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इतिहास के पन्नों से

जैन मत समीक्षा व जैन ग्रंथों के गपोडे-


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-डा मुमुक्षु आर्य
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चार्वाक,जैन, बौद्ध- ये तीन नास्तिक मत हैं जो ईश्वर की सत्ता को नहीं मानते, इनका मानना है कि यह सृष्टि अनादि काल से ऐसे ही चली आ रही है, इसको कोई बनाने वाला नहीं । इनके ग्रन्थों में भी तन्त्र पुराण कुरान बाइबिल आदि अनार्ष ग्रन्थों की तरह काल्पनिक किस्से कहानियों व गप्पों की भरमार है । जैन ग्रन्थों में तो इतनी हास्यास्पद असम्भव बातें लिखी हैं कि आश्चर्य होता है कि कोई इतनी बड़ी बड़ी गप्पें कैसे हांक सकता है । ये लोग अपने ग्रंथ प्राय: छुपा कर रखते हैं , मार्कीट में कहीं मिलते नहीं । जैनियों के रत्नकार आदि ग्रन्थों के कुछ गपौडे सत्यार्थप्रकाश में निम्न प्रकार लिखे हैं-

(1) ऋषभदेव का शरीर 500 पांच सौ धनुष् लम्बा और 8400000 (चौरासी लाख) पूर्व का आयु। (एक धनुष की लम्बाई दो मीटर से अधिक होती है, इसका मतलब ऋषभदेव का शरीर 1000 मीटर से भी अधिक लम्बा था और आयु 84 लाख वर्ष की थी )

(2) अजितनाथ का 450 धनुष् परिमाण का शरीर और 7200000 (बहत्तर लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(3) सम्भवनाथ का शरीर 400 चार सौ धनुष् परिमाण शरीर और 6000000 (साठ लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(4) अभिनन्दन का 350 साढ़े तीन सौ धनुष् का शरीर और 5000000 (पचास लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(5) सुमतिनाथ का 300 धनुष् परिमाण का शरीर और 4000000 (चालीस लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(6) पद्मप्रभ का 140 धनुष् का शरीर और परिमाण 3000000 (तीस लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(7) पार्श्वनाथ का 200 धनुष् का शरीर और 2000000 (बीस लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(8) चन्द्रप्रभ का 150 धनुष् परिमाण का शरीर और 1000000 (दस लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(9) सुविधिनाथ का 100 सौ धनुष् का शरीर और 200000 (दो लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(10) शीतलनाथ का 90 नब्बे धनुष् का शरीर और 100000 (एक लाख) पूर्व वर्ष का आयु।

