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स्वास्थ्य

पार्किंसन अर्थात कंपवात के रोगी, रोग और उसका उपचार

डॉ. अनुराग विजयवर्गीय

आधुनिक जीवन-शैली के कारण आजकल पार्किन्सन के रोगियों की भरमार होने लगी है। यह तंत्रिका तंत्र के क्षरण के कारण पैदा होने वाला जटिल रोग है। सामान्य तौर पर साठ वर्ष की उम्र के बाद ही यह रोग पैदा होता है। महिलाओं की अपेक्षा यह रोग पुरुषों में अधिक देखने में आता है। आरंभ में इस रोग के लक्षण बहुत ही कम दिखाई देते हैं, जो कि धीरे-धीरे बढ़ते ही चले जाते हैं। आयुर्वेद में इस रोग को कंपवात कहा जाता है। आयुर्वेदीय ग्रंथ माधव निदान के अनुसार इस रोग को कंपवात कहा जाता है, जो कि वात नामक दोष के बढ़ जाने से पैदा होता है। यही बढ़ा हुआ वायु नाड़ी मंडल की स्थिरता को नष्ट कर देता है। इस रोग में पेशियों में जड़ता तथा दुर्बलता पैदा हो जाती है। कंपन क्रमबद्ध होता है।
लक्षण
1 कंपन होना – प्रसंगवश स्मरणीय है कि कंपन प्राय: पहले एक हाथ से शुरु होता है, तत्पश्चात उसी तरफ के पांवों को जकड़ता है। तत्पश्चात दूसरी तरफ के हाथ-पैरों को अपनी चपेट में ले लेता है। धीरे धीरे हालत यह हो जाती है कि रोगी चाय का कप भी बड़ी मुश्किल से पकड़ पाता है।
2 चेहरे एवं हाथों की मांसपेशियों में कठोरता आना।
3 धीमी एवं लडख़ड़ाती चाल, कदम कमजोर, चलते समय आगे की ओर झुकाव, छोटे-छोटे कदम।
4 भावशून्य चेहरा मानो कि मास्क पहना हुआ है।
5 पलकों के झपकने में कमी आना
6 बात करने में कठिनाई एवं तकलीफ होना अथवा आवाज पर नियंत्रण नहीं रहना
7 निगलने में कठिनाई एवं तकलीफ होना अथवा आवाज पर नियंत्रण नहीं रहना
8 कब्ज से पीडि़त रहना
9 चिंता एवं अवसाद अथवा डिप्रैशन से पीडि़त रहना
10 स्मरण शक्ति में कमी आना
11 रोग की तीव्र अवस्था में चित्त-विभ्रम (कन्फ्यूजन) बना रहना
12 मन:स्थिति की अस्थिरता रहना
आयुर्वेदिक उपचार
आयुर्वेद के अनुसार कंपवात रोग में पौष्टिक भोजन, अफीम, कुचला और गूगल का सेवन अत्यधिक लाभ देता है। लहसुन, अश्वगंधा, तगर, ब्राह्मी, आत्मगुप्ता इत्यादि एकल औषधियों का सेवन करने से आशातीत लाभ मिलते हैं। साथ ही किसी प्रकार के दुष्प्रभावों से भी रोगी का बचाव होता है, क्योंकि आयुर्वेद की ये औषधियां पूर्णत: निरापद एवं अमृत के समान लाभकारी हैं।
कुछ घरेलू प्रयोग-
1 हाथ-पांव कांपने पर गोरखमुंडी तथा लौंग का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर, एक साथ मिलाकर रखें। एक-एक ग्राम की मात्रा में सवेरे-सायं सेवन करें। गोरखमुंडी पंसारियों के पास सुलभ हो जाती हैं
2 कंपवात के रोगी को नियमित रूप से बड़ी हरड़ के चूर्ण का सेवन करना भी बहुत लाभ देता है।
3 एक अचूक नुस्खा-
बादाम गिरी – चार दाने
अखरोट – एक दाना
चार मगज – एक चाय चम्मच भर
खसखस – एक चाय चम्मच भर
इन सबको रात के समय थोड़े पानी में भिगोकर रखें। सवेरे खरल अथवा कुंडी में भली-भंाति घोंट-पीसकर पी लें। नियमित रूप से इस प्रयोग को करते रहने से नर्वस-सिस्टम एवं मस्तिष्क को असीम शक्ति प्राप्त होती है।
