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जिस कश्मीर को खून से सींचा वह कश्मीर किसका होगा?

 पुण्‍य प्रसून वाजपेयी

जिस कश्मीर को खून से सींचा वह कश्मीर हमारा है। तो बैनर और पोस्टर से जगमगाता कश्मीर का यह आसमान किसका है। यह पैसे वालों का आसमान है । जो सत्ता चाहते हैं। तो फिर खश्मीर को खून से सिंचने वाले हाथ सत्ता बदल क्यों नहीं देते । सत्ता को क्या बदले सत्ता तो खुद ही सत्ता पाने के लिये हर चुनाव में बदल जाती है। जो कल तक नेशनल कान्फ्रेंस में था आज वह पीडीपी का हो चला है। कल तक जो बॉयकाट का नारा लगाता ता वह आज दिल्ली की गोद में खेलने को तैयार है। सिक्यूरिटी भी अब सड़क से नहीं अपने कैंपों से निशाना साधती है। वाजपेयी साहेब के दौर में एजेंसियों ने एनसी के खिलाफ पीडीपी को पैदा किया। अब एजेंसियां ही एनसी और बीजेपी को साथ खड़ा करने में लगी है। और कांग्रेस जो एनसी के साथ सत्ता में रही अब पीडीपी के साथ हो चली है, जिससे बीजेपी को रोका जा सके। इसमें हम क्या सत्ता बदल सकते हैं। लेकिन इस बार तो आजादी और बायकाट का नारा भी कोई नहीं लगा रहा है।

 कश्मीरी तो चुनाव के रंग में है। तो वह क्या करें। घरों में कैद रहें। खामोश रहें। लेकिन हर रैली में हजारो हजार कश्मीरी की भीड़ बताने तो लगी है घाटी बदल रही है। और आप अब भी नारे लगा रहे हैं, जिस कश्मीर को खून से सींचा वह कश्मीर हमारा है। तो क्या नारों पर भी ताले लगवायेंगे। मुख्य सड़क छोड़कर जरा गलियों में झांक कर देखिये । उन दिलों को टटोले जिनके घरो में आज भी अपनो का इंतजार है। चुनाव तो झेलम के पानी की तरह है जो हमारे घरों को फूटा [डूबा] भी देंगे और फिर जिन्दगी भी देंगे। श्रीनगर से नब्बे किलोमीटर दूर बांदीपुर के करीब सुंबल की उन गलियों में युवा कश्मीरियों के साथ की यह तकरार है जिन गलियों में नब्बे के दशक में कूकापारे के ताकत की सत्ता थी। और जिस उस्मान मजीद के चुनाव प्रचार के लिये सोनिया गांधी भी बांदीपुर पहुंची वह भी कभी कूकापारे ही नहीं बल्कि सीमापार के आतंक की गलियों में घूम चुका है लेकिन इसबार कांग्रेस का प्रत्याशी है। तो क्या लोकतंत्र की ताकत का मतलब यही है कि चुनाव तो हर छह बरस में होने है चाहे नब्बे के दशक में आंतक चरम पर हो या फिर २००२ में सेना के बंदूक के साये या बूटों की गूंज या फिर २०१४ में झेलम की त्रासदी में सबकुछ गंवाने का जख्म। एक आम कश्मीरी करे क्या । यह सवाल

