Categories
स्वास्थ्य

कैंसर की बीमारी की भ्रान्तियां और आयुर्वेदिक उपचार


डॉ. आर. अचल

कैंसर एक ऐसा भयानक रोग है जिसका नाम सुनते ही रोगी की जीवनीशक्ति समाप्त हो जाती है और उसके परिजन भी हताश हो जाते हैं। कैंसर होने पर सामान्यत: यह मान लिया जाता है कि अब मृत्यु निश्चित है। और भी बहुत सी जानलेवा बीमारियां हैं, परन्तु उनकी चिकित्सा की जा सकती है। इसलिए उनकी भयावहता कम हो गयी है। जबकि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कैंसर अभी तक लाइलाज है। जिस दिन कैंसर का इलाज संभव हो जाएगा, उसी दिन कैंसर का भय भी खत्म हो जायेगा।
किसी भी रोग की तीन स्थितियाँ होती है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इसे साधारण, मध्यम और गंभीर कहते हैं तथा प्राचीन भारतीय आयुर्विज्ञान में साध्य, कष्टसाध्य व असाध्य कहते है। इनमें से केवल तीसरी स्थिति ही खतरनाक होती है, जिसमें चिकित्सा का केवल प्रयास किया जा सकता है। कैंसर भी इसी स्थिति में भयावह होता है। कैंसर के विषय में विशेष बात यह है कि इसकी पहचान अक्सर तीसरी स्थिति में ही हो पाती है। यदि पहली या दूसरी स्थिति में पता चल सके तो इसके खतरे कम हो सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा में इसके लिए सर्जरी को बेहतर विकल्प माना जाता है, पर बहुत बार सर्जरी के बाद स्थिति और गंभीर हो जाती है। आयुर्वेद में इसके लिए केवल औषधीय विकल्प है जिसके अनेक आयुर्वेद चिकित्सकों के सफल अनुभव भी हैं। सामान्यत: आयुर्वेद की चिकित्सा के लिए रोगी अंतिम स्थितियों में ही पहुँचता है, जिसमें परिणाम आने के कम संभावना होती है। इसके बाद भी यहाँ यह खेदजनक तथ्य है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अपने मानक है। उसका अपना भय का बाजार भी है। इसलिए किसी अन्य चिकित्सा पद्धति के परिणाम को वह अपने भय के बाजार पर प्रभावी नहीं होने देता है और उसे अवैज्ञानिक तथा अप्रमाणिक कह कर खारिज कर देता है।
यह मामला इस तरह है जैसे किसी रोग में आयुर्वेदिक औषधि के प्रभावी होने दावा होता है तो आधुनिक चिकित्सा के मानकों के अनुसार उस औषधि के सक्रिय सूक्ष्म रासायनिक तत्व का पता लगाया जाता है। इसके पश्चात उस तत्व के उस रोग पर प्रभावी होने के दावे को खारिज कर दिया जाता है। जबकि आयुर्वेद की औषधियों का निर्माण अनेक स्थूल घटकों से होता है। किसी-किसी योग में 50 से 100 घटक भी होते है, जिनके संयुक्त प्रभाव व संयुक्त रासायनिक विश्लेषण करने की बजाय एक या अधिकतम तीन रासायनिक तत्वों का अध्ययन किया जाता है। इसलिए प्रभावी होते हुए भी वह योग अप्रभावी व अवैज्ञानिक सिद्ध कर दिया जाता है। इससे जनता और आयुर्वेद के नये चिकित्सको में अविश्वास फैल जाता है। इस प्रकार किसी कठिन रोग का विकल्प मिलने से रह जाता है। इसे चिकित्सा विज्ञान का बौद्धिक षडयंत्र कह सकते हैं।
इसका परिणाम समाज पर यह होता है कि सामान्यत: कोई भी कैंसर रोगी स्थानीय चिकित्सा आरम्भ करके रोग का निर्णय होने पर शीर्ष संस्थानो तक पहुँचता है और जब वहाँ से असाध्य घोषित कर उसकी मृत्यु का समय घोषित कर दिया जाता है तब वह आयुर्वेद को आजमाने आता है। इस स्थिति में आयुर्वेद भला कितना परिणाम दे सकता है, यह विचारणीय प्रश्न है। फिर भी कुछ रोगियों में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। आयुर्वेद चिकित्सा सें रोगी पीड़ा का शमन करते हुए घोषित मृत्यु तिथि को पार करने में सफल रहते है। इसी विश्वास पर कुछ आर्थिक दुर्बल रोगी प्राथमिक अवस्था में आयुर्वेद चिकित्सा की शरण में जाते हैं, जिनका परिणाम हमें आशान्वित करता है, भले ही उसे आधुनिक चिकित्सा विज्ञान स्वीकार नहीं करता है और भय का बाजार बनाकर रोगियों के सत्व बल कमजोर करता है।
