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सभी शास्त्र एक मत से कहते हैं कि गाय सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी है

 

calf-cowगाय सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी हैं यह बात शास्त्र कहते है तथा गाय की महत्ता, उपादेयता, आवश्यकता आध्यात्मिक,धार्मिक तथा वैज्ञानिक दृष्टि कोण से सर्वविदित है। इस बारे में खूब लिखा और कहा गया है तथा यह जानकारी सब को हैं।

यहाँ केवल मैं व्यवहारिक रुप में जो हम प्रतिदिन गाय की सेवा करते हैं उस सम्बन्ध में कुछ आवश्यक बातें लिखने का प्रयास कर रहा हूँ जिससे गोवंश सुखपूर्वक रह सके और हमे भी ज्यादा से ज्यादा लाभ हो। बछड़े के जन्म से ही शुरु

कर देते हैं –

(1) बछड़ा जब जन्म ले उस समय से उसकी पूरी देखभाल करें। गाय व्याहने के बाद जैसे ही बछड़ा खड़ा होने की कोशिश करे उस समय उसे पकड़ कर तुरन्त गाय के थन से लगावे और दूध पिलाये और दूध पिलाने से पूर्व गोमाता के चारो थनो में से थोड़ा-थोड़ा गूँता निकाल देवें बाद में बछड़े को थन मुँह में देवे। यदि जन्म के काफी समय के बाद भी बछड़ा खड़ा न होवे तो उसे हाथो से पकड़ कर थन मुँह में देना चाहिए और दूध पिलाना चाहिए। ध्यान रहे बछड़ा ज्यादा दूध न पिये। बाद में उसी बछड़े को नाप से ही दूध पिलावें। न भूखा रहे और न ही अधिक पिये। अधिक दूध पीने पर दस्त लग सकती है। जब बछड़ा 15 दिन का हो जावे,तब उसे आटे में नमक व हल्दी डालकर खिलाना शुरु करना चाहिए। बछड़े को कम से कम 3 माह तक पर्याप्त दूध मिलना चाहिए। गाय को दुहना छोड़ दे उस के बाद भी बछड़े को अच्छी प्रकार सम्भालना चाहिए। चारे के साथ साथ चूरी दाना,पौष्टिक आहार देना चाहिए। इससे बछड़ा जल्दी उपयोगी बनेगा। प्राय: लोग बछड़े को बिल्कुल ही दूध नहीं पिलाते हैं इस कारण बछड़े कुपोषण के शिकार होकर बड़ी मुश्किल से बड़े होते हैं और बहुत कमजोर हो जाते है। ऐसा होने से हानि हमको ही होती है। सेवा करने से 3 वर्ष की बछड़ी ब्याहती हैं। और कुपोषण की शिकार होने पर 5-6 साल में जाकर कही काम आती हैं।

(2) बछड़ो में अगर बछड़ी हो तो बड़ी होने पर सील में आने पर अच्छे नन्दी से गर्भाधान कराना चाहिए। जैसे तैसे नकारा नन्दी के सम्पर्क में नहीं आने देना

चाहिए। ऐसा करने से आगे की नस्ल सुधर जाएगी । यदि बछड़ा हो तो छोटे समय में ही डाक्टर को बुलाकर उसे बैल बना देना चाहिए ताकी उसकी जिन्दगी बच सके। बैल न बनाकर वैसा ही नन्दी छोड़ देते हैं वो मारे-मारे भटकते है और दु:खी होते है। बैल किया हआहो तो बिक जाता है।

(3) व्याहने वाली गाय को व्याहने से पहले ही उसे बांधना,हाथ फेरना,पौष्टिक आहार देना आदि शुरु कर देना चाहिए। व्याहने के समय एक व्यक्ति को गाय के पास रहना चाहिए ताकी वो आराम से सेवा करने देती है वरना किसी को बाद में पास में नहीं आने देगी। घरों में इस बात का ध्यान रखतें है परन्तु गोशालाओं में ऐसा नहीं कर पाते हैं। इस कारण गाय और ग्वाले सबको बाद में बहुत समस्या का सामना करना पड़ता हैं। गाय मारती है। नजदीक नहीं आने देती है। प्रसव पीड़ा,रस्सा बाँधना,दुहना सब नया नया एक साथ होने से गाय भडक़ जाती है जो बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे लाईन पर आती है। अत: हमे पहले से ही इसका ध्यान रखना चाहिए।

