पुस्तक समीक्षा :  बंगभूमि का वैभव

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, माधवी मुखर्जी द्वारा लिखी गई ‘बंगभूमि का वैभव’ नामक पुस्तक बंगाल की गौरवमयी संस्कृति को सहेजकर प्रस्तुत करने का एक सराहनीय प्रयास है। बंगाल का भारत की संस्कृति के निर्माण और रखरखाव में विशेष योगदान रहा है। बौद्धिक संपदा में तो बंगाल ने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं।
सबसे पहले अंग्रेजों ने बंगाल में आकर ही अपना डेरा डाला था। बंगाली लोगों ने ही अंग्रेजों की भाषा को सीखकर शासन प्रशासन में अपनी पकड़ बनाई । उसके पश्चात उनकी इस पकड़ का एक सकारात्मक परिणाम यह हुआ कि स्वतंत्रता संग्राम में बंगाल ने बढ़- चढ़कर भाग लिया। यहां के लोगों ने अंग्रेजों की भाषा सीखकर अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में भारत के शौर्य को समझाने का उल्लेखनीय कार्य किया। यही कारण रहा कि बंगाल की भूमि ने अनेकों क्रांतिकारियों को जन्म दिया। जाति प्रथा और स्त्रियों की दशा को सुधारने में भी यहां पर एक से बढ़कर एक समाज सुधारक पैदा हुए। जिन्होंने भारतीय इतिहास को नई दिशा दी, नया चिंतन और नई सोच दी।
शिक्षा, साहित्य ,कला और जीवन के अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करने वाले पहलुओं को भी बंगाली मानस ने बड़ी गंभीरता से समझा। जिससे बंगाल का भारत के इतिहास में विशेष महत्व हो जाता है।
  अपनी बात को स्पष्ट करते हुए लेखिका ने पुस्तक भूमिका में लिखा है कि कोई भी फल उस कृषक की मेहनत और लगन का प्रतिफल होता है जिसने धरती में बीज डालकर सिंचाई और उसकी देखभाल की, लेकिन होने वाली फसल की किस्म में उस बीज की किस्म की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, जो जमीन में डाला गया। बंगाल प्रांत हमेशा से भारत के विभिन्न प्रांतों में एक समृद्ध संस्कृति और गहरी बौद्धिकता लेकर अलग से दिखाई देता रहा है । चाहे राजनीतिक चिंतन की बात हो चाहे सामाजिक चिंतन के प्रभाव की बात हो अथवा बंगाल के तार्किक सौष्ठव का सवाल हो, बंगभूमि ने सदा अपना नाम अलग से चरितार्थ किया है।
पुस्तक में बंगाल की माटी में सनी भारतीय संस्कृति के संस्कारों ने कैसे कैसे रूप लिए हैं ? -उन सबको भी चित्रों के माध्यम से हमारे समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है , जिनसे बहुत कुछ अच्छी गहरी जानकारी प्राप्त होती है।
पुस्तक को बहुत व्यवहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए लेखिका ने इन पंक्तियों के साथ समाप्त किया है कि बंगाल प्रांत को टटोलने से हमें अनुभूति हुई कि जहां एक ओर कला संस्कृति में धार स्वदेश प्रेम शुरू से ही कूट-कूट कर भरा है, वहीं धर्म के नाम पर सामाजिक विसंगतियों भी हैं । आज जरूरी है बंगाल के प्रांतीय माधुर्य को सहेजने के साथ-साथ सामाजिक स्वच्छता को भी हम बनाए रखें। सोनार बांग्ला कहलाने के लिए उचित मानवता और उचित शिक्षा भी जरूरी है …..।
  यह पुस्तक साहित्यागार, धामाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता जयपुर 302003 से प्रकाशित हुई है। जिसकी प्राप्ति के लिए फोन नंबर 0141 -2310785, 4022382 पर संपर्क किया जा सकता है। पुस्तक का मूल्य ₹200 है। पुस्तक की कुल पृष्ठ संख्या 78 है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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