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भारतीय संस्कृति

प्राचीन भारत में रही है विमान बनाने की विद्या

विमान और उस पर शास्त्र

श्रीकृष्ण जुगनु

प्राचीन भारत में आकाश में उडऩे वाले विमान थे – यह कल्पना है या वास्तविकता। यह सवाल हमेशा मैं भी सोचता हूं और मित्रगण आज भी पूछते हैं। पुष्पक विमान ने राम को जल्द ही लंका से अयोध्या पहुंचा दिया था. यक्षों के अन्य विमानों के नाम भी मिलते हैं। मगर, यह विवरण महाकाव्यों और पुराणों में ही ज्यादा आया है। कुछ संदर्भ वैदिक साहित्य में भी खोजे गए हैं।
मौर्यकालीन विवरणों में भी इस प्रकार के संदर्भ मिलते हैं। गुप्तकाल में विष्णु शर्मा लिखित पंचतंत्र में एक कामुक के विमान पर सवार होकर राजप्रसाद में पहुंचने का संदर्भ आता है। मगर, सबसे आश्चर्यजनक वर्णन 1015 ईस्वी में राजाभोज द्वारा लिखित, संपादित समरांगण सूत्रधार में है जिसमें विमान बनाने की विधि है। राजा भोज ने पारे से विमान के उड़ाने की विधि को लिखा है, जो उस काल में सबसे आश्चर्यमय धातु माना गया था।
एक नहीं, दो प्रकार के विमान बनाए जा सकते थे और ये इतने ऊंचे जाते थे दिखाई नहीं देते। ग्रंथकार नक्षत्रलोक तक उडऩे की कल्पना करता है। इनमें से एक विमान में पारे का एक सिलेंडर लगता था और दूसरे में दो। इन पर पंखे को घूमाया जाता था और वह इतना शोर करता था कि यदि खेतों के ऊपर से गुजरता तो वहां छुपे हुए हाथी भाग खड़े होते।
आश्चर्य है कि यह सारा वर्णन आंखों देखे हाल जैसा लगता है। मैंने जब समरांगण सूत्रधार का अनुवाद किया तो उसके पूरे 31 वें अध्याय को लेकर मैं चकित रहा। सैकड़ों श्लोकों व अन्य ऐतिहासिक प्रमाणों को पाद टिप्पणियों में देने के लिए मैं परिश्रम करने में जुटा रहा।
भोजराज कहते हैं कि वह इस विद्या को खुलकर इसलिए नहीं लिख रहे हैं कि यदि यह विद्या आतंकियों के हाथ पड़ गई तो नुकसान ही अधिक होगा। ग्रंथकार की यह आत्म स्वीकारोक्ति है कि इस विद्या पर राम नामक राजाधिराज के यंत्र प्रपंच नामक ग्रंथ में यंत्राध्याय है और उसी से वह यथेष्टं वर्णन उद्धृत कर रहा है। इससे लगता है कि 10वीं सदी से पहले राम नामक राजा का इस विद्या पर कोई ग्रंथ था जो बहुत नहीं तो गुप्तरूप से राजाओं के यहां पठनीय, अनुकरणीय रहा होगा। बाद के काल के एक कलचुरी अभिलेख में सूत्रधार छीतकू को यंत्र विधान और महाविद्या का विशेषज्ञ कहा गया है।
भोजराज के उक्त निर्देश पर कई वैज्ञानिकों का ध्यान गया है। उनके लिए यह रोचक है कि कैसे वह विमान पीछे भी मुड़ सकता था और यदि पारे से चलता था तो पारा खत्म नहीं होता, ऐसे में उस विमान में बार-बार ईंधन भरवाने की समस्या नहीं रहती थी। विमान विद्या की बात यहीं पर खत्म नहीं होती। पिछली सदी में मैसूर से एक ग्रंथ का प्रकाशन हुआ, जो विमान बनने व संचालन करने की विधि पर आधारित था। तब भारतीयों से कहीं ज्यादा दुनिया का ध्यान उस ग्रंथ पर गया। आर्य समाज, नई दिल्ली की ओर से भी इस पर ध्यान दिया गया और बृहद् विमानशास्त्र का 1977 में प्रकाशन किया गया।
कई खंडित पन्नों के आधार पर इस पाठ को तैयार किया गया था। इसको महर्षि भारद्वाज की रचना बताया गया। यह ग्रंथ मेरे संग्रह में है और इसमें सैकड़ों प्रकार के विमान, उनके चालकों के शिक्षण प्रशिक्षण सहित योग्यता विमानों के दैनिक और युद्धोपकरणों की जानकारी भी है और आज की तरह ही उनको संजोया गया है। बड़ौदा के ऑरियंटल इंस्टीट्यूट में इसका पाठ बताया गया। धर्मयुग के 7 जुलाई 1974 के अंक में इस संबंध में एक लेख प्रकाशित हुआ। इसमें यह बताया गया था कि भारद्वाज संहिता पर आधारित विमान को जेजे स्कूल ऑफ आट्र्स के अध्यापक श्री शिवकुमार बापूजी तलपदे ने 1885 ईस्वी में विमान बनाकर चौपाटी पर उड़ाया था। यही जानकारी दिनमान के एक लेख में भी आई। हाल ही उन पर एक किताब आई है जिसमें उनके लिखे दो लेख हैं, विमान बनाने जैसी बात नहीं।
रुस के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई को वैमानिक प्रकरण ग्रंथ की जानकारी पत्र लिखकर दी थी, जिस पर 16 मई, 1977 को हिंदुस्तान टाईम्स में समाचार छपा था। मगर, यह तय कर पाना कठिन ही रहा कि भारद्वाज के शास्त्र की मूल प्रति कितनी पुरानी है। यह रोचक तथ्य हैं मगर कालक्रम के साथ ही इसके प्रमाणों को और पुष्ट रूप से खोजा जाना शेष है।

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