Categories
भारतीय संस्कृति

कृष्ण जी भारतीय संस्कृति की अबूझ पहेली है, जिन पर आने वाली पीढ़ियां नाज करती रहेंगी


ओशो

कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात तो यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं। भविष्य में ही यह संभव हो पाएगा कि कृष्ण को हम समझ पाएं। इसके कुछ कारण हैं।
सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं। कृष्ण अकेले ही नाचते हुए व्यक्ति हैं। हंसते हुए, गीत गाते हुए। अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म उदास, आंसुओं से भरा हुआ था। हंसता हुआ धर्म मर गया है और पुराना ईश्वर, जिसे हम अब तक ईश्वर समझते थे, जो हमारी धारणा थी ईश्वर की, वह भी मर गई है।
जीसस के संबंध में कहा जाता है कि वह कभी हंसे नहीं। शायद जीसस का यह उदास व्यक्तित्व और सूली पर लटका हुआ उनका शरीर ही हम दुखी-चित्त लोगों के बहुत आकर्षण का कारण बन गया। महावीर या बुद्ध बहुत गहरे अर्थों में इस जीवन के विरोधी हैं। कोई और जीवन है परलोक में, कोई मोक्ष है, उसके पक्षपाती हैं। समस्त धर्मों ने दो हिस्से कर रखे हैं जीवन के-एक वह जो स्वीकार योग्य है और एक वह जो इनकार के योग्य है।
कृष्ण अकेले ही इस समग्र जीवन को पूरा स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उनके व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसलिए, इस देश ने और सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है, कृष्ण को पूर्ण अवतार कहा है। राम भी अंश ही हैं परमात्मा के, लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। और यह कहने का, यह सोचने का, ऐसा समझने का कारण है। और वह कारण यह है कि कृष्ण ने सभी कुछ आत्मसात कर लिया है।
अल्बर्ट श्वीत्ज़र ने भारतीय धर्म की आलोचना में एक बड़ी कीमती बात कही है, और वह यह कि ‘भारत का धर्म जीवन-निषेधक, ‘लाइफ निगेटिव” है।” यह बात बहुत दूर तक सच है, यदि कृष्ण को भुला दिया जाए। और यदि कृष्ण को भी विचार में लिया जाए तो यह बात एकदम ही गलत हो जाती है और श्वीत्ज़र यदि कृष्ण को समझते तो ऐसी बात न कह पाते। लेकिन कृष्ण की कोई व्यापक छाया भी हमारे चित्त पर नहीं पड़ी है। वे अकेले दुख के एक महासागर में नाचते हुए एक छोटे-से द्वीप हैं। या ऐसा हम समझें कि उदास, निषेध,दमन और निंदा के बड़े मरुस्थल में एक बहुत छोटे-से नाचते हुए मरूद्यान हैं।
कृष्ण अकेले हैं जो शरीर को उसकी समस्तता में स्वीकार कर लेते हैं, उसकी ‘टोटलिटी” में। यह एक आयाम में नहीं, सभी आयाम में सच है। शायद कृष्ण को छोड़कर…कृष्ण को छोड़कर, और पूरे मनुष्यता के इतिहास में जरथ्रुष्ट एक दूसरा आदमी है, जिसके बाबत यह कहा जाता है कि वह जन्म लेते से हंसा। सभी बच्चे रोते हैं। एक बच्चा सिर्फ मनुष्य-जाति के इतिहास में जन्म लेकर हंसा। यह सूचक है। यह सूचक है इस बात का कि अभी हंसती हुई मनुष्यता पैदा नहीं हो पाई। और कृष्ण तो हंसती हुई मनुष्यता को ही स्वीकार हो सकते हैं।
इसलिए कृष्ण का बहुत भविष्य है। फ्रायड-पूर्व धर्म की जो दुनिया थी, वह फ्रायड-पश्चात नहीं हो सकती है। एक बड़ी क्रांति घटित हो गई है, और एक बड़ी दरार पड़ गई है मनुष्य की चेतना में।