4 इस रोग से पीडि़त व्यक्ति को एक चम्मच सौंठ का चूर्ण देशी गाय के एक कप गरम दूध में मिलाकर सवेरे-सायं पीने से बहुत लाभ मिलता है। मैंने इस प्रयोग से अनेक रोगियों को ठीक होते हुए स्वयं देखा है। इससे अंगुलियों में कंपन्न होने की शिकायतें भी दूर होने लगती हैं।
5 रात के समय सोने से ठीक पहले एक कप दूध में दो चम्मच अरंडी का तेल (कैस्टर ऑइल) मिलाकर पीने से भी इस रोग से पीडि़त व्यक्ति का कब्ज आसानी से दूर होने लगता है तथा वात दोष शांत होकर यह रोग नियंत्रित होने लगता है।
6 हल्दी से बने हुए कैप्सूल का नियमित सेवन करने से पार्किन्सन के रोगियों की स्मरण-शक्ति में बेहद सुधार आने लगता है। इस प्रयोग से रोगी डिमेंशिया से भी बचे रहते हैं।
7 इन रोगियों को अलसी का सेवन किसी न किसी रूप में अवश्य करते रहना चाहिए। अलसी बेहतरीन एंटी-ऑक्सीडेंट है, जो रेटिना और दिमाग की कोशिकाओं का विकास करता हैै, जिससे स्मरण शक्ति और एकाग्रता बढ़ती है।
8 सामान्य तौर पर यह देखा गया है कि पार्किन्सन रोग से पीडि़त लोगों में विटामिन बी 6 की कमी पाई जाती है। प्रसंगवश उल्लेखनीय है कि यह विटामिन मस्तिष्क में डोपामाइन के उत्पादन में सहयोगी होता है। यही डोपामाइन एक तंत्रिका से दूसरी तंत्रिका तक आवेगों को पहुंचाता है। डोपामाइन को चिकित्सकीय भाषा में न्यूरो ट्रांस्मीटर शब्द से जाना जाता है। यह विटामिन डिप्रैशन से भी मुक्ति दिलाता है।
9 विटामिन सी तथा ई का नियमित सेवन भी रोगी को लाभ देता है। इसके पीछे कारण यह है कि ये दोनों विटामिन मस्तिष्क में बेसल गैंग्लिया में रहने वाली कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाते हैं।
विटामिन सी के कुदरती स्रोत-विविध नींबू प्रजाति के फल, ब्रोकली, लाल मिर्च, गहरे एवं हरे रंग वाले फल एवं सब्जियां जैसे कीवी, फ्रास बीन, चोला की फली, ग्वार की फली, पालक, भिंडी, करेला, लौकी, अंकुरित धान्य, बंद गोभी, हरी-मिर्च, हरा धनिया, हरे अंगूर, स्ट्राबैरीज, आंवला।
विटामिन ई के कुदरती स्रोत-अंकुरित गैंहू, बादाम, सूरजमुखी के बीज, साबुत धान्य, हरी-सब्जियां, मूंगफली, मटर, सोयाबीन, दूध, काजू, पिस्ता, वेजीटेबल आइल्स।
10 लहसुन की खीर-
सामग्री – लहसुन की कलियां दस ग्राम,
गाय का दूध – लगभग सौ मिलीलीटर
पानी – तीन सौ मिलीलीटर
लहसुन की कलियों को सबसे पहले बारीक पीस लें। इन सबको दूध एवं पानी मिलाकर धीमी आग पर पकाएं। पकाने के लिए स्टेनलैस स्टील के बरतन का प्रयोग करें। पकते पकते जब दूध ही शेष बचे और पानी जल जाए, तो इसे छानकर थोड़ी सी शक्कर अथवा शहद मिलाकर सेवन करें।
11 रात को सोने से पहले पंचगव्य घी की दो बूंदें नाक में डालें।
12 नियमित रूप से नाभि में सरसों का तेल लगाएं।
13 बुढ़ापे के कारण पैदा हुए रोग से पीडि़त व्यक्ति को गैंहू के जवारों का रस नियमित रूप से पीने से विशेष लाभ होता है।
14 अनुलोम-विलोम, भ्रामरी, उद्गीथ नामक प्राणायामों का नियमित अभ्यास भी लाभ देता है।

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