बढ़ती उम्र के साथ रीढ़ की हड्डी में डीजनरेशन की समस्या

Dr. Ayush Sharma Director LASER SPINE

डॉ. आयुष शर्मा
संस्थापक और निदेशक
लेजर स्पाइन क्लिनिक,पटना, बिहार
बुढ़ापा आते ही शरीर के हाव-भाव भी बदल जाते हैं और शरीर के अंग बेवफाई करते दिखाई देते हैं। हालांकि बुढ़ापे को आप रोक तो नहीं सकते लेकिन अपने सही लाइफ स्टाइल के साथ आप अपने ओर आते हुए बुढ़ापे की गति को जरूर कम कर सकते हैं। बढ़ती उम्र के साथ हमारी हाइट घटने लगती है। 40 वर्ष की उम्र के बाद प्रत्येक 10 साल में लोग एक सेंटी मीटर हाइट खोने लगते हैं। लगभग 70 वर्ष होने के बाद यह हाइट तेजी से घटने लगती है। इसका एक बड़ा कारण है हमारे गलत पोस्चर। कई बार हम डाक्टरों व आसपास के लोगों को कहते सुनते हैं कि हमेशा बैठते उठते व चलते समय सही पोस्चर रखना चाहिए। रीढ़ की हड्डी में लगे छोटे-छोटे वक्र उसे पूर्ण बनाते हैं। यदि रीढ़ की हड्डी को एक साइड से देखा जाए तो उसका आकार एस के जैसे दिखता है। रीढ़ की हड्डी के इन साधारण वक्रों को लोर्डोसिस व काइफोसिस के नाम से जाना जाता है। हालांकि इन वक्रों को गलती से किसी बीमारी या विकार के रुप में नहीं लेना चाहिए। हम सोच ही सकते हैं कि यदि रीढ़ की हड्डी सीधी होती तो हमें कितनी दिक्कत हो सकती थी। हमारी रीढ़ की हड्डी अक्सर रोजाना के कामों द्वारा पडने वाले बोझ व वजन को झेलती रहती है। ऐसे में कभी कभी रीढ़ की हड्डी के बहुत से भाग विकारग्रस्त होने लगते हैं। बढ़ती उम्र के साथ रीढ़ की हड्डी में डीजनरेशन की समस्या उभरने लगती है।
रीढ़ की हड्डी पर आता बुढ़ापा-
कुछ सौभाग्यशाली लोग अपने बुढ़ापे में किसी भी परेशानी का सामना नहीं करते हैं लेकिन अधिकतर लोग निम्नलिखित लक्षणों का शिकार हो जाते है-
हड्डियों के घनत्व में कमी
हल्की चोट से भी रीढ़ की हड्डी में फ्रे क्चर
कड़ापन, जोड़ों में समस्या जैसे चलने उठने बैठने व मोडने में दिक्कत
बहुत देर तक बैठने व खड़े होने के बाद दर्द, भारी वस्तुओं को उठाने में समस्या
शरीर का लचीलापन समाप्त होना
ठण्ड के समय में कमर में बेहद दर्द व कड़ापन
बढ़ती उम्र के साथ रीढ़ की हड्डी में उभरने वाली बीमारियां-
ओस्टियोपोरोसिस-बुढ़ापे में बढ़ती उम्र के साथ व हड्डियों के कम होते घनत्व के कारण उभरने वाली यह आम समस्या है। इस बीमारी को खामोश चोर भी कहा जाता है। इसके लक्षण तब तक नहीं उभरते जब तक कि हड्डी में कोई फ्रेक्चर न हो जाए। शरीर का भार वहन करने वाले अंग जैसे हिप्स व स्पाइन को ऐसे में अधिक क्षति होने का खतरा रहता है। कूबड़ निकलना भी ओस्टियोपोरोसिस की ही एक निशानी है।
डिस्क डीजनरेशन- स्पाइन बहुत सी हड्डियों (वर्टिब्रा) के जोड़ व डिस्क (कार्टिलेज से लैस लचीले मुलायम वर्टिब्रा के बीच स्थित पैड) जो कि वर्टिब्रा के लिए कुशन की तरह काम करते हैं। जन्म के समय इन डिस्कों में द्रव्य होता है। युवावस्था तक स्पाइन यह द्रव्य को सही ढंग़ से प्रवाहित करने में मदद करता है और उसमें से पोषक तत्वों को सोखता है व व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालता है जिससे डिस्क स्वस्थ व मजबूत रहते हैं। जैसे ही स्पाइन बुढ़ापे की ओर बढने लगती है वैसे ये स्पाइन कठोर होने लगती हैं। इससे मौजूद द्रव्य सही ढंग से प्रवाहित नहीं हो पाता है। इस प्रकार द्रव्य की कमी के चलते ये डिस्क सूखने लगते हैं और झटके को झेलने की उनकी गुणवत्ता कम हो जाती है। इस प्रकार डिस्क डीजनरेशन की समस्या उभर सकती है जिससे कमर व हिप्स में भयंकर दर्द होता है।
स्पाइन ओस्टियोआर्थराइटिस-ओस्टियोआर्थराइटिस आर्थराइटिस का बहुत ही साधारण रुप है जो कि अधिकर शरीर का भार वहन करने वाले अंगों पर सबसे पहले वार करता है। स्पाइनल ओस्टियोआर्थराइटिस के केस में झुकना व कमर को मोड़ पाना असंभव सा होता है। इस बीमारी में वर्टिब्रा के जोड़ों में स्थित कार्टिलेज फ टने लगती है और इन वर्टिब्रल जोड़ों में समस्या उत्पन्न हो जाती है। वर्टिब्रा एक दूसरे से रगडने लगते हैं जिससे कोई भी गतिविधि मुश्किल हो जाती है।
स्पाइनल स्टेनोसिस-इस समस्या के दौरान स्पाइन के एक या उससे अधिक भाग संकीर्ण होने लगते हैं विशेषकर स्पाइन के निचले हिस्से में। ऐसे में, उन नसों व उत्तकों पर अधिक दबाव पडने लगता है जो कि कंप्रेस्ड होती हैं। जिन भी नसों पर दवाब बढ़ता है, उससे संबंधित लक्षण उभरने लगते हैं। आमतौर पर स्पाइनल स्टेनोसिस से पैर हाथों में ऐंठन, सुन्नपन, कमर, हाथ पैरों में दर्द होना, जटिल केसों में कमर, हाथ पैरों में सेंसेशन न होना, ब्लैडर में भी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
उपचार यदि उपचार की बात करें तो बहुत से उपचार उपलब्ध हैं। इनमें से मरीज की स्थिति को देखते हुए सर्वश्रेष्ठ उपचार का चुनाव विशेषज्ञ के द्वारा किया जाना चाहिए। दवाइयों से लेकर इंजेक्शन, सर्जरी आदि सब उपलब्ध है। जहां अन्य प्रक्रियाएं कोई कारगर प्रभाव नहीं दे पाती हैं तब सर्जरी की ओर रुख किया जाता है। अब तो बहुत सी शल्यरहित प्रक्रियाओं के द्वारा सर्जरी भी की जा रही है । जिससे मरीज को असानी से अपनी समस्या से छुटकारा मिल जाता है और वह जल्द ही अपनी बेहतर दिनचर्या अपना सकता है।

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