आइये, अब समझते हैं कि दरअसल कैंसर है क्या? भोजन और पर्यावरण से शरीर का पोषण होता है यह सामान्य जानकारी है। कोशिकाओं में भी वे सभी क्रियायें होती है जो शरीर में होती है।जैसे समाज में अचानक किसी कारणवश कोई व्यक्ति विक्षिप्त होकर अधिक खाने लगता है और उसका आकार और व्यवहार असामान्य हो जाता है,उसी तरह शरीर को कोई कोशिका किसी कारणवश विक्षुब्ध होकर विक्षिप्त हो जाती है, अन्य कोशिकाओं से अतिरिक्त पोषण लेने लगती है। अन्य कोशिकाओं के हिस्से का पोषण लेने के साथ ही अन्य निकटतम कोशिकाओं को भी अपने जैसा बनाने लगती है। इस कारण इन कोशिकाओं का अनियंत्रित तथा विकृत विकास होने लगता है। सामान्यत: एक कोशिका के क्षतिग्रस्त होने पर जैविकतंत्र स्वत: मरम्मत कर लेता है या आमतौर पर वह कोशिका मर जाती है। परन्तु जब ऐसी क्षतिग्रस्त या अपरिपक्व कोशिकाएं मरने के बजाय अनियंत्रित विभाजन और विकास करने लगती है तो कैंसर कोशिकाएं बन जाती हैं।
आयुर्वेद में इस स्थिति सन्निपातज विद्रधि, गुल्म या अर्बुद कहा गया है। यह शरीर के किसी भी अंग या हिस्से में हो सकता है। जिस हिस्से में होता है उसी के अनुसार इसका नामकरण किया जाता है। यहाँ यह विशेष रुप से उल्लेखनीय है कि ऐसा क्यो होता है, इसका ठीक-ठीक प्रमाणिक तौर नहीं पता लगाया जा सका है। इसलिए तम्बाकू, शराब, बैगन, चावल, कपड़े, विभिन्न रसायन से लेकर पर्यावरण प्रदूषण, जीवनशैली और आनुवंशिकता तक को इसका कारण माना जा रहा है। आयुर्वेद में भी सामान्यत: दूषित, प्रतिकूल आहार-विहार को इसका कारण बताया गया है।
सामान्यत: कैंसर आरम्भिक काल में पहचान में नहीं आता है, जो इसे खतरनाक बनाता है। इसलिए आज आधुनिक रोगपरीक्षण के संसाधनों से इसका संदेह होते ही उस अंग को काट कर निकाल देने को ही चिकित्सा माना जाता है। स्तन और गर्भाशय में कैंसर होने पर ऑपरेशन सहज है, पर जटिल अंगो में यह चिकित्सा सफल नहीं है, क्योंकि अक्सर देखा गया है कि मस्तिष्क, लीवर, पैंक्रियाज, गले आदि के आपेशन के बाद भी पूरी तरह से कैंसर कोशिकायें निकल नहीं पाती हैं और वे और अधिक तेजी से विकसित होने लगती हैं। इस स्थिति में रेडिएशन थेरेपी का प्रयोग किया जाता है, जिसे बहुत सफल नहीं कहा जा सकता है, क्योकि ऐसे ही रोगियो के अंतिम दिनों की घोषणा की जाती है। निष्कर्ष यह कि कैंसर चिकित्सा में आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी उतना ही अप्रमाणिक है जितना कि आयुर्वेद पर संदेह किया जाता है।
इससे बचाव के उपाय में आधुनिक चिकित्सा में हमेशा शरीर की महँगे जाँच के लिए कहा गया है, जबकि आयुर्वेद के अनुसार यदि जीवन में कुछ वर्षो के अन्तराल पर शरीर का पंचकर्मीय शोधन या रसायन चिकित्सा का प्रयोग किया जाय तो निश्चित ही अन्य गंभीर रोगों के जैसे हृदय, ब्लडप्रेशर, मधुमेह, संक्रमण आदि के साथ कैंसर से भी बचाव संभव है।
कैंसर की चिकित्सा के लिए आयुर्वेद में अर्बुद व त्रिदोषज विद्रधि या गुल्म चिकित्सा के अध्याय का पाठ है, जिसके आधार पर अनेक आयुर्वेद चिकित्सक, उच्च आधुनिक चिकित्सा संस्थानों से हताश लौटे व दुर्बल आर्थिक स्थिति के रोगियों राहत दे रहे है। इस संबंध में काँचनार गुगुलु, नित्यानन्दरस, लोकनाथ रस व हीरक भस्म का प्रयोग विशेष रुप में किया जाता है।इसके साथ अंग विशेष व दोष के अनुसार औषधियों का प्रयोग किया मेरी जानकारी इस प्रकार कई रोगी है,जो आयुर्वेद चिकित्सा से लाभान्वित हुए है। जिसका विवरण निम्नवत है।
