Categories
धर्म-अध्यात्म

“अविद्या व अन्धविश्वास दूर किये बिना मनुष्य जाति का कल्याण सम्भव नहीं”

ओ३म्

=========
अविद्या, अज्ञान व अन्धविश्वास ये सभी शब्द व इनसे उत्पन्न धार्मिक व सामाजिक प्रथायें परस्पर पूरक व एक दूसरे पर आश्रित हैं। यदि अविद्या, अज्ञान व स्वार्थ आदि न हों तो किसी भी समाज व सम्प्रदाय में अन्धविश्वास उत्पन्न नहीं हो सकते। अज्ञान व अविद्या दूर करने का एक मात्र साधन व उपाय वेदों की शरण में जाना है। वेदों में ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में जो सत्य ज्ञान दिया है उसको जानना व उसका धारण करना ही मनुष्य जाति के कल्याण का साधन होता है। परमात्मा ने वेदों का ज्ञान मानव मात्र को उसका कल्याण करने के लिये दिया था। महाभारत काल तक वेदों के आधार पर हमारे देश आर्यावर्त और विश्व की प्रायः सभी व्यवस्थायें चलती थी। महाभारत के बाद देश में अव्यवस्था उत्पन्न हुई। हमारे विद्वान व ऋषि महाभारत युद्ध में मारे गये जिससे कुछ काल बाद जैमिनी ऋषि पर ऋषि-परम्परा समाप्त हो गई। इसके बाद समाज के अल्प ज्ञानी मनुष्यों ने अज्ञान व अविद्या तथा वेद ज्ञान से दूरी के कारण अज्ञान में फंस कर अन्धविश्वासों तथा अवैदिक मिथ्या अनुचित धार्मिक एवं सामाजिक प्रथाओं को जन्म दिया। इन मिथ्या व अन्धविश्वासों से युक्त धार्मिक व सामाजिक पद्धतियों के कारण ही समय-समय पर भारत और इससे बाहर भी अनेक मत-मतान्तर उत्पन्न हुए जो न्यूनाधिक अज्ञान व अन्धविश्वासों से युक्त थे। हमारे देश से बाहर उत्पन्न मत-मतान्तरों में दूसरे मतों के आर्य व हिन्दुओं का मतान्तरण करने की भावना व प्रेरणा का होना एक अत्यन्त हानिकारक विचार व सिद्धान्त था जिसने आर्य-हिन्दू जाति का सर्वस्व विनाश करने का कार्य किया। इन अन्धविश्वासों व वेदविरुद्ध अज्ञानयुक्त सामाजिक परम्पराओं के कारण ही हम आठवीं शताब्दी में गुलाम होना आरम्भ हुए और यह सिलसिला 1947 तक और उसके बाद अब तक भी येन केन प्रकारेण जारी है। आज भी हम अज्ञान व अन्धविश्वासों से मुक्त नहीं हुए हैं और न ही अपने पतन को रोकने की ओषधि ‘वेद ज्ञान को जीवन में व्यवहार करना’ को हमने स्वीकार ही किया है। आज भी हम अनेक बातों में वेद विरुद्ध आचरण करते हैं और असंगठित हैं जो पुनः हमारी जाति के अकल्याण व गुलामी को आमंत्रण दे रहा है। आर्य-हिन्दुओं की जनसंख्या का अनुपात तेजी से घट रहा है और विधर्मियों व विरोधियों की जनसंख्या उनकी गुप्त योजनाओं व कार्यों से बढ़ रही है फिर भी हम अपनी आंखे मूंदे हुए हैं। इन सबके पीछे कुछ विशेष अन्धविश्वास व स्वार्थ से युक्त कुछ लोगों के कार्य हैं जिनका उल्लेख वेदों के परम विद्वान ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) ने वेद ज्ञान पर आधारित अपने अमर ग्रन्थ ‘‘सत्यार्थप्रकाश’ में किया है। यदि ऋषि दयानन्द न आते और हमें सत्यार्थप्रकाश और आर्यसमाज न देते तो हमें संशय है कि आर्य जाति की रक्षा न हो पाती। यदि आर्य-हिन्दू जाति का अस्तित्व बचा भी रहता तो वह भी आज के समान न होकर इससे कहीं अधिक अवनत व पतन से युक्त होता। आर्य-हिन्दू जाति का सौभाग्य है कि ईश्वर ने सनातन वैदिक धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिये ऋषि दयानन्द सरस्वती जैसा धर्म संशोधक एवं वेदों का पुनरुद्धारक ऋषि हमें दिया था। ऋषि दयानन्द ने वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिये अकेले ही सब काम किये जिससे आज हमारा अस्तित्व बचा हुआ है। हम व सारी आर्य-हिन्दू जाति उनकी ऋणी है और सदैव ऋणी रहेगी, भले ही हमारे भाई अपनी अज्ञानता व स्वार्थों के कारण इस सत्य बात को स्वीकार करें अथवा न करे।