न्यूज चैनलो के पर्दे पर गूंजते जिन्दाबाद के नारो में आजादी के नारों को कमजोर बता सकते है। नाचती-गाती महिलाओ की टोलियो से आतंक खत्म होने का अंदेसा देकर चुनावी लोकतंत्र का झंडा बुलंद होते दिखा सकती है। लेकिन उन गलियों में और उन दिलो में चुनावी सेंध लगाने के लिये क्या क्या मशक्कत हर किसी को करनी पड़ रही है यह जख्मों को कुरेदने से ज्यादा किसी तरह जिन्दगी को दोबारा पाने की कुलबुलाहट भी हो चली है। चुनावी तौर तरीको की रंगत ने अलगाववादियों के जिले स्तर के कैडर तक को बंधक बना लिया है। कोई घर में नजरबंद है। कोई अस्पताल में तो कोई जेल में और कोई थानों में कैद है । क्योंकि बॉयकाट की आवाज उठनी नहीं चाहिये। सड़क पर सेना नहीं है बल्कि अब हर मोहल्ले और गांव में सेना को जानकारी देने वाले नौकरी पर है । यानी सेना की मशक्कत अब डराने या खौफ पैदा करने वाली मौजूदगी से दूर सूचनाओं के आधार पर ऑपरेशन करने वाली है। यानी चुनावी खुलेपन का नजारा चुनावी बिसात पर जीत-हार के लिये मकही मोहरा है तो कही वजीर। क्योंकि शहरों में कश्मीरी बोलता नहीं। गांव में कश्मीरी को खुलेपन का एहसास हो तो वह चुनावी नगाडों में थिरकने से नही कतराता। लेकिन कैसे आतंक की एक घटना हर ग्रामीण कश्मीरी को नब्बे के दौर की याद दिला कर घरों में कैद कर देती है यह भी कम सियासत नहीं । २० नंबवर को त्राल में तीन आंतकी मारे जाते हैं और त्राल का चुनावी उल्लास सन्नाटे में सिमट जाता है। कयास लगने लगते हैं कि त्राल

में अब कौई वोट डालने निकलेगा नहीं तो जीत हार सिखों के वोट पर निर्भर है जिनकी तादाद हजार भर है। तो बीजेपी यहा जीत सकती है।

लेकिन चुनावी बिसात पर नेताओं की ईमानदारी पर लगे दाग पहली बार आतंक से कही ज्यादा कश्मीरी नेताओ को डरा रहे हैं। क्योंकि युवा कश्मीरी के हाथ कलम थाम कर पहली बार आजादी शब्द दिलों में कैद रख दिल्ली की तरफ देखना चाहते हैं। जरुरत पड़ी तो आजादी का नारा भी लगा लेंगे। लेकिन एक बार करप्शन से

कश्मीर को निजात मिल जाये तो देखे कि दिल्ली की धारा में शामिल होने का रास्ता दिल्ली खुद कैसे बनाती है । यह आवाज साबरपुरा की है । गांधरबल में में आने वाले साबरपुरा में तालिम के लिये स्कूल से आगे का रास्ता बंद है । हर कोई दिल्ली या अलीगढ तो जा नहीं सकता । लेकिन दिल्ली हमारे कश्मीर में तो आ सकती है । तो क्या नरेन्द्र मोदी के लिये आवाज है। जी वाजपेयी साहेब ने भी कश्मीर के बारे में सोचा था। मोदी जी भी सोचे तो अच्छा होगा । लेकिन जम्मू के रास्ते कश्मीर नहीं आना चाहिये। घाटी के रास्ते जम्मू जाये तो ही कश्मीरियत होगी। तो क्या घाटी बदलने को तैयार है। चुनाव के आंगन में कश्मीर को खड़ा ना करें। कश्मीर के सच को माने और समझें कि कश्मीर दिल्ली से भी दर्द लेकर लौट रहा है और इग्लैड-अमेरिका से भी। तालिम के लिये कश्मीर छोडें। तालिम लेकर कश्मीर ना लौटे। सिर्फ बेवा और बुजुर्गों का कश्मीर हो जाये। सीमा पर कश्मीर है सेना के हवाले कश्मीर है । क्या यह हिन्दुस्तान के किसी राज्य में संभव है। कश्मीर की सियासी बोली ना लगे तो बेहतर है । दिल्ली में १२ बरस बिजनेस करने के बाद वापस लौटे अल्ताफ के यह सवाल क्या बदलते कश्मीर की दस्तक है । क्योंकि पहली बार घाटी के चुनावी मैदान में इग्लैड और अमेरिकी यूनिवर्सिटी से निकले कश्मीरी अपनी अपनी समझ से लोकतंत्र के मायने समझने को तैयार है । आवामी इत्तेहाद पार्टी के जिशान पंडित और शहजाद हमदानी अमेरिकी यूनिर्वसिटी से पढ़कर सियासत के मैदान में है । नेशनल कान्फ्रेंस के जुनैब आजिम मट्टु हो या तनवीर सादिक उर्दू की जगह अंग्रेजी बोल से युवा कश्मीरियों को लुभा रहे हैं। कांग्रेस के बड़े नेता सैफुद्दीन सोज के बेटे सलमान सोज तो वर्ल्ड बैंक की नौकरी छोड़ अब कश्मीर को अपने नजरिये से समझने और समझाने पर आतुर है ।