(4)गोमाता के व्याहने के बाद जब तक उसके मैली न गिरे तब तक उसके पास रहना चाहिये। कई गाये मैली गिरते ही एकदम वो खा लेती है। मैली खाना बहुत हानिकारक है अत: उसे गिरते ही वहाँ से उठाकर गड्डा खोदकर गाड़ देना चाहिये ताकि कुत्ते तंग न करें। यदि मैली नहीं गिरे तो पांच-छ: सणियों की जड़ों को साफ घोकर उसके टुकड़े करके गुड़ के साथ पानी में उबाले। उसके बाद वह पानी दिन में दो बार तीन दिन तक गाय को पिलाने से मैली गिर जाती है।

(5)जब गाय के प्रसव का समय हो उसके तुरन्त पहले हो सके तो आधा किलो घी देना चाहिये ताकि प्रसव आराम से हो सके। 10-15 दिन पूर्व 2-4 किलो घी पहले से ही दिया हुआ हो तो और भी अच्छा रहता है।

(6) व्याहने पर सबसे पहले खुराक में बाजरी देनी चाहिये। बाजरी पकाकर और कुत्तर में या जो भी चारा हो उस में मिला देना चाहिये।अकेली बाजरी नहीं खिलानी चाहिये। पहली बार थोड़ी बाजरी बिना पकाये दे सकते हैं। बाजरी भी थोड़ी थोड़ी दिन में 3-4 बार खिलाना चाहिये।एक साथ ज्यादा मात्रा में नहीं खिलाना चाहिये। बाजरा के साथ गुड़ व अजवायन भी दें सकते हैं। सप्ताह भर बाजरा देने के बाद फिर सुआवड़ शुरू करनी चाहिये। सुआवड़ में गेहू का भरड़ा,मैथी,गुड़,सुआ,माखनिया भाटा,खोपरे आदि देना चाहिये। ब्याहने के बाद 10-15 दिन तक हरा चारा नहीं देना चाहिये। व्याहने के बाद 2-3 दिन तक नवाया पानी पिलावे ज्यादा ठंडा न पिलावे। नवाये पानी से पूरे षरीर को साफ कर देना चाहिये।

(7) गाय के व्याहने के पूर्व अगर आर (गर्भाश्य बाहर आना) की शिकायत हो तो

ब्याहने के बाद थोड़ी देर बैठने नहीं देना चाहिये। वरना सभी आँते बाहर आकर गाय की जान जा सकती है अगर व्याहने के बाद थोड़े दिनो में ही आयन कठोर हो जायें या थन में खून आवे तो डाक्टरको दिखाना चाहिए। तुरन्त ईलाज न होने पर थन जा सकता हैं।

(8) गोशाला मैं प्राय: बड़े बड़े बछड़े गायों के दूध पीते रहते हैं। दुह कर उन्हें अपनी माँ के साथ थोड़ी देर छोड़ देते है इस कारण वे बिना दूध ही अपनी मां को तंग करते है। अत: 5-6 महीने बाद बछड़ा दुबारा नहीं छोडऩा चाहिये । ऐसा करने पर उसके बहुत ही कम दूध होता हैं।

(9) प्राय: लोगों की शिकायत रहती हैं कि गाय मारती है, दुहने नहीं देती,

बाँधने नहीं देती आदि। पहली बात तो यह है कि गाय के साथ कभी जोर जबरदस्ती नहीं करें और नहीं मारे-पीटे। उसे प्रेम से अपने वश में करें। सबसे सरल तरीका यह है कि आप उनके पास कुछ दूर बैठ जाएँ, फिर थोड़ा नजदीक आवें, फिर चले जावें, फिर आवें, फिर बैठें, फिर कुछ खिलावें। खिलाकर चले जावें । फिर आपके पास वो नजदीक आवे तो धीरे से हाथ फेरने की कोशिश करें और कुछ खिलावे। धीरे-धीरे विश्वास होने पर वो अपने आप आपके पास आयेगी या आप उसके पास जाओगे तो कोई प्रतिकार नहीं करेगी। कैसी भी खराब गाय हो, उसे धीरे-धीरे अपने वश में कर सकते है । हमेशा शरीर पर हाथ फैरना चाहिये और प्रेम से बुलाना चाहिये। ऐसा करेगें तो गाय आपके पीछे-पीछे फिरेगी।

(10) गाय कैसी भी सीधी और सरल हो तो भी दुहते समय हमेशा उसके नोजणा (पीछे के पैरो मे रसा बांधना) देकर ही दुहना चाहिये।

