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गोस्तु मात्रा न विद्यते : गौ जैसी मां ब्रह्मांड कोई नही

Respect-Of-Cowएक बार देवी-देवता ऋषि-मुनि एवं ऋतुओं में वाद-विवाद होने लगा। आपस में सभी एक दूसरे से अपने को बड़ा एवं महान मानते थे। आपस में निर्णय न होने पर वेद भगवान के न्यायालय में सभी उपस्थित हुए। अपनी अपनी प्रतिष्ठा के अभिलाषी देवतादि भगवान वेद के न्याय की प्रतीक्षा करने लगे। भगवान वेद के आदेश पर सभी ने अपना-अपना मत प्रकट किया। किसी ने कहा कि मैंने अपने सत्कत्र्तव्य से समाज को ऊपर उठाया। किसी ने कहा कि मैंने अपने कर्म से लोगों का उत्थान किया आदि।
इसका निर्णय देते हुए अथर्ववेद भगवान ने कहा कि संसार में केवल एक ही सबसे महनन एवं श्रेष्ठ है। उसी को चाहे गाय कहो या ऋषि या एक धाम या आशीर्वाद। अथवा संसार में एक ऋतु या एक ही पूजनीय देव मानो जो समाज का सर्वप्रकारेण उत्थानकारी है। वैदिक मंत्र में प्रश्न इस प्रकार है-
को नु गौ: क एकऋषि: किमु धाम का आशिष:।
यक्षं पृथिव्यामेकवृदेकर्तु: कतमो नु स:।।
इसका स्पष्टीकरण इस प्रकार है-संपूर्ण धरातल एक ही विश्वरूपी गौ है। संपूर्ण विश्व में व्याप्त एक ही परमात्मा, परमेश्वर, परब्रह्मा श्रीराम सबके ज्ञाता और द्रष्टा ऋषि हैं। क्योंकि-
रमन्ते योगिनाअनन्ते नित्यानंदे चिदात्मनि।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते।।
सब विश्व मिलकर एक ही धाम हैं। एक ही स्थान है। सबके लिए एक ही आशीर्वाद है जो सबको कल्याण के लिए ही दिया जाता है। एक ही ऋतु वह है जो मानवों में शुभकर्म करने के लिए अखण्ड उत्साह रूप से रहती है-यथा-
एको गौरेक एकऋषिरेकं धामैकधाशिष:।
यक्षं पृथिव्यामेकवृदेकर्तुर्नाति रिज्यते।।
स्वतंत्र रूप से भी वेदभगवान ने पंचपरोपकारियों में श्रेष्ठ गाय को ही माना है। अर्थात गाय जीवों के हर पहलुओं में लाभकारी है। यथा-
चतुर्नमो अष्टकृत्वो भवाय दश कृत्व: पशुपते नमस्ते।
तवेमे पंच पशवो विभक्ता गावो अश्वा: पुरूषा अजावय:।।
हे पशुओं के स्वामी श्रीरामजी। ऐसे पशुओं को उत्पन्न करने वाले देव! आपको चारों प्रहर में साष्टांग एवं दसों नाखूनसहित आपको प्रणाम है। आपके द्वारा उत्पन्न जो आपके लिए ही पांच पशु नियुक्त किये गये हैं-गायें, घोड़े, पुरूष तथा बकरियां और भेड़ें-इन पांचों श्रेष्ठ पशुओं में आपने गाय को प्रथम स्थान पर रखकर गाय की श्रेष्ठता प्रदर्शित की है। अतएव विश्वरूपी एक ही गौ है, जिसके दूध का विधि रूप से सभी सेवन करते हैं तथा उसी से हष्ट-पुष्ट होते हैं। इस गौ की देखभाल करने वाले स्वामी एक ही परब्रह्मा श्रीराम जी हैं। इस गौ के रहने के लिए व्यापक विश्व ही गोशाला है और यही परमपद है।
ऋग्वेद में ऐसा वर्णन है कि एक बार इंद्र भगवान ने समस्त सभा के बीच यह घोषणा की-हे पोषण करने वाले व्यापक तथा शत्रु दल पर आक्रमण करने वाले वीरवर! हमारे कर्म गौ को प्रमुख स्थान देकर नियुक्त कीजिए और हमें कल्याणमय स्थिति में कीजिए जिससे हम सभी सुखी रहें। अर्थात गाय की महिला समझाइए। वैदिक मंत्र इस प्रकार है-

उत ना धियो गोअग्रा: पूषन् विष्ण्धवेवयाव:। कर्ता न: स्वास्तिमत:।।
अन्य देवों ने भी प्रार्थना की कि हमें उस प्रकार की बुद्घि प्रदान कीजिए, जिस प्रकार कि गाय को प्रमुख स्थान देकर या आगे करके स्वयं अनुचर चलने से हम अजेय हों। यथा
समिन्द्र राया समिषा रभेमहि सं वाजेभि: पुरूश्चन्द्रैरभिद्युभि:।
सं देव्या प्रमत्या वीरशुष्मया गोअग्रयाश्वावत्या रभेमहि।।
वेद भगवान का निर्देश है कि यदि किसी को इस माया-राज्य में सब प्रकार का वेभव प्राप्त करना है तो गौ माता की प्रमुख रूप से सेवा करें। सायण भाष्यकारने भी इसको स्वीकार करते हुए लिखा है-‘स्तोतृभ्यो दानार्थमग्रे प्रमुखत एवं गावो.’ अर्थात गायों का दान, गायों की पूजा स्तुति प्रमुख रूप से करनी चाहिए, क्योंकि दानों में दोदान प्रमुख है। इसी से सभी देवता गौ माता के साथ अपनी पूजा कराने के लिए विविध अंगों पर निवास करने लगे। गौ माता के मल मूत्र की महानता समाज में सर्वकाल में विद्यमान रहे इस उद्देश्य से स्वयं श्रीलक्ष्मी भी गोबर एवं गोमूत्र में वास करने लगीं।
यजुर्वेद का निम्र मंत्र निर्देश करता है कि जिस ब्रह्विद्या द्वारा मनुष्य परम सुख को प्राप्त करता है, उसकी सूर्य से उपमा दी जा सकती है, उसी प्रकार द्युलोक की समुद्र से तथा विस्तीर्ण पृथ्वी की इंद्र से उपमा दी जा सकती है, किंतु प्राणी मात्र के अनंत उपकारों अकेली संपन्न करने वाली गौ की किसी से उपमा नही दी जा सकती, गौ निरूपमा है वास्तव में गौ के समान उपकारी जीव मनुष्य के लिए दूसरा कोई भी नही है-
ब्रह्मा सूयम्समं ज्योतिद्यौ: समुद्र समंसर:।
इंद्र: पृथिव्यै वर्षीयान गोस्तु मात्रा न विद्यते।।
अतएव मानवों को गौ की सेवा करन्ने के लिए वेद भगवान का आदेश हुआ। जो व्यक्ति सब प्रकार से अपना कल्याण चाहता हो वह वेद भगवान के आदेश का पालन करे। अस्तु!!
(मानसप्राज्ञ पं. श्रीरामराघवदास जी शास्त्री ‘पुजारी’)

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