सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के पुरोधा श्रीराम, अध्याय – 12 (क) संपूर्ण भारत ही बन जाए श्रीराम मंदिर

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संपूर्ण भारत ही बन जाए श्रीराम मंदिर

मंदिर भारतीय संस्कृति में एक विशेष पवित्र स्थल का नाम है। जहां भीतरी बाहरी पवित्रता को स्थान दिया जाता है। यह वह स्थल है जहां जाकर बाहरी दुनिया की चहल-पहल और कोलाहल सब शांत हो जाता है । व्यक्ति के भीतर का संसार मुखरित होकर उसका मार्गदर्शन करने लगता है। भीतर की असीम शांति की प्राप्ति से उसका चेहरा तेज और सात्विकता के भावों से दमक उठता है। यह आवश्यक नहीं कि ये मंदिर कहीं किसी विशेष स्थान पर ही हो, यह हमारे घर में भी हो सकता है और जब उस परमपिता परमेश्वर में लौ लग जाती है तो यह घर में भी ना होकर हमारे ह्रदय मंदिर में स्पष्ट दिखाई देने लगता है।
जिसने इस मंदिर में जाना आरंभ कर दिया और इसके पवित्र चिंतन के अनुसार अपने जीवन -आचरण को सुधार लिया उसका कल्याण हो जाता है। हमारे ऋषियों ने मंदिरों की स्थापना इसीलिए की थी कि यहां जाकर व्यक्ति काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, ईर्ष्या, घृणा आदि से ऊपर उठकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्ग पर चल पड़ता है।
   वैश्विक साहित्य में सबसे पवित्र शब्द यदि कोई है तो वह धर्म है। क्योंकि यह व्यक्ति के जीवन को साधता है। मर्यादित और संतुलित करके चलने की असीम शक्ति प्रदान करता है। मंदिरों को हमारे देश में धर्म स्थल भी कहा जाता है। मंदिरों को धर्म स्थल कहे जाने का एक कारण यह है कि यहां पर धर्म चर्चा होती है, और धर्म के उन 10 लक्षणों पर विचार किया जाता है जिन्हें मनु महाराज ने इस प्रकार उल्लेखित किया है :-

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति ६.९२)

अर्थात धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शौच (स्वच्छता), इन्द्रियों को वश मे रखना, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना ; ये दस धर्म के लक्षण हैं।
जहां धर्म के ये 10 लक्षण प्राप्त होते हैं वहां शांति सुव्यवस्था अपने आप होती है। वहां ऐसा योग बनता है जिसमें भक्त अपनी भक्ति के माध्यम से अपने भगवान को प्राप्त कर सकता है। जहां धर्म के इन 10 लक्षणों के अनुसार जीवन यापन करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति व्यक्ति के भीतर पाई जाती है वहां छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष आदि सांसारिक विकार ढूंढने से भी नहीं मिलते। जिस परिवार के सदस्य एक दूसरे के साथ धर्मानुसार बर्ताव करते हैं, उसे परिवार को लोग मंदिर कहकर पुकारा करते हैं।
   कभी भारत 33 करोड़ लोगों की जनसंख्या के साथ 33 करोड़ देवताओं का देश था। यह तभी संभव हो पाया था जब प्रत्येक व्यक्ति उसी योग को प्राप्त कर लेता था जिसमें भक्त अपनी भक्ति के माध्यम से भगवान को प्राप्त करता है। ऐसी पवित्र स्थिति को सृजित करने में हमारी राजनीति का विशेष योगदान होता था। तब राजनीति में ऐसे लोग ही पदार्पण करते थे जो मंदिर संस्कृति को बचाने के प्रति संकल्पित होते थे। उस समय भारत की स्थिति कुछ इस प्रकार थी :-

जब तैंतीस कोटि देवों की यह भारत भूमि होती थी ।
भारत के रहते सारी दुनिया तब बेफिक्री से सोती थी।।
आलम की मस्ती न्यारी थी भारत के दुनिया गुण गाती ।
  चहुँओर शांति पसरी थी हर  भोर शांति पर इठलाती ।।

धर्म के विषय में महर्षि याज्ञवल्क्य जी ने भी अपना चिंतन प्रकट किया है। उन्होंने कहा है कि :-

अहिंसा सत्‍यमस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।
दानं दमो दया शान्‍ति: सर्वेषां धर्मसाधनम्‌।।

अर्थात अहिंसा, सत्य, चोरी न करना (अस्तेय), शौच (स्वच्छता), इन्द्रिय-निग्रह (इन्द्रियों को वश में रखना), दान, संयम (दम), दया एवं शान्ति – यह धर्म के 10 लक्षण हैं।
याज्ञवल्क्य जी के द्वारा दिए गए धर्म के इन लक्षणों पर भी यदि विचार किया जाए तो मनु महाराज और याज्ञवल्क्य जी दोनों का चिंतन एक जैसा ही दिखाई देता है। इतना गहन चिंतन हमारे ऋषियों ने मानव समाज के निर्माण के लिए किया । उनके इस प्रकार के गहन चिंतन से ही हम समतामूलक समाज की वर्तमान अवधारणा से भी ऊंचे दर्जे के दिव्य समाज का निर्माण करने में सफल हो पाए थे। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में एक देवता था। जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए समाज में अफरा-तफरी नहीं फैलाता था । तब प्रत्येक मनुष्य दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में ही आनंद अनुभव करता था।  यही देवता प्रवृत्ति होती है। इसी प्रकार के भाव से दिव्य समाज का निर्माण होता है।
महाभारत के महान यशस्वी पात्र महात्मा विदुर ने धर्म के आठ अंग बताए हैं –

इज्या (यज्ञ-याग, पूजा आदि), अध्ययन, दान, तप, सत्य, दया, क्षमा और अलोभ।

उनका कहना है कि इनमें से प्रथम चार इज्या आदि अंगों का आचरण मात्र दिखावे के लिए भी हो सकता है, किन्तु अन्तिम चार सत्य आदि अंगों का आचरण करने वाला महान बन जाता है।
जिस समाज और राष्ट्र में उपरोक्त उल्लेखित धर्म के इन लक्षणों का उस समाज या राष्ट्र के नागरिकगण स्वाभाविक रूप से अभ्यास करते हैं वह समाज और राष्ट्र इहलौकिक और पारलौकिक उन्नति करता है। उसका सारा परिवेश दिव्यता के भावों से परिपूर्ण हो जाता है । हम इस बात को बड़े गर्व के साथ कह सकते हैं कि संसार के किसी अन्य देश के किसी चिंतक, समाजशास्त्री या दार्शनिक ने दिव्य समाज की ऐसी अवधारणा पर चिंतन नहीं किया है जैसी अवधारणा पर हमारे महान ऋषि पूर्वजों ने किया है।
रामचंद्र जी ने अपने जीवन में धर्म की स्थापना के लिए संघर्ष किया । जब उनके बारे में यह कहा जाता है कि उन्होंने धर्म की स्थापना के लिए संघर्ष किया तो समझो कि उन्होंने धर्म के इन्हीं दिव्य भावों को स्थापित करने के लिए लड़ाई लड़ी। जो लोग इन दिव्य भावों से अलग किसी पाशविक संस्कृति को अपनाकर समाज को आतंकित कर रहे थे, उनका विनाश करना उन्होंने अपना जीवन ध्येय बनाया। उनके अथक और गंभीर प्रयासों के चलते उस समय संपूर्ण भूमंडल दिव्य भावों से ओतप्रोत आर्य लोगों और आर्य संस्कृति का पावन मंदिर बन गया था। आज जो लोग हम पर व्यंग्य करते हैं कि भारत तो हमारे ज्ञान के कारण जीवित है, उनके विषय में तो बस इतना ही कहा जा सकता है :-

जो लोग हमारे भारत को दिन रात कोसते ये कहकर।
भारत ने ज्ञान हमसे सीखा वह कैसे गर्व करे खुद पर।।
उन अज्ञानी पशुओं को भारत के समाज का ज्ञान नहीं।
दिव्य समाज के भावों का अपने अंतर में कुछ भान नहीं।।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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