एक रोगी जिसका आज से सात वर्ष पीजीआई लखनऊ मे पूर्व ब्रेन ट्यूमर का आपरेशन किया गया। बायोप्सी जाँच में कैंसर कोशिका का होना पाया गया.जिसके उपरान्त विशेषज्ञो ने उसकी आयु छह माह निश्चित कर दिया। उस हताश रोगी को नित्यान्द रस,काँचनार गुगुल,महापैचाशिक घृत का प्रयोग कराया गया,वह रोगी अभी तक यानि सात सालों से जीवित है।
एक दूसरी केस रीढ़ की हड्डी के कैंसर का देखा गया जिसे सारे शीर्ष संस्थानों ने एडमिट करने से इन्कार कर दिया था पर विशेष प्रयास कर बी.एच.यू.के आई.एस.एस आयुर्वेद में प्रो.जे.एस त्रिपाठी के चिकित्सा व्यवस्था में चिकित्सा आरम्भ की गयी। एक माह में रोगी चलने-फिरने में समर्थ हो गया और उसकी मृत्यु के एक साल बाद हुई।
इसी प्रकार गर्भाशय, स्तन और मस्तिष्क के फाईब्रसिस-ट्यूमर में आयुर्वेदिक औषधियों के प्रयोग से फाईब्रोसिश का पूर्णत: समाप्त होते देखा गया है। इन सकारात्मक परिणामों को देखते हुए आयुष मंत्रालय व शोध संस्थानों आगे बढऩा चाहिए। परन्तु यह खेदजनक तथ्य है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के सुर में सुर मिलाकर इन परिणामों का उपेक्षा की जाती है और हानिकारक सर्जरी और रेडिएशन चिकित्सा पर विश्वास टिका हुआ है।

आयुर्वेद से किया कैंसर का सफल निदान

लखनऊ निवासी आयुर्वेद चिकित्सक डा. अजय दत्त शर्मा अनेक कैंसर रोगियों के जीवन में उम्मीद की नयी किरण जगा चुके हैं। ऐसे गंभीर रोगी जिन्हें ऐलोपैथिक पद्धति से ऑपरेशन के बाद भी कष्ट व रोग से निजात नहीं मिली; वे भी डा. शर्मा की चिकित्सा से स्वस्थ हैं तथा कष्टमुक्त सामान्य जीवन जी रहे हैं। इस बाबत बात करने पर डा. शर्मा कहते हैं, दरअसल ऐलोपैथिक पद्धति में जो कीमो व रेडियोथेरेपी दी जाती है, उससे रोगी की इम्यिूनिटी यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जाती है। इसे बढ़ाने के लिए वे प्रोटीन व विटामिन्स देते हैं। जबकि इस रोग में हमारी आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का मूल सिद्धांत इम्यिूनिटी बढ़ाने का है। आयुर्वेद कहता है- जराव्याधि नाशनम् इति रसायन। इसके लिए हमारे यहां शरीर के प्रत्येक अंग के लिए अलग अलग रसायन हैं। शरीर के किस अंग में रोग है तथा रोग की अवस्था कौन-सी है, उसी के अनुसार हम निर्धारित मात्रा में इन रसायनों का उपयोग करते हैं।
इस रोग में पुनर्नवा, गुग्गुल व अमृता आदि विभिन्न औषधियों के साथ ताम्र, त्रिवंग, स्वर्ण, हीरक, अभ्रक आदि भस्मों के योग से रोगी की चिकित्सा की जाती है। बताते चलें कि पिछले दिनों ऐलोपैथिक चिकित्सकों के एक वर्ग ने भस्म चिकित्सा पर यह कहते हुए टिप्पणी की थी कि सामान्यत: ये धातुएं हैवी मैटिल्स की श्रेणी में आती हैं और इनका सेवन कैंसर रोगियों के लिए हानिकारक हो सकता है। इसका स्पष्टीकरण करते हुए डा. शर्मा बताते हैं कि यह दृष्टिकोण संकुचित व अज्ञानतापूर्ण है। दरअसल जब इन धातुओं का औषधि के रूप में इस्तेमाल करने के लिए शोधन कर इनकी भस्म बनायी जाती है तो ये प्रोटीन के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं जिनका अवशोषण शरीर आसानी से कर लेता है।