पुराना धर्म सिखाता था आदमी को दमन और ‘सप्रेशन”। तभी आत्मा उपलब्ध होगी और तभी परमात्मा उपलब्ध होगा। फ्रायड के साथ ही एक नई चेतना का जन्म हुआ और वह यह कि दमन गलत है। और दमन मनुष्य को आत्महिंसा में डाल देता है। कृष्ण, फ्रायड के बाद जो चेतना का जन्म हुआ है, जो समझ आई है, उस समझ के लिए कृष्ण ही अकेले हैं जो सार्थक मालूम पड़ सकते हैं क्योंकि पुराने मनुष्य जाति के इतिहास में कृष्ण अकेले हैं जो दमनवादी नहीं हैं। वे जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिए हैं। वे प्रेम से भागते नहीं।
वे पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वे परमात्मा को अनुभव करते हुए युद्ध से विमुख नहीं होते। वे करुणा और प्रेम से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। अहिंसक-चित्त है उनका, फिर भी हिंसा के ठेठ दावानल में उतर जाते हैं। अमृत की स्वीकृति हैं उन्हें, लेकिन जहर से कोई भय भी नहीं है।
गांधी गीता को माता कहते हैं, लेकिन गीता को आत्मसात नहीं कर सके। क्योंकि गांधी की अहिंसा युद्ध की संभावनाओं को कहां रखेगी? तो गांधी उपाय खोजते हैं; वह कहते हैं यह जो युद्ध है, यह सिर्फ रूपक है, यह कभी हुआ नहीं। यह मनुष्य के भीतर अच्छाई और बुराई की लड़ाई है।
इस संदर्भ में यह समझ लेना उचित होगा कि राम के जीवन को हम चरित्र कहते हैं। राम बड़े गंभीर हैं। उनका जीवन लीला नहीं है, चरित्र ही है। लेकिन कृष्ण गंभीर नहीं हैं। कृष्ण का चरित्र नहीं है वह, कृष्ण की लीला है। राम मर्यादाओं में बंधे हुए व्यक्ति हैं, मर्यादाओं के बाहर वे एक कदम न बढ़ेंगे। मर्यादा पर वे सब कुर्बान कर देंगे। कृष्ण के जीवन में मर्यादा जैसी कोई चीज ही नहीं है… अमर्याद… पूर्ण स्वतंत्र।
नीत्शे का एक बहुत कीमती वचन है। नीत्शे ने कहा है कि जिस वृक्ष को आकाश की ऊंचाई छूनी हो, उसे अपनी जड़ें पाताल की गहराई तक पहुंचानी पड़ती हैं। और अगर कोई वृक्ष अपनी जड़ों को पाताल तक पहुंचाने से डरता है, तो उसे आकाश तक पहुंचने की आकांक्षा भी छोड़ देनी पड़ती है। असल में जितनी ऊंचाई, उतने ही गहरे भी जाना पड़ता है।
मनुष्य के मन ने सदा चाहा कि वह चुनाव कर ले। उसने चाहा कि स्वर्ग को बचा ले और नर्क को छोड़ दे। उसने चाहा कि शांति को बचा ले, तनाव को छोड़ दे। उसने चाहा शुभ को बचा ले, अशुभ को छोड़ दे। उसने चाहा प्रकाश ही प्रकाश रहे, अंधकार न रह जाए।
मनुष्य के मन ने अस्तित्व को दो हिस्सों में तोड़कर एक हिस्से का चुनाव किया और दूसरे का इनकार किया। इससे द्वंद्व पैदा हुआ, इससे द्वैत हुआ। कृष्ण दोनों को एक-साथ स्वीकार करने के प्रतीक हैं। जो दोनों को एक-साथ स्वीकार करता है, वही पूर्ण हो सकता है। कृष्ण मानव चेतना की संपूर्णता का प्रतीक है… उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का तरल प्रतिबिंब
कृष्ण कोई साधकनहीं हैं। उन्हें साधक कह कर सम्बोधित करना गलत होगा। वे एक सिद्ध हैं, जीवन की कला के एक पारंगत और निपुण कलाकार। और जो भी वह इस सिद्धावस्था में, मन की चरम अवस्था में कहते हैं तुम्हे अहंकारपूर्ण लग सकता है, पर ऐसा है नहीं। कठिनाई यह है कि कृष्ण को उसी भाषाई “मैं” का प्रयोग करना पड़ता है जिसका तुम करते हो। लेकिन उनके “मैं” के प्रयोग में और तुम्हारे “मैं” के प्रयोग में बहुत अंतर है। जब तुम “मैं” का प्रयोग करते हो, तब उस का अर्थ है वह जो शरीर में