अहंकार को जीत ले, करना तू प्रणिपात
बेशक तन से अपंग हो,
पर मन से हो बलवान।
ऐसे नर आगे बढ़ें,
सब देखकै हों हैरान ॥837॥
भाव यह है कि मनुष्य बेशक तन से विकलांग हो किन्तु मन से विकलांग न हो, उनके मन में कुछ कर गुजरने का एक जुनून हो तो सफलता एक दिन उनके चरण चूमती है। यह देखकर लोग आश्चर्यान्वित होते है।
तन से तीन पाप हों,
चोरी हिंसा व्यभिचार।
तन से ही तीन पुण्य हों,
दया दान उपकार ॥838॥
उपकार से अभिप्राय यहाँ सेवा से है।
अहंकार को जीत ले,
करना तू प्रणिपात।
अर्पण का रख भाव तू,
ये गीता की बात  ॥839॥
प्रणिपात अर्थात प्रणाम।
अर्थात इस संसार में एक साधक की तरह जीओ। अर्पण, तर्पण और समर्पण को जीवन का मूलमंत्र बनाओ। सरल शब्दों में कहें तो- अहंकार शून्य होकर रहो, श्रेष्ठ पुरुषों को प्रणाम करो तथा उस सृष्टा के लिए हृदय में सर्वदा समर्पण का भाव रखो।
धन के वारिस बहुत हैं,
धर्म का दुर्लभ होय।
धन के संग जो धर्म दें,
ऐसा बिरला कोय ॥840॥
भाव यह है कि इस संसार में धन के वारिस तो बहुत है किन्तु कुल में धर्म की परम्पराओं को अक्षुण्ण रखने वाला उनका परिवर्द्धन, परिमार्जन और रक्षण करने वाला बड़ा ही दुर्लभ होता है। अपनी संतान को धन के साथ धर्म के संस्कार देने वाला भी बिरला होता है। हमेशा याद रखो, अपनी संतान को धन दो, उन्हें धन कमाना सिखाओ, साथ ही धर्म के संस्कारों की सौगात देकर जाओ अन्यथा वे आपके दिये हुए धन को व्यसनों में बर्बाद कर देंगे।
पत्थर दिन से अपेक्षा,
केवल मन की भूल।
कितनी ही कर याचना,
शूल बनै नहीं फूल ॥841॥
शूल से बचना हो अगर,
तो बज्र बन जाए।
स्वतः ही मिट जाएगा,
जब शूल टकराय ॥842॥
विवेक-किनारों के बीच में,
बहे भावना की धार।
नदी की नाई मुफीद है,
अन्यथा करै संहार ॥843॥
व्याख्या- मनुष्य भावनाओं का पुतला है। मानव के अन्तस्थल में असंख्य भावनाओं का भंडार है। जब तक ये भावनाएँ विवेक रूपी किनारों के बीच में प्रवाहित होती है तो बड़ी सकारात्मक और कल्याणकारक होती हैं, यदि ये भावनाएँ विवेक के किनारों को तोड़ दें तो बड़ी नकारात्मक और विध्वंसकारी होती है, जब तक अपने किनारों के बीच बहती हैं। यदि नदी अपने किनारों को तोड़ दे, तो अपनी बाढ़ की विभीषिका से जनजीवन अस्त व्यस्त कर देती है और त्राहि-त्राहि मचा देती है। इसलिए भावनाओं पर हमेशा विवेक का अंकुश रखो।
महाभारत को देखिए धृतराष्ट्र के दृदय में पुत्र प्रेम की भावना थी जबकि दुर्योधन के हृदय में प्रतिशोध की भावना थी। विडम्बना यह भी कि दोनों ने विवेक के किनारे तोड़ दिये, जिसका परिणाम हुआ – सर्वनाश।
नरपति धनपति सब गये,
चिता की खा गयी आग।
अल्पकाल सुख के लिए,
मत कर धर्म का त्याग ॥844॥

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