(11) श्रेयांसनाथ का 80 धनुष् का शरीर और 8400000 (चौरासी लाख) वर्ष का आयु।

(12) वासुपूज्य स्वामी का 70 धनुष् का शरीर और 7200000 (बहत्तर लाख) वर्ष का आयु।

(13) विमलनाथ का 60 धनुष् का शरीर और 6000000 (साठ लाख) वर्षों का आयु।

(14) अनन्तनाथ का 50 धनुष् का शरीर और 3000000 (तीस लाख) वर्षों का आयु।

(15) धर्मनाथ का 45 धनुष् का शरीर और 1000000 (दस लाख) वर्षों का आयु।

(16) शान्तिनाथ का 40 धनुषों का शरीर और 100000 (एक लाख) वर्ष का आयु।

(17) कुन्थुनाथ का 35 धनुष् का शरीर और 95000 (पचानवें सहस्र) वर्षों का आयु।

(18) अमरनाथ का 30 धनुषों का शरीर और 84000 (चौरासी सहस्र) वर्षों का आयु।

(19) मल्लीनाथ का 25 धनुषों का शरीर और 55000 (पचपन सहस्र) वर्षों का आयु।

(20) मुनि सुव्रत का 20 धनुषों का शरीर और 30000 (तीस सहस्र) वर्षों का आयु।

(21) नमिनाथ का 14 धनुषों का शरीर और 10000 (दश सहस्र) वर्षों का आयु।

(22) नेमिनाथ का 10 धनुषों का शरीर और 10000 (दश सहस्र) वर्ष का आयु।

(23) पार्श्वनाथ 9 हाथ का शरीर और 100 (सौ) वर्ष का आयु।

(24) महावीर स्वामी का 7 हाथ का शरीर और 72 वर्षों की आयु।

(25) रत्नसार भाग एक पृष्ठ 150 पर जूं की लम्बाई अडतालीस कोश, बीछू मक्खी की लम्बाई एक योजन अर्थात 12 किलोमीटर लिखी है । चार चार कोश का बीछू अन्य किसी ने देखा न होगा। जो आठ मील तक का शरीर वाला बीछू और मक्खी भी जैनियों के मत में होती हैं। ऐसे बीछू और मक्खी उन्हीं के घर में रहते होंगे और उन्हीं ने देखे होंगे। अन्य किसी ने संसार में नहीं देखे होंगे। कभी ऐसे बीछू किसी जैनी को काटें तो उस का क्या होता होगा?जलचर मच्छी आदि के शरीर का मान एक सहस्र योजन अर्थात् 1000 कोश के योजन के हिसाब से 1,00,00,000 एक करोड़ कोश का शरीर होता है

चौबीस तीर्थङ्कर जैनियों के मत चलाने वाले आचार्य और गुरु हैं। इन्हीं को जैनी लोग परमेश्वर मानते हैं और ये सब मोक्ष को गये हैं। इसमें बुद्धिमान् लोग विचार लेवें कि इतने बड़े शरीर और इतना आयु मनुष्य देह का होना कभी सम्भव है? इस भूगोल में बहुत ही थोड़े मनुष्य वस सकते हैं। इन्हीं जैनियों के गपोड़े लेकर जो पुराणियों ने एक लाख, दश सहस्र और एक सहस्र वर्ष का आयु लिखा सो भी सम्भव नहीं हो सकता तो जैनियों का कथन सम्भव कैसे हो सकता है ?

जिन को बौद्ध तीर्थंकर मानते हैं उन्हीं को जैन भी मानते हैं इसलिये ये दोनों एक हैं। ये लोग जैन तीर्थङ्करों को उपदेशक और लोकनाथ मानते हैं परन्तु नाथों के नाथ अनादि परमात्मा को नहीं मानते तो उन तीर्थङ्करों ने उपदेश किस से पाया? जो कहैं कि स्वयं प्राप्त हुआ तो ऐसा कथन सम्भव नहीं क्योंकि कारण के विना कार्य नहीं हो सकता। जीव के विना दूसरा चेतन तत्त्व ईश्वर को नहीं, कोई भी अनादि सिद्ध ईश्वर नहीं; ऐसा बौद्ध जैन लोग मानते हैं। राजा शिवप्रसाद ‘इतिहासतिमिरनाशक’ ग्रन्थ में लिखते हैं कि इन के दो नाम हैं; एक जैन और दूसरा बौद्ध। ये पयार्यवाची शब्द हैं परन्तु बौद्धों में वाममार्गी मद्य-मांसाहारी बौद्ध हैं उन के साथ जैनियों का विरोध है परन्तु जो महावीर और गौतम गणधर हैं उनका नाम बौद्धों ने बुद्ध रक्खा है। प्रकरण भा॰2। षष्टी॰ सू॰ 18। में लिखा है कि जैसे विषधर सर्प में मणि त्यागने योग्य है वैसे जो जैनमत में नहीं वह चाहे कितना बड़ा धार्मिक पण्डित हो उस को त्याग देना ही जैनियों को उचित है।

मूर्तिपूजा का सब बखेड़ा भी जैनियों से ही चला है ।रत्नसार॰ पृष्ठ 13 में लिखा है—मूर्त्तिपूजा से रोग, पीड़ा और महादोष छूट जाते हैं। एक किसी ने 5 कौड़ी का फूल चढ़ाया। उसने 18 देश का राज पाया। उसका नाम कुमारपाल हुआ था इत्यादि सब बातें झूठी और मूर्खों को लुभाने की हैं क्योंकि अनेक जैनी लोग पूजा करते-करते रोगी रहते हैं और एक बीघे का भी राज्य पाषाणादि मूर्त्तिपूजा से नहीं मिलता! और जो पांच कौड़ी के फूल चढ़ाने से राज मिले तो पांच-पांच कौड़ी के फूल चढ़ा के सब भूगोल का राज क्यों नहीं कर लेते? और राजदण्ड क्यों भोगते हैं? और जो मूर्त्तिपूजा करके भवसागर से तर जाते हो तो ज्ञान सम्यग्दर्शन और चारित्र क्यों करते हो? रत्नसार भाग पृष्ठ 13 में लिखा है कि गोतम के अंगूठे में अमृत और उस के स्मरण से मनोवांछित फल पाता है।विवेकसार पृष्ठ 55-जिनमन्दिर में ऋषभदेवादि की मूर्त्तियों के पूजने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है। विवेकसार पृष्ठ 61-जिनमूर्त्तियों की पूजा करें तो सब जगत् के क्लेश छूट जायें।