कैद है लेकिन जब कृष्ण “मैं” कहते हैं तब उसका अर्थ है वह जो पूरे ब्रह्माण्ड में व्यापक है। इसलिए उनमे यह कहने का साहस है–“सब छोड़ कर मेरी शरण में आ।” यदि यह तुम्हारा “मैं” होता–शरीर का कैदी–तब उनके लिए यह कह पाना असंभव होता। और यदि कृष्ण का “मैं” तुम्हारी तरह ही क्षुद्र होता तो अर्जुन को कष्ट पहुंचाता। अर्जुन तुरंत उसका प्रत्युत्तर देते, कि “आप यह क्या कह रहें हैं? मैं क्यूँ आप के आगे समर्पण करूँ? अर्जुन को बहुत कष्ट हुआ होता, पर ऐसा नहीं हुआ।
जब कोई व्यक्ति किसी से अहंकार की भाषा में बोलता है तब दुसरे के भीतर भी तुरंत अहंकार की प्रतिक्रिया होती है। जब तुम अहंकार के “मैं”की भाषा में कुछ बोलते हो तब दूसरा भी तुरंत वही भाषा बोलने लगता है। हम एकदुसरे के शब्दों के पीछे छिपें अर्थों को समझने में सक्षम हैं और तेजी से प्रतिक्रिया दे देतें हैं।
परंतु कृष्ण का “मैं” अहंकार के सभी चिन्हों से मुक्त है, और इसी कारण से वे अर्जुन को एक निर्दोष समर्पण के लिएपुकार सके। यहाँ “मेरे प्रति समर्पण” का वास्तव में अर्थ है “पूर्ण के प्रति समर्पण, वह मौलिक और रहस्यमय ऊर्जा जो ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, उसके प्रति समर्पण।”
निर-अहंकार बुद्ध और महावीर में भी आया है, परन्तु यह उनमे बहुत लंबे संघर्ष और परिश्रम के बाद आया है। किन्तु संभव है कि उनके बहुत से अनुयाइयों में ना आए, क्योंकि उनके मार्ग पर यह सबसे अंत में आने वालीचीज़ है। तो अनुयायी उस तक आ भी सकतें हैं और नहीं भी। किन्तु कृष्ण के साथ निर-अहंकार पहले आता है। वे वहा प्रारंभ होते हैं जहां बुद्ध और महावीर समाप्त होते हैं । तो जो भी कृष्ण के साथ होने का निर्णय लेता है, उसे इसे बिल्कुल प्रारंभ से रखना होगा। यदि वह असफल होता है, तो उसका कृष्ण के साथ जाने का कोई प्रश्न नही उठता।
महावीर के सान्निघ्य में तुम अपने “अहम्” को पकड़े बहुत दूर तक चल सकते हो, परंतु कृष्ण के साथ तुम्हे अपना “अहम्” पहलेचरणमें गिराना होगा अन्यथा तुम उनके साथ नहीं जा सकोगे। तुम्हारा अहम् महावीर के साथ तो कुछ स्थान पा सकता है परंतु कृष्ण के साथ नहीं। कृष्ण के साथ प्रथम चरण ही अंतिम है; महावीर और बुद्ध के साथ अंतिम चरण ही प्रथम है। और तुम्हारे लिए इस अंतर को ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह एक बहुत बड़ा अंतर है, और बहुत आधारभूत भी।
कृष्ण को समझ पाना अत्यंत कठिन है। यह समझ पाना सरल है कि एक व्यक्ति शान्ति की खोज में संसार से भाग खडा हो, किन्तु यह स्वीकार कर पाना अत्यंत कठिन है कि कोई भरे बाजार में शान्ति पा सकता है। यह समझ में आता है कि व्यक्ति यदि अपनी आसक्तियों से मुक्त हो जाए तो मन की शुद्धतम अवस्था को उपलब्ध कर सकता है, परंतु यह समझ पाना बहुतकठिन है कि संबंधों और आसक्तियों के बीच रह कर भी कोई अनासक्त और निर्दोष रह सकता है, कि कोई शांत रह सके और फिर भी तूफ़ान के बिलकुलबीच में रह कर जी सके। इस बात को स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं कि दिए की लौ यदि तेज हवाओं और तूफानों से दूर एकांत में स्थित है तो स्थिर और अकंप रहेगी, परंतु इस बात में तुम कैसे भरोसा करोगे कि एक मोमबत्ती तेज आंधी और तूफानों के बीच में भी जलती रह सकती है? तो जो लोग कृष्ण के निकटतम है उनके लिए भी यह समझ पाना कठिन है।
