए जब देश के राजनीतिक दलों की आदर्श आचार संहिता देश के राजनीतिक व लोकतांत्रिक मूल्यों और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रति उनकी भक्ति और निष्ठा को अनिवार्यत: लागू करने पर बल देगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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