(11) गाय को दुहते समय पहले बछड़े को छोडें ,बछड़े को चाटकर जब गाय के थनों में पूरा दूध भर आवे तब उसे नोजणा (पीछे के पैरो मे रसा बांधना) दे, पहले न देवे। आगे वाँटा रखें और थोड़ी नजदीक से बांधे और बछड़े को पास में ही बांधे ताकि वह आराम से दूध देती है। बछड़ा पास में न हो और खाने को भी न हो तो दुहते समय वह इधर उधर सरकती हैं। अत: पहली बार से ही वैसी आदत डाले ताकि न दुहने देने की शिकायत कभी आवे ही नहीं। गाय के पास बछड़ा दुहते समय बांधने से बछड़ा भी जल्दी खाना खाना सीखता है। खाने के लिये वांटा रखकर दुहने से कभी बछड़ा मर जाये तो गाय बाँटे पर दुहने देती हैं।

(12)गाय को दुहने से पहले व बाद में थनों को अच्छी प्रकार से धो लेना चाहिए।

(13) प्राय: लोग जब तक गाय दूध देती है तब तक अनाज चूरी या गोपौष्टिक आहार जो भी हो वो देते रहते हैं परन्तु जैसे ही दुहना बंद किया तो अनाज, चूरी बंद कर देतें हैं। ऐसा नहीं करना चाहिये। मात्रा थोड़ी कम कर सकते है पर बिल्कुल बन्द नहीं करना चाहिये। इससे गाय थक जाती है तथा आगे दूध पर भी असर पड़ता हैं। जब हम 2-3 महीनें गाय दुहना छोड़ देते हैं उस समय अच्छी खुराक मिलने से गााय की व्याहत में दूध अच्छा मिलता हैं।

(14)गोमाता को वांटे के साथ हमेशा थोड़-2 सेंधा नमक देते रहना चाहिये। स्वास्थ्य के लिये नमक अतिआवश्यक हैं।

(15) पुराने समय में तो चारागाह आदि सब सुविधा थी और लोग भी गायों पर खूब ध्यान देते थे पर अब सबकी कार्य क्षमता घट गयी है। घरों में सर्दी, गर्मी, वर्षा आदि ऋतुओ के अनुसार गाय के रहने की सुविधा हम नहीं कर पा रहे हैं। बरसात के मौसम में जब तक बारिश होती रहती है तब तक गाय खड़ी रहती है बैठती नहीं है। वर्षात बन्द हो जाती है तो भी अगर गाय बन्धी रहती हैं, वहाँ पानी होगा तो गाय नहीं बैठेगी इस कारण वर्षात के मौसम में विशेष ध्यान रखना चाहिये और कीचड़ में और पानी में गाय को नहीं रखें साफ व सूखे स्थान पर बाँधे। हमेशा उसी स्थान पर न रखकर हेरा फेरी करते रहें और स्थान को सुखा कर ठीक करते रहे। तभी गाय रह पायेगी। वर्षा के मौसम में 2-3 दिन तक खड़े रहते गाय को मैने देखा है। कीचड़ से बाहर ले जाने पर ही गाय बैठी ऐसा प्रत्यक्ष कई बार देखा गया हैं। इसी प्रकार गर्मी व सर्दी में भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये। जो गायें रात दिन बंधी रहती है उनको सर्दी के मौसम में दिन में एक बार धूप में अवश्य ले जाये गर्मी में छांया के हिसाब से हेरा फेरी करते रहें। वैसे भी दिन में व रात में रहने का स्थान अलग-अलग होना चाहिए। प्राय: कई गोशालाओ में देखा गया है कि बहुत ऊँची-2

दीवारें तथा रहने के लिये पक्के मकान तथा नीचे ईटें-पत्थर बिछा देते है एवं बहुत ही छोटे स्थान पर निर्धारित मात्रा से अधिक गायें रखते है और चारो ओर से बन्द होने से हवा प्रकाश नहीं आता है। गायो के लिये ऐसा जरूरी नहीं है और अनुकूल भी नहीं है। गायो को केवल सर्दी,गर्मी व वर्षा से थोड़ा बचाव होना चाहिये। बाकी स्थान खुला रहे। जहाँ दिन मे गाये रहती है वहाँ रात्रि में नहीं रह सकती और जहाँ रात्रि में रहती है वह स्थान दिन मे अनुकूल नहीं पड़ता है। जैसे पक्का कमरा है वहाँ छाया होने से दिन में तो गाय रह जायेगी पर रात्रि में वहाँ भंयकर गर्मी लगेगी। अत: गर्मी की रात्रि में बिल्कुल खुले स्थान मे रखना आवश्यक है। इसी प्रकार सर्दियो की रात्रि में कमरे में रह जाऐगी दिन में एक बार धूप में लाना अनिवार्य है उसी प्रकार बैठने का स्थान भी रेतीला हो जहाँ आराम से बैठ सके। पत्थर पर चैबीसो घंटे गाये को रखने से तकलीफ पाती है। अत: ऐसा हमें व्यावहारिक दृष्टि से सब देख कर रख रखाव व्यवस्था करनी चाहिये।