डा. शर्मा कहते हैं कि कैंसर दो प्रकार का होता है – बोनी तथा साफ्ट टिशू कैंसर। उनके मुताबिक मस्तिष्क, गला, जीभ, मसूढ़ा, लीवर, गॉल ब्लैडर, पैंक्रियास, आंत, यूरिनरी ब्लैडर आदि के कैंसर की चिकित्सा में आयुर्वेदिक उपचार अधिक प्रभावी देखा गया है। डा. शर्मा बताते हैं, ”करीब पांच- साढ़े पांच साल पहले पुराने लखनऊ निवासी गोरे नवाब नाम के एक 70 वर्षीय वृद्ध अपनी खांसी का इलाज कराने उनके पास आये थे। खांसी की तीव्रता के कारण वे बोल भी नहीं पा रहे थे। उनके साथ आयी उनकी बेटी ने बताया कि उनका इलाज एक हकीम साहब चल रहा था, पर अब उनका इंतकाल हो चुका है। उन्होंने उनकी नाड़ी देखी और तत्काल राहत के लिए कुछ दवाइयां देकर चेस्ट एक्स-रे तथा पेट का सिटीस्कैन कराके दिखाने को कहा। सिटीस्कैन व अन्य जांचों से पता चला कि उसको पैंक्रियास का कैंसर था, वह भी अंतिम चरण का। मैने उन्हें पीजीआई में दिखाने की सलाह दी। वहां दिखाने पर उन्हें 75 हजार रुपये जमा कराकर तत्काल ऑपरेशन की तारीख लेने को कहा गया। गरीब परिवार के लिए तुरंत इतने पैसों का इंतजाम मुश्किल था सो वे लोग पैसे का इंतजाम करने की बात कह कर पीजीआई से लौट आये और ऑपरेशन होने तक मुझसे दवा करने को कहा। मैंने उनका इलाज किया। चार महीने बाद पैसों का इंतजाम कर अरब से उनका बेटा भारत आया। मैने पीजीआई में ऑपरेशन से पहले पुन: एक बार पेट का स्कैन व जांच कराने को कहा। आपको जान कर ताज्जुब होगा कि दूसरी रिपोर्ट सामान्य थी। मुझे आयुर्वेद चिकित्सा पर विश्वास तो था पर इनका असर इतनी जल्दी होगा, यह बात मेरे लिए भी किसी करिश्मे से कम नहीं थी। जब मैने रिर्पोटों के साथ यह मामला केजीएमयू में जनरल सर्जरी के तत्कालीन प्रमुख प्रो. रमाकांत के सामने रखी तो वे भी अवाक् रह गये। उन्होंने इस मामले को मेडिकोज की कान्फ्रेंस में भी प्रस्तुत किया।”
इसी तरह गले के कैंसर का एक रोगी बीते 13 साल से उनसे इलाज करवा रहा है और दवाइयों के साथ सामान्य जीवन जी रहा है। डा. शर्मा बताते हैं मूल रूप बदायूं के रहने वाले 40 वर्षीय मुज्जमिल हसन जब उनके पास इलाज को आये तो उससे पूर्व वे दो बार अपने गले के कैंसर का ऑपरेशन व कीमोथेरेपी करा चुके थे। आज वे लखनऊ में सिंचाई विभाग में कार्यरत हैं और आयुर्वेदिक दवाओं के साथ अपनी सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। कैंसर रोगियों की सफल चिकित्सा के चलते अब पीजीआई व मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक लाइलाज व गंभीर रोगियों को उनके पास भेजने लगे हैं। अब तक दर्जनों रोगी डा. शर्मा के इलाज से सामान्य जीवन जी रहे हैं।
साभार

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpuan giriş
betpark giriş
betpipo giriş
betpipo giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
safirbet giriş
vaycasino giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
vaycasino giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
madridbet giriş
myhitbet giriş
myhitbet giriş
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
madridbet giriş
madridbet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
madridbet giriş
betvole giriş
betvole giriş
norabahis giriş
betpipo giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
milanobet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
casinofast
safirbet giriş
safirbet giriş
betebet giriş
betebet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
imajbet giriş
imajbet giriş
damabet
milanobet giriş
milanobet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
damabet
betvole giriş
hititbet giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş