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डिब्बे ही हो जाते हैं डिब्बाबंद खाने-पीने वाले

आजकल डिब्बाबंद खान-पान सामग्री का प्रचलन जोर पकड़ता जा रहा है। जब से हमने परिश्रम करना छोड़ दिया है तभी से हम तैयार खान-पान के आदी हो गए हैं।

हमें ताजगी से कोई मतलब नहीं है कि जो कुछ खा-पी रहे हैं वह ताजा या ताजगी भरा है भी या नहीं। जो तैयार मिल जाता है उसे हम स्वीकार कर लिया करते हैं और उसी में हमें आनंद आता है।

माल कैसा भी हो, पैकिंग आकर्षक होनी चाहिए, हम आवरण और सौंदर्य को देखकर ही सब कुछ तय करते हैं। आकर्षण और चकाचौंध भरी हर चीज हमें खूब ज्यादा पसंद आने लगी है।

विज्ञापनों के मायाजाल से घिरे हम सभी लोग उस तरफ भागते हैं जिस तरफ अच्छा ही अच्छा दिखने को मिलता रहा है। बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक को आजकल पैकिंग और डिब्बाबंद खान-पान में ज्यादा रस आने लगा है।

मनुष्य का शरीर ताजी सामग्री को ग्रहण करने के लायक बना हुआ है। ताजी हवा से लेकर खान-पान की हर प्रकार की सामग्री मनुष्य के शरीर को पुष्ट करती है। पानी, खाद्य सामग्री आदि सभी कुछ तभी तक पौष्टिकता प्रदान करता है जब तक वह ताजा हो। जितना अधिक समय बीतता जाता है, सामग्री में से मूल तत्वों का ह्रास होने लगता है और यह सामग्री रसहीन हो जाती है।

जो सामग्री जितनी अधिक पुरानी होती जाती है उसमें से पोषक तत्व समाप्त होते जाते हैं। आजकल सब तरफ आकर्षक पैकिंग का जमाना है। हम जो खाते-पीते हैं उसी का रस बनकर मन बनने तक की प्रक्रियाएं पूर्ण होती हैं और उसी के अनुरूप व्यक्तित्व एवं शरीर का निर्माण होता है।

हमारे पेट में आजकल जो कुछ जा रहा है उसमें से अधिकांश का कोई उपयोग नहीं है सिवाय स्वाद के। सीधे तौर पर अक्खड़ भाषा में इसे कचरे की संज्ञा दे डालें तो भी कोई बुरा नहीं है।

हर खाद्य सामग्री और पेय को ग्रहण करने से पूर्व थोड़ी सी गंभीरता के साथ यह सोचा जाए कि जो हम पा रहे हैं वह हमारे शरीर के लिए कितना उपयोगी है तो हमें साफ पता चलेगा कि अधिकांश सामग्री शरीर के लिए उपयोगी नहीं है बल्कि इससे शरीर में विकार और बीमारियां पैदा होने की संभावनाएं अधिक हैं।

आजकल कुछेक को छोड़ दिया जाए तो हर इंसान किसी न किसी प्रकार की बीमारी से परेशान है। कोई बिरला ही ऎसा होगा जो पक्के तौर पर कह सकता है कि उसे कोई बीमारी नहीं है, वह पूरी तरह आरोग्यवान है।

बच्चों से लेकर लेकर बड़ों तक में मानसिक तनाव, उन्माद और उद्विग्नताओं का ग्राफ बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर शरीर को उसके लायक पोषक तत्व प्राप्त नहीं हो पा रहे हैं। इसका खामियाजा हमारे शरीर को उठाना पड़ रहा है।

शरीर को वृद्धि के साथ-साथ शारीरिक संतुलन बरकरार रखने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है और इस वजह से हमारे शरीर का पौष्टिक रस तत्व समाप्त हो रहा है।

यही कारण है कि हमारी ज्ञानेन्दि्रयां और कर्मेन्दि्रयां निरन्तर शिथिल होती जा रही हैं, शरीर के अंग समय से पहले जवाब देने लगे हैं, असमय बुढ़ापा घर करता जा रहा है। बच्चे, किशोर और जवान लोगों पर बुढ़ापे की छाया असर करने लगी है।

जो सामग्री जितनी अधिक पुरानी होती है उतना अधिक आलस्य देती है और शरीर को नुकसान पहुंचाती है। वर्तमान समय में अधिकांश लोगों के आलसी, निष्ठुर, संवेदनहीन, रसहीन, निकम्मे और शिथिल होने के कारणों में यह सबसे बड़ा और अहम है।

जिन लोगों को हमेशा ताजगी से भरा-पूरा रहने की तमन्ना हो, उन्हें चाहिए कि बासी और पैकिंग वाले माल से उपयोग से बचें। जो कुछ ग्रहण करें, वह एकदम ताजा ही होना चाहिए।

डिब्बाबंद और पैक्ड़ सामग्री का  उपयोग छोड़कर यदि हम ताजे खान-पान पर ध्यान देना आरंभ कर दें तो हमारी कई सारी मानसिक और शारीरिक बीमारियों का समाधान अपने आप संभव है।

सवेरे का बना शाम को न खाएं, आज का बना कल न खाएं। बासी भोजन को दुबारा गरम करके न खायें वरना शरीर में गांठें होने की आशंका बनी रहती है।

जो लोग बासी भोजन करते हैं या कई दिन पुरानी सामग्री का उपयोग करते हैं वे लोग पक्के आलसी होते हैं तथा ऎसा कोई काम नहीं कर पाते हैं जिससे उनका मनुष्य शरीर गौरवान्वित हो। ऎसे लोगों की संतति कमजोर होती है और उनमें बचपन से ही मानसिक या शारीरिक दोषों का बना रहना स्वाभाविक है।

बासी और डिब्बाबंद खाने वाले लोगों की आयु कम से कम 20 वर्ष घट जाती है और वे अपनी निर्धारित आयु भुगतने से पहले ही संसार को अलविदा कह देते हैं। ऎसे लोगों की बुद्धि और मन भी मलीन होते हैं तथा चित्त आसुरी वृत्तियों की ओर आकर्षित होता रहता है।

जो लोग डिब्बा बंद या पैकिंग वाली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं उनकी शारीरिक संरचना भी बेड़ौल ही हो जाती है और इनके चाल-चलन तथा व्यवहार को देखकर लगता है जैसे अलग-अलग आकार प्रकार के डिब्बे चल रहे हों।

ऊर्जा में कमी और उत्साहहीनता इन लोगों की पहली पहचान होती है। इसलिए जीवन में हर कर्म में ताजगी चाहें, आलस्य व प्रमाद को अपने आप से दूर रखना चाहें, मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के साथ दीर्घायु चाहें तो पैक्ड़ व डिब्बाबंद, बोतलबंद खान-पान सामग्री से बचें और जहां तक हो सके एकदम ताजी सामग्री का उपयोग करें। यह सामग्री जितनी अधिक प्राकृतिकता के निकट और ताजी  होगी, उतना अधिक स्वाद, ऊर्जा और आनंद का अहसास कराएगी।

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