(16) जो क्षेत्र सिंचित है उस क्षेत्र के घरो में गायें हमेशा बंधी रहती है। वे छोड़ते नहीं है यह भी ठीक नहीं हैं। गाय के लिये फिरना भी आवश्यक हैं। बिना फिरे खुराक हजम नहीं होगी और चर्बी बढ जायगी। अत: खेत में जमीन थोड़ा थोड़ा हिस्सा गायो के लिये छोड़ें ताकि वहाँ चर-फिर सके। जमीन भी वो शुद्ध रहेगी और गायों को भी आराम रहेगा। जमीन की कमी है फिर भी चाहकर ऐसा करना चाहिए। गोशालाओ में जहाँ अधिक गायें होती है और खुली रहती है वहाँ सबको नहलाना सम्भव नहीं हो सकता हैं परन्तु घरो में जहाँ थोड़ी गाये है और बाधतें है उनको 15 दिन में एक बार गर्मियों के मौसम में सवेरे के समय (धूप निकलने से पहले) नहलाना चाहिये।

(17) गायो को चारा और दाना अनाज या गोपुष्टिक आहार जो भी हो सब उसकी क्षमता के अनुसार दें। आवश्यकता से अधिक मात्रा में भी न दें, वो खा तो जायेगी पर हजम नही होगा और हर समय चारा आगे पड़ा रहने से वो चारा भी कम खाएगी गोशालाओ में तो ऐसा करना सम्भव नहीं है पर घरो में यह कर सकते कि समय पर ही आवश्यकता के अनुसार चारा दें। व्यवस्थित और समय पर चारा पानी देने से गाय जल्दी ही स्वस्थ व हष्ट-पुष्ट बन जाती हैं।

(18) मारवाड़ी में कहावत हैं ‘‘ज्यादा खिलाकर प्राप्त किया जाता है और थोड़ा खिलाकर गवायाँ जाता है’’ अर्थात् जितना आवश्यक हों उतनी ही खुराक को देनी चाहिये तभी हमें दूध, घी,मखन आदि पर्याप्त मात्रा में मिलेगा अन्यथा थोड़ा खिलाते है तो कोई लाभ नहीं होता है। धन भी कमजोर रहता है और हमे भी प्रतिफल नहीं मिलता है।

(19) गाय के बारे में जब चर्चा होती है तो यह बात सामने आती है कि गाय दूध कम देती है। उसका मूल्य भी कम है। इस प्रकार आर्थिक दृष्टि से गाय पालना महंगा पड़ता है। दूसरी तरफ लोग भैसों को अच्छी तरह पालते है। यदि केवल आर्थिक पक्ष देखें तो भी गाय-भैंस से आगे रहती है। यदि आपके घर में बछड़ी बड़ी हुई है और सेवा की है तथा ब्याहने के बाद में अच्छी प्रकार सेवा करे तो भैस से कम खर्चें में भैस के बराबर दूध करती है। अन्तर यह रह जाता है कि जिस प्रकार बचपन से लेकर दूहने तक छोटी पाडी भैंस की बच्ची की हम सेवा करते है और आगे भी चराते है और दूध देना बन्द किया। तब भी चाकरी भैंस की करते है जबकि गाय को केवल दुहने के समय ही मामूली चराते है। यदि अच्छी प्रकार भैंस की तरह ही गाय की सेवा करें तो भैस से गाय का दूध ज्यादा ही होगा,कम नहीं होगा यह पक्की बात है या वैसे कर लो कि एक के खर्चे में दो गायें पल जायेगी और दो गायें मिलकर भैंस से आगे रहेगी। गाय का मूल्य बढ़ाने और दूध बढ़ाने के लिये नस्ल सुधार करना आवश्यक है। लोगों ने वैसे ही आवारा नन्दी छोड़ दिये है।

 

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