नमो अरिहन्ताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उबज्झायाणं नमो लोए सब्बसाहूणं। एसो पंच नमुक्कारो सव्व पावप्पणासणो मंगलाचरणं च सव्वेसि पढमं हवइ मंगलम्।।

जैन ग्रन्थों में इस मन्त्र का बड़ा माहात्म्य लिखा है और सब जैनियों का यह गुरुमन्त्र है। इस का ऐसा माहात्म्य धरा है कि तन्त्र, पुराण, भाटों की भी कथा को पराजय कर दिया है। यह जैनियों का पवित्र और परम मन्त्र है। यह ध्यान के योग्य में परम ध्येय है। तत्त्वों में परम तत्त्व है। दुःखों से पीड़ित संसारी जीवों को नवकार मन्त्र ऐसा है कि जैसी समुद्र के पार उतारने की नौका होती है। गायत्री आदि वेद मंत्रों व ईश्वर प्रदत्त वेदों को जैनी कोई महत्व नहीं देते ।

अब इन जैनियों के साधुओं की लीला देखिये—(विवेकसार पृष्ठ 228) एक जैनमत का साधु कोशा वेश्या से भोग करके पश्चात् त्यागी होकर स्वर्ग लोक को गया। (विवेकसार पृष्ठ 101) अर्णकमुनि चारित्र से चूककर कई वर्ष पर्यन्त दत्त सेठ के घर में विषयभोग करके पश्चात् देवलोक को गया। श्रीकृष्ण के पुत्र ढंढण मुनि को स्यालिया उठा ले गया पश्चात् देवता हुआ। (विवेकसार पृष्ठ 156) जैनमत का साधु लिङ्गधारी अर्थात् वेशधारी मात्र हो तो भी उस का सत्कार श्रावक लोग करें। चाहैं साधु शुद्धचरित्र हों चाहैं अशुद्धचरित्र सब पूजनीय हैं। (विवेकसार पृष्ठ 168) जैनमत का साधु चरित्रहीन हो तो भी अन्य मत के साधुओं से श्रेष्ठ है।

जैनियों की मुक्ति- जैसे अन्य मत में वैकुण्ठ, कैलाश, गोलोक, श्रीपुर आदि पुराणी, चौथे आसमान में ईसाई, सातवें आसमान में मुसलमानों के मत में मुक्ति के स्थान लिखे हैं वैसे जैनियों के सिद्धशिला और शिवपुर मुक्ति स्थल हैं।

अब और थोड़ी सी असम्भव बातें इन की सुनो—(विवेकसार पृष्ठ 78) एक करोड़ साठ लाख कलशों से महावीर को जन्म समय में स्नान किया। (विवेक॰ पृष्ठ 136) दशार्ण राजा महावीर के दर्शन को गया। वहां कुछ अभिमान किया। उस के निवारण के लिए 16,77,72,16000 इतने इन्द्र के स्वरूप और 13,37,05,72,80,00,00,000 इतनी इन्द्राणी वहां आईं थीं। देख कर राजा आश्चर्य में हो गया।अब विचारना चाहिये कि इन्द्र और इन्द्राणियों के खड़े रहने के लिये ऐसे-ऐसे कितने ही भूगोल चाहिये। श्राद्धदिनकृत्य आत्मनिन्दा भावना पृष्ठ 31 में लिखा है कि बावड़ी, कुआ और तालाब न बनवाना चाहिये।
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साभार- महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थप्रकाश, बारहवां अध्याय
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जैन मत की तरह हिन्दू मत भी कोई धर्म नहीं, यह तो खिचड़ी नुमा एक जीवन शैली है जिसमें आस्तिक नास्तिक, मांसाहारी शाकाहारी,साकारी निराकारी,पाखंडी अन्धविश्वासी आदि सब आते हैं। धर्म तो एक ही है- वैदिक। श्री राम व श्री कृष्ण वैदिक धर्म को मानने के कारण आर्य कहलाते थे । आज दुनिया में हिन्दू मुस्लिम सिख जैन बौद्ध ईसाई आदि सैंकड़ों मत-मतांतर हैं । इनका तुलनात्मक अध्ययन करना है और धर्म अर्थ काम मोक्ष के स्वरुप को ठीक ठीक समझना है तो महर्षि दयानंद कृत सत्यार्थप्रकाश का स्वाध्याय अत्यन्त आवश्यक है ।

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