हमने ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों के अध्ययन सहित वेदार्थ का भी अध्ययन किया है। वेद सब सत्य विद्याओं के ग्रन्थ हैं और सभी प्रकार की अविद्या, अज्ञान व अन्धविश्वासों सहित मिथ्या मान्यताओं से मुक्त हैं वा उनका निषेध करते हैं। वेद ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है जिसका प्रत्येक मनुष्य को अध्ययन व पालन करना होता है। यदि करेगा तो उनसे लाभान्वित होगा और नहीं करेगा तो उनसे होने वाले लाभों से वंचित रहेगा। दुर्भाग्य से हम वेदाध्ययन का नित्य प्रति अध्ययन करने के सिद्धान्त की अवहेलना करते हैं और इसी कारण से हमारा समाज व विश्व अनेक समस्याओं से ग्रस्त है। ऋषि दयानन्द ने अपने अति विस्तृत अध्ययन के आधार पर जाना था कि हमारे सनातन धर्म एवं संस्कृति के पतन का प्रमुख कारण अज्ञान व अन्धविश्वासों के आधार पर महाभारतकाल के बाद प्रचलित यज्ञों में पशु-हिंसा, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, बड़े बड़े मन्दिरों व मठो की स्थापना में अकूत धन का अपव्यय तथा वेदाध्ययन सहित ऋषियों के ग्रन्थों के अध्ययन की उपेक्षा व शिक्षा का अनध्याय था। अवतारवाद की कल्पना व उसका प्रचार और उसे ही मूर्तिपूजा का निमित्त बनाया गया। इन सबने मनुष्य की बुद्धि से ज्ञान व विज्ञान का हरण किया और उसके स्थान पर अविद्या व अन्धविश्वासों को स्थापित किया। आज जितनी भी विद्या, ज्ञान व विज्ञान की उन्नति हुई है वह उन लोगों ने अधिक की है जो अन्धविश्वासों से मुक्त थे। इन सत्यान्वेषियों ने मत-मतान्तरों में वर्णित ईश्वर की सत्ता व उसके सत्यस्वरूप को भी स्वीकार नहीं किया।

हमारी यह दुर्बलता रही कि हम व हमारे पूर्वज वेदों का ज्ञान-विज्ञान से युक्त ईश्वर का स्वरूप उन विज्ञानियों तक नहीं पहुंचा सके। अतः ईश्वर पर उनका विश्वास नहीं हो सका। फिर भी उन्होंने भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में जो अध्ययन व पुरुषार्थ किया उसके आधार पर वह संसार को वर्तमान में उन्नति की जिस उच्च स्थिति पर लाये हैं, वैसा उल्लेख व वर्णन हमारे किसी प्राचीन ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं होता। हमारे विज्ञानियों ने ज्ञान-विज्ञान की अपूर्व उन्नति की है जो कि सराहनीय एवं प्रशंसनीय होने पर भी इससे मनुष्य की सभी समस्याओं का हल नहीं होता। आज भी देश में निर्धनता, भुखमरी, अभाव, अन्याय, अत्याचार, शोषण, भ्रष्टाचार, भेदभाव, पुरुषार्थहीनता, अवसरवादिता, स्वार्थ, छल-प्रपंच एवं विश्वासघात जैसी अनेक बातें हैं जो प्रायः मनुष्य में विद्यमान लोभ, काम, क्रोध आदि आत्मिक व मानसिक दोषों के कारण उत्पन्न होती हैं। वैदिक आध्यात्मवाद इन आत्मिक व मानसिक दोषों के मूल कारणों को दूर करता है। इसमें सभी मनुष्यों को ईश्वर व आत्मा का ज्ञान होना तथा इसके साथ ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना का प्रमुख योगदान व महत्व होता है। हमारे ऋषि जानते हैं कि मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकतायें क्या हैं? मनुष्य की सभी प्राथमिक आवश्यकताओं को हम कृषि, गोपालन, निवास, वस्त्र निर्माण तथा आध्यात्मिक ज्ञान से हल कर सकते हैं।

विज्ञान में एक प्रमुख बात की उपेक्षा की जाती है और वह है सृष्टि में कार्यरत कर्म-फल सिद्धान्त। हम जैसा कर्म करते हैं हमें इस जीवन व जन्म-जन्मान्तरों में उसका फल मिलता है। हमें अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। हमारा कोई फल बिना भोग किये नष्ट नहीं होता। ईश्वर प्रकाशस्वरूप व हमारे सभी कर्मों का साक्षी होता है। वह न्यायकारी भी है। अतः वह अपनी सर्वज्ञता व सर्वशक्तिमतता से सभी जीवों को उनके शुभ व अशुभ कर्मों का सुख व दुःख रूपी फल जन्म-जन्मान्तरों में प्राप्त कराता है। हमारे सभी मतों के आचार्यों में से किसी में यह शक्ति नहीं है कि वह अपने व अपने अनुयायिों के सभी व किसी एक भी कर्म के फल को ईश्वर से क्षमा करा सकें। अनेक मत ऐसा करने का दावा करते हैं परन्तु यह उनका अज्ञान व छल ही होता है। यदि हम इस जन्म में ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र, माता-पिता की सेवा, देश व समाज सेवा, सदाचारयुक्त जीवन, पशु-पक्षियों के प्रति दया व करूणा का भाव रखने सहित उन्हें भोजन के लिये चारा व जल उपलब्ध नहीं करायेंगे तो हमारा भविष्य व परजन्म बिगड़ जाता है। ज्ञान-विज्ञान व भौतिकवाद से तो एक सीमा तक हम अपना जीवन सुखी कर सकते हैं परन्तु इनसे हमारा परजन्म किष्कंटक व सुख देने वाला नहीं होता। पुनर्जन्म एक सत्य वैज्ञानिक सिद्धान्त है। पुनर्जन्म को वैज्ञानिक बताना इस कारण है कि यह वेद ज्ञान, तर्क एवं युक्ति से सिद्ध होता है। मृत्यु के बाद सभी मनुष्यों व इतर प्राणियों का निश्चय ही पुनर्जन्म होना है। यदि हम वेद विहित कर्मों से दूर रहेंगे तो हमें मनुष्य जन्म न मिलकर पशु-पक्षी आदि योनियों में ईश्वर के द्वारा जन्म मिलेगा और हमारा वह जीवन व उसके बाद के अनेक जन्म ऐसे ही दुःख व अवनति में व्यतीत होंगे। इसी कारण से हमारे ऋषि वेदाध्ययन कर ईश्वर प्राप्ति की साधना करते थे और ईश्वर का साक्षात्कार कर जीवन-मुक्त होकर मोक्ष प्राप्ति को महत्व देते थे। यह कार्य करते हुए विज्ञान से मिलने वाली सुविधाओं को गौण समझकर वह अपना बहुमूल्य समय इसमें अपव्यय नहीं करते थे। यदि भौतिकवाद से युक्त जीवन से आध्यात्मिक लाभ हमसे दूर व नष्ट न हुआ करते व होते तो निश्चय ही हमारे ऋषियों व विद्वानों ने अतीत काल में आज के समान ही विज्ञान की उन्नति की होती और ऐसा होने पर हमारी यह धरती न तो सुरक्षित रह पाती और न ही इसमें सीमित मात्रा में उपलब्ध सभी खनिज वर्तमान में हमें सुलभ होते। हम अपने ऋषि-मुनियों के ऋणी हैं जिन्होंने तप व पुरुषार्थमय जीवन व्यतीत किया और शुद्ध पर्यावरण एवं सृष्टि के सभी खनिज पदार्थ प्रचुर मात्रा में हमारे लिये छोड़ गये हैं।

महर्षि दयानन्द जी ने अपने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में वैदिक मान्यताओं का उल्लेख तथा उनकी प्रस्तुति सहित अविद्या एवं अन्धविश्वासों से युक्त सभी मतों की समीक्षा वा खण्डन किया है। खण्डन इस लिये आवश्यक होता है जिससे अविद्या का नाश एवं विद्या की वृद्धि हो। यदि अविद्या का नाश वा अंधविश्वासों का खण्डन न किया जाये तो हमारा देश व समाज अज्ञान, अभाव व अन्याय से मुक्त नहीं हो सकता। असत्य के खण्डन और सत्य का मण्डन ही विद्वानों का कार्य होता है। जो विद्वान ऐसा नहीं करते और असत्य के खण्डन को बुरा कहते व मानते हैं वस्तुतः वह विद्वान नहीं होते। उन्हें असत्य के खण्डन से अपने मत की असत्य बातों का उन्मूलन होने का डर सताता है। ऋषि दयानन्द ने अपने प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में भारत देश में प्रचलित मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, अवतारवाद, जन्मना जातिवाद, सामाजिक असमानता एवं धर्म के नाम से प्रचलित प्रायः सभी अन्धविश्वासों व मिथ्या मान्यताओं का खण्डन किया है। उन्होंने नास्तिक मतों तथा दूसरे देशों के मतों जिन्होंने भारत में छल, बल, लोभ आदि से यहां के भोलेभाले लोगों का धर्मान्तरण कर उन्हें अपने ही भाईयों से दूर कर उनका विरोधी व शत्रु बनाया है, उनकी अज्ञानता युक्त मान्यताओं की भी समीक्षा, उन पर निष्पक्ष विचार करने सहित अपने ग्रन्थ के अन्तिम तीन समुल्लासों में समीक्षा वा खण्डन किया है। सत्य के जिज्ञासुओं को ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ बार-बार पढ़ना चाहिये जिससे वह सत्य व असत्य से पूर्णतः परिचित होकर सत्य को स्वीकार करने में उसका ग्रहण करने में समर्थ होंगे। अतीत में भी सभी मत-मतान्तरों के अनेक सुधी लोगों ने ऐसा किया है और वर्तमान में भी कर रहे हैं जिससे उनको लाभ होता है। अन्धविश्वास, ढ़ोग व पाखण्ड आदि अज्ञान व अविद्या से उत्पन्न होते हंै। अज्ञान व अविद्या ही मनुष्य, समाज व विश्व की समस्याओं का प्रमुख कारण हैं। अज्ञान, अन्धविश्वास व पाखण्डों को मनुष्य जाति का सबसे बड़ा शत्रु कह सकते हैं। यही मनुष्यों के दुःखों का प्रमुख कारण होता है। सभी लोगों का कर्तव्य है कि वह असत्य से मुक्त एवं सत्य से युक्त श्रेष्ठ मानव समाज के निर्माण सहित वेद के आधार पर अज्ञान, अन्याय, शोषण व अभाव से मुक्त विश्व को बनाने का प्रयास करें। इसी में विश्व के मानवों का हित व सुख छुपा हुआ है तथा इसी में मानव जीवन की सार्थकता भी है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
vdcasino giriş
vdcasino güncel giriş
vdcasino giriş
hititbet giriş
hitit medya
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet güncel adres
hititbet 2026
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
solobet giriş
hititbet giriş
hititbet
hititbet
Tuzla Cilt Bakım
İstanbul Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet Giriş
Hititbet Giriş
betnano
Hititbet Giriş
Hititbet App
hititbet giriş
hititbet
betnano
betorder giriş
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
hititbet
hititbet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
meritbet
bets10
meritbet
bets10
betnano
bets10
bets10
betnano
betnano
atlasbet
atlasbet
betnano
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
hititbet giriş
vdcasino
vdcasino
xslot giriş
xslot giriş
betpark giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betkom giriş
betkom giriş