ऐसे में पहली बार दिल्ली के जिन सवालों पर खांटी राजनीति करने वाले कश्मीरी नेता खामोश होकर अपनी सत्ता के जुगाड में को जाते थे इस बार विदेशी जमीं से पढ़कर सियासी मैदान में उतरे कश्मीरी युवा दिल्ली के सवालों से दो दो हाथ करने को तैयार है। धारा ३७० सिर्फ जमीन खरीदने बेचने के लिये नहीं बल्कि सुविधा और सुरक्षा का सांकेतिक प्रतीक है, इसपर खुली बहस यहकहकर उठाना चाहते है कि जिन हालातो में १९४७ के बाद से कश्मीर को दिल्ली ने देखा उसे रातो रात बदलने का उपाय सत्ता पाते ही कैसे किस दिल्ली के पास है उसका ब्लू प्रिंट कश्मीरियों को बताना चाहिये । जबकि लुभाने के लिये अभी भी राजनीतिक बंदियों की रिहायी, पत्थर पेंकने वाले बंदियों की रिहायी. बेवाओं को राहत और झेलम से प्रभावितों को खूब सारा धन देने की पेशकश का सिलसिला ही चल पडा है । देवबंद के जमात-उलेमा हिंद की फौज श्रीनगर के डाउन-टाउन से लेकर गुरेज और कंघन तक में मुस्लिमों को दिल्ली से ज्यादा मोदी के मायने समझा रही है। नारों की शक्ल में आवाज लगा रही है, ‘न दूरी है, न खाई है / मोदी हमारा भाई है ।’ लेकिन घाटी में तो मुश्किल सवाल यह नहीं है कि नारों का असर होगा या नहीं । मुश्किल पहली बार अपनों से उठता भरोसा है। क्योंकि गिलानी के बायकाट की आवाज के लिये उम्र के लिहाज से यह आखिरी चुनाव है। मौलाना अंसारी बीमार हैं। अब्दुल गनी बट झेलम के पानी के बाद श्रीनगर छोड सोपोर लौट चुके हैं। सज्जाद लोन सियासत कम पासपोर्ट के लिये ज्यादा तड़पते हैं। तो सियासत में दिल्ली के साथ खड़ा होना उनकी जरुरत है। क्योंकि हर तीन महीने में पत्नी के लिये वीजा की भीख

दिल्ली से ही मांगनी पड़ती है। खुद का पासपोर्ट भी दिल्ली की इच्छा पर निर्भर है। तो फिर दिल्ली के साये में ही सियासत क्यों नहीं। तो पिता अब्दुल गनी लोन की समझ ताक पर रख, जिनकी हत्या के बाद ना चाहते हुये हुर्रियत नेता बना दिये गये। सज्जाद के भाई बिलाल तो खुद को बिजनेसमैन कहलाना ही पंसद करने लगे हैं। मिरवायज उमर फारुख भी तो पिता की हत्या के बाद झटके में नेता हो गये। तो फिर कश्मीरी जब खुद के बारे में सोचेगा और सियासत पर बहस करने लगेगा तो मिरवायज इस बहस में कहा टिकेंगे। यासिन मलिक जेल में हैं। लेकिन पहली बार उनके पिता गुलाम कादिर मलिक की याद भी कश्मीरियों को आने लगी है, जो पेशे से ड्राइवर थे। कश्मीर की रंगत में कभी सियासत की डोर ना थामी चाहे अस्सी के दशक के आखिर के चुनाव में जो हुआ उसने चुनाव पर से धाटी का भरोसा डिगाया। तो क्या २०१४ का चुनाव सारे जख्मों को कुरेद रहा है या नये तरीके से परिभाषित कर रहा है। या फिर नब्बे के दशक में आतंक के साये से निकला नारा जिस कश्मीर को खून से सींचा वह कश्मीर हमारा है अब बदल चुका है।

लेखक इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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