आप किसी व्यक्ति के बारे में बाहर से निर्णय नहीं ले सकते हैं कि वह समझदार है या मूर्ख क्योंकि कई बार उनके कृत्य एक जैसें हो सकते हैं। गीता में कृष्ण अर्जुन से कहतें हैं, “लड़ो, परंतु परमात्मा के समक्ष पूर्ण समर्पण कर के लड़ो। वाहन बन जाओ।” अब समर्पण का अर्थ है परम जागरूकता, अन्यथा तुम समर्पण नहीं कर सकते। समर्पण का अर्थ है अहंकार को गिरा देना, अहंकार तुम्हारी अचेतनाहै। कृष्ण कहतें हैं, “अहंकार को गिरा दो और परमात्मा पर छोड़ दो। फिर उनकी मर्जी से होने दो। फिर जो कुछ भी हो, सब अच्छा है।
अर्जुन विवाद करतें हैं। बार-बार वे नए तर्क खड़े करतें हैं और कहतें हैं, “पर इन लोगों को मारना– जो निर्दोष हैं, इन्होंने कुछ गलत नहीं किया है–बस एक राज्य के लिए इतने लोगों की हत्या करना, इतनी हिंसा, इतनी हत्या, इतना रक्तपात… यह सही कैसे हो सकता है? एक राज्य के लिए इन लोगों की हत्या करने के बजाये मैं सब कुछ त्याग कर किसी जंगल में जा कर एक भिक्षु बन जाना पसंद करूंगा।”
अब, यदि तुम बस बाहर से देखोगे, अर्जुन तुम्हे कृष्ण से ज्यादा धार्मिक नज़र आएंगे। अर्जुन कृष्ण से ज्यादा गांधीवादी नज़र आएंगे। कृष्ण बहुत खतरनाक दिखाई देते हैं। वे कह रहें हैं, “यह भिक्षु बनने और हिमालय की गुफाओं की तरफ पलायन करने की मूर्खता गिरा दो।यह तुम्हारे लिए नहीं है। तुम सब परमात्मा पर छोड़ दो। तुम कोई निर्णय ना लो, तुम सब निर्णय लेना गिरा दो। तुम बस शांत हो जाओ, सब छोड़ दो और उसे तुम में प्रविष्ट हो जाने दो, और उसे तुम्हारे द्वारा बहने दो। उसके बाद जो भी हो… यदि वह तुम्हारे निमित भिक्षु बनना चाहता है, तो वह भिक्षु बन जाएगा। यदि वह तुमरे निमित योद्धा बनना चाहता है तो वह योद्धा बन जाएगा।”
अर्जुन ज्यादा नैतिकवादी और निष्ठावादी दिखते हैं। कृष्ण बिल्कुल इसके विपरीत दिखते हैं। कृष्ण एक बुद्ध हैं, एक जागृत आत्मा। वह कह रहें हैं, तुम कोई निर्णय मत लो। तुम्हारे अचेतन से जो भी निर्णय तुम लोगे गलत होने वाला है, क्योंकि अचेतन ही गलत है।” और एक मूर्ख व्यक्ति अचेतन में जीता है। यदि वह अच्छा भी करना चाहे तो, वास्तव में वह बुरा करने में ही सफल होता है।
सादर

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betnano giriş
betpark giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
mavibet giriş
mavibet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betorder giriş
mavibet giriş
mavibet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vaycasino giriş
bettilt giriş
realbahis giriş
realbahis giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
vaycasino
vaycasino giriş
gobahis giriş
gobahis giriş
vdcasino giriş
betorder giriş
betorder giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
meritking giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betasus giriş
betasus giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
hititbet giriş
meritking giriş
nitrobahis
nitrobahis
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
grandpashabet
grandpashabet
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş