क्या सचमुच दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर निकलता है ?

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राजकुमार सिंह

अगले साल विधानसभा चुनाव तो पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भी होंगे, लेकिन देश की भावी राजनीति में विकल्प की बाबत स्वाभाविक मगर अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर, लोकसभा सीटों की संख्या की दृष्टि से, देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के पास ही है। बेशक इस उत्तर का अनुमान लगा पाना आसान भी नहीं है, वरना स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार उत्तर प्रदेश के चक्कर नहीं लगा रहे होते। आखिरकार इसी उत्तर प्रदेश की बदौलत वर्ष 2014 में, राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार होते हुए भी, भाजपा ने लोकसभा चुनाव में जीत का परचम लहराते हुए स्पष्ट बहुमत के साथ केंद्र में, राजग के बैनर तले, सरकार बनायी थी। फिर वर्ष 2017 में भाजपा ने तीसरे स्थान से छलांग लगाते हुए विधानसभा चुनाव में भी प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया। उत्तर प्रदेश ने भाजपा को निराश वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी नहीं किया और लगातार दूसरी बार केंद्र में स्पष्ट बहुमत से सरकार बनवाने में निर्णायक भूमिका निभायी।

प्रधानमंत्री स्वयं बार-बार तीव्र विकास के लिए डबल इंजन की सरकार यानी केंद्र और राज्य, दोनों जगह भाजपा सरकार का नारा लगाते रहे हैं। उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत से बनी भाजपा सरकार है, जिसका नेतृत्व योगी आदित्यनाथ कर रहे हैं। गोरखनाथ मठ की पृष्ठभूमि वाले योगी आदित्यनाथ कई बार सांसद रह चुके हैं, लगभग पांच साल से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हैं, लेकिन इतने लंबे समय से सत्ता गलियारों में रहते हुए भी उन्होंने अपना संत का बाना नहीं छोड़ा है। इसके बावजूद ऐसा क्यों है कि उत्तर प्रदेश के मतदाताओं के मूड को लेकर लखनऊ से दिल्ली तक एक बेचैनी साफ महसूस हो रही है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्यों के विधानसभा चुनाव भी स्वयं के लिए चुनौती की तरह लेकर प्रचार के अग्रिम मोर्चे पर रहते हैं, लेकिन चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले ही वह जिस तरह बार-बार शिलान्यास-उद्घाटनों के लिए उत्तर प्रदेश जा रहे हैं, उसके गहरे राजनीतिक-चुनावी निहितार्थ हैं। मोदी बखूबी जानते हैं कि आसन्न विधानसभा चुनाव भले ही उत्तर प्रदेश की अगली सरकार के लिए हो रहा है, पर दिल्ली की सत्ता का रास्ता लखनऊ से होकर निकलता है। इसलिए वर्ष 2024 का रास्ता भी वर्ष 2022 से ही होकर निकलेगा। चुनावी नब्ज पर अच्छी पकड़ रखने वाले मोदी और उनके विश्वस्त अमित शाह यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि वर्ष 2021 का उत्तर प्रदेश वर्ष 2014 या 2017 वाला नहीं है, और इस बीच गंगा-यमुना में बहुत पानी बह चुका है। अगर ऐसा नहीं होता तो लीक से हट कर कठोर फैसले लेने और फिर उन पर टिके रहने की सख्त छवि वाली मोदी सरकार अचानक ही उन तीन विवादास्पद कृषि कानूनों की एकतरफा वापसी का ऐलान नहीं करती, जिन्हें कृषि क्षेत्र में सुधार के लिए जरूरी बताया जाता रहा।

साल भर चले किसान आंदोलन को नजरअंदाज करने वाली मोदी सरकार और भाजपा, एकतरफा कृषि कानून वापसी पर जो भी तर्क दे, चुनावी राजनीति की सामान्य समझ रखने वाला भी जानता है कि ऐसा किये बिना लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की सत्ता-राजनीति का गणित गड़बड़ाने का जोखिम था। कृषि बदहाली का संकट भले ही देशव्यापी है, पर साल भर चले किसान आंदोलन में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मुखर भागीदारी से साफ था कि कम से कम वहां तो भाजपा की चुनावी डगर मुश्किल ही होने वाली है। पंजाब में चौथे नंबर की पार्टी भाजपा के पास खोने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है, जबकि हरियाणा में चुनाव बहुत दूर हैं। ऐसे में भाजपा की पहली कठिन परीक्षा उत्तर प्रदेश में ही होने वाली है। पिछले विधानसभा चुनाव में 403 में से 311 सीटें जीत कर भाजपा ने सभी को चौंका दिया था। उस लहर को जो भी नाम दिया जाये, उसे रफ्तार देने में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बदले सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों की निर्णायक भूमिका थी।

कांग्रेस से अलगाव के बाद चौधरी चरण सिंह ने अजगर (अहीर-जाट-गुर्जर-राजपूत) और मजगर (मुसलमान-जाट-गुर्जर-राजपूत) का जो चुनाव जिताऊ सामाजिक-राजनीतिक समीकरण बनाया था, वह उनके उत्तराधिकारी अजित सिंह के अंतिम दौर में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट-मुस्लिम समीकरण तक सिमट कर रह गया। मुलायम सिंह यादव और मायावती की मुस्लिम राजनीति ने जो सेंध लगायी तो वह समीकरण भी गड़बड़ाने लगा। जाहिर है, जब-तब होने वाली सांप्रदायिक रंग वाली घटनाओं ने दोनों समुदायों के बीच अविश्वास ही नहीं, कटुता भी बढ़ायी, लेकिन वर्ष 2013 के सांप्रदायिक दंगों ने उसे रंजिश में ही बदल दिया। बदले राजनीतिक समीकरणों का ही परिणाम रहा कि रालोद सुप्रीमो अजित सिंह और उनके पुत्र जयंत चौधरी स्वयं लोकसभा चुनाव हार गये। माना जा रहा है कि किसान आंदोलन का एक बड़ा प्रभाव जाट और मुसलमान समुदाय में कटुता मिटा कर अविश्वास की खाई पाटने के रूप में हुआ है। 100 से भी ज्यादा विधानसभा सीटों वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अगर यह सामाजिक-राजनीतिक समीकरण बदलता है तो मायावती की एकला चलो की रहस्यमयी राजनीति के बीच भी सपा-रालोद गठबंधन बड़ा चुनावी गुल खिला सकता है, जो अंतत: भाजपा का खेल बिगाड़ भी सकता है।

जाहिर है, उस संभावित समीकरण और उसके चुनावी प्रभाव के आकलन ने ही संघ-भाजपा के चतुर सुजानों को बाध्य किया होगा कि साख की कीमत पर भी केंद्र सरकार विवादास्पद तीन कृषि कानूनों को वापस ले। अब जबकि कानून वापसी के बाद केंद्र सरकार ने एमएसपी पर कमेटी बना कर किसानों की अन्य मांगें भी लिखित रूप में मान ली हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किसानों की नाराजगी और बदले सामाजिक-राजनीतिक समीकरण के चुनावी प्रभाव-परिणाम को कौन अपने पक्ष में कितना मोड़ पायेगा। बेशक सत्ता विरोधी भावना से मुकाबिल भाजपा के पास सत्ता में होने का लाभ उठाने का अवसर भी है। पिछले कुछ दिनों से जिस रफ्तार से परियोजनाओं के शिलान्यास-उद्घाटन हो रहे हैं, वह दरअसल उसी अवसर का लाभ उठाने की कवायद है। पांच साल के कार्यकाल के अंतिम महीनों में शिलान्यास-उद्घाटन की यह दौड़ भाजपा के लिए अभी लखनऊ और फिर दिल्ली की दूरी तय कर पायेगी—यह तो समय ही बतायेगा, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी के साथ ही केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के भी मैदान में उतरने से साफ है कि पार्टी को मौके की नजाकत का अंदाजा है। कृषि कानून वापसी से पहले भी संगठनात्मक और मंत्रिमंडलीय फेरबदल के जरिये भाजपा राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सामाजिक-राजनीतिक समीकरण साधने की कवायद कर चुकी है।

ऐसा भी नहीं है कि उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर सारी चालें भाजपा ही चल रही है और उसके विरोधी मूकदर्शक बने हुए हैं। बसपा से चुनावी गठबंधन में मुंह की खा चुके सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव बबुआ की छवि से निकलने की गंभीर कवायद कर रहे हैं। प्रदेश भर में घूम-घूम कर वह भाजपा और उसकी सरकारों पर प्रहार ही नहीं कर रहे, रालोद समेत छोटे दलों से गठबंधन कर भाजपा की चुनावी घेराबंदी भी कर रहे हैं। लंबी खटास के बाद चाचा शिवपाल यादव से भी अखिलेश गठबंधन के लिए तैयार हैं। जातीय जनाधार वाले कुछ छोटे दलों से गठबंधन भाजपा भी कर रही है, लेकिन सहयोगियों के साथ सीटों के बंटवारे पर अभी कोई कुछ नहीं बोल रहा। फिर भी एक बात साफ है कि चुनाव मुख्यत: भाजपा समर्थक और भाजपा विरोध के मुद्दे पर ही लड़ा जायेगा। ऐसे में अगर बहुकोणीय मुकाबला हुआ तो उसका लाभ भाजपा को मिल सकता है। शायद इसलिए भी बसपा सुप्रीमो मायावती के बिना गठबंधन अकेले चुनाव लड़ने के फैसले की कई कोणों से राजनीतिक व्याख्या की जा रही है। बेशक कांग्रेस के भी अकेले ही चुनाव लड़ने के प्रबल आसार हैं, क्योंकि अखिलेश गठबंधन से इनकार कर चुके हैं, लेकिन कांग्रेस कुल मिलाकर किसे नुकसान पहुंचायेगी—इस पर राजनेता ही नहीं, राजनीतिक प्रेक्षक भी एकमत नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के संभावित चुनावी परिदृश्य में मोदी-योगी-शाह की त्रयी का मुख्य मुकाबला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे पिताओं : मुलायम सिंह यादव-अजित सिंह के पुत्रों : अखिलेश-जयंत की जोड़ी से नजर आता है, जिसमें अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में बसपा-कांग्रेस संतुलन बनाने-बिगाड़ने की भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी की भूमिका की चर्चा करना भी प्रासंगिकता से परे लगता है, पर कोई नहीं जानता कि आने वाले दिनों में चुनावी राजनीति कितने रंग बदलेगी।

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