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समाज

भारत में जातीय विद्वेष का इतिहास

रवि शंकर

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय के विरुद्ध संसद में लाए गए अनुसूचित जाति/जनजाति विधेयक के बाद देश में भूचाल जैसा आ गया है।
सही बात तो यह है कि जातीय घृणा और विद्वेष का भाव भारतीय, वैदिक अथवा सनातनी भाव नहीं है। जातीय घृणा और भेदभाव का इतिहास हमारे देश में यूरोपीयों के भारत आगमन के लगभग सौ वर्ष बाद यानी सत्रहवीं शताब्दी से प्रारंभ होता है। उसके पहले केवल गौमांसभक्षकों के साथ भारत के लोग किसी भी प्रकार का संबंध रखना पसंद नहीं करते थे। परंतु केवल मात्र किसी जाति में उत्पन्न होने के कारण किसी से घृणा करने की कोई शास्त्रीय व्यवस्था नहीं मिलती। शास्त्रों में जो भी वर्णसंवंधी व्यवस्थाएं मिलती हैं उनमें केवल उतनी ही असमानता है, जितना आज सरकार के द्वारा निर्धारित की गई कर्मचारियों की श्रेणियों में है। प्रथम श्रेणी यानी राजपत्रित अधिकारी और चतुर्थ श्रेणी यानी चपरासी आदि में जितनी भिन्नता और समानता आज मानी जाती है, उतनी ही भिन्नता और समानता भारतीय जातीय व्यवस्था में थी। वह भिन्नता और समानता व्यवस्थागत थी न कि घृणा आधारित।
इसलिए मालाकार जैसी आज की कथित निम्न जातियों के लोग शीतला माता जैसे विभिन्न देवी-देवताओं के पुजारी बनते थे, गाँवों के समस्त लोकदेवता तथा ग्रामदेवता अवैदिक तथा आज के कथित निम्न वर्णों से ही स्वीकार किये जाते थे, तकनीकी और कारीगरी का समस्त कार्य आज का कथित निम्न वर्ग ही किया करता था और उस कथित निम्न वर्ग के लोगों से ही आज के कथित उच्च जातियों के लोग विवाह तक में कार्य करवाते थे और उनके बिना कोई भी संस्कार पूरा नहीं होता था। यह एक इतिहास है कि भारत में मुस्लिम आक्रमणकाल में जहाँ-जहाँ मुसलमानों का शासन हुआ, वहाँ-वहाँ उन्होंने जबरन लोगों से शौचालय का मल ढुलवाया और जिन्होंने भी प्राण के भय से वह काम किया, हिंदू समाज ने उनसे छुआछूत रखा।
समस्या यह है कि यूरोपीय विशेषकर अंग्रेजों ने देश में उन विद्वानों को विशेष प्रश्रय दिया जिन्हें न तो संस्कृत आती थी और जिन्हें न तो वैदिक शास्त्रों की समझ थी और न ही भारतीय समाज की। उन कथित प्राच्यविद् विद्वानों ने न केवल भारत के इतिहास के साथ खिलवाड़ किया, बल्कि उन्होंने शास्त्रों को दूषित किया और उनके मनमाने अर्थ किए। स्वाधीनता मिलने के बाद भी भारतीय सरकारों ने भी उसी प्रकार के लोगों को ही विद्वान के रूप में स्थापित किया। उन्होंने भारत में केवल जातीय घृणा और विद्वेष फैलाने का ही काम किया। आज स्थिति इतनी भयावह हो गई है कि यदि कोई यह लिख दे कि किसी मुसलमान ने एक हिंदू की हत्या की तो इसे सांप्रदायिक सद्भाव बिगाडऩे वाला काम माना जाएगा लेकिन यदि की यह लिख दे कि एक सवर्ण जाति के व्यक्ति ने एक दलित की हत्या कर दी तो इसे प्रगतिशील काम माना जाएगा। इस मिथ्या धारणा के कारण देश का समस्त बुद्धिजीवी वर्ग और मीडिया देश में जातीय घृणा और विद्वेष फैलाने में जुटा है और उनके इस कार्य के लिए उन्हें शाबाशी दी जा रही है।
समझने की बात यह है कि किसी भी स्तर पर समानता कभी भी घृणा और विद्वेष से नहीं लाई जा सकती। जातीय हो या आर्थिक, समानता एक यूटोपिया ही है और यदि हम इस यूटोपिया को भी लाना ही चाहें तो यह केवल परस्पर प्रेम और विश्वास बढ़ा कर ही लाई जा सकती है। समाज में जातीय प्रेम और सौहाद्र्र को बढ़ान का की प्रयास न तो इस देश का मीडिया करता है, न बुद्धिजीवी वर्ग करता है और न ही सरकारें करती हैं। मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग को विदेशों से चंदा और मान्यता चाहिए होता है तो राजनैतिक दलों को वोट। लेकिन इसमें पिसता है देश का सामान्य जन।

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