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इतिहास के पन्नों से

भारत में 3990 जातियों के पास अलग अलग समय में अलग अलग हिस्से में राज्य रहे हैं

जिन्हें इतिहास नहीं पता, केवल ईसाई पैम्फलेट पता है।
उनकी बात का कोई वजन नहीं है।

ऐतिहासिक तथ्यों और अभिलेखों के आधार पर भारत में इन मुख्य जातियों के पास  अलग-अलग समय अलग-अलग इलाकों में राज्य थे:- केवट, कैवर्त,नाई ,कुर्मी, अहीर ,आभीर, गूजर ,जाट,थारू,खर, संथाल ,बैगा, गोंड,मिजो, माईती,सेन, पाल, भर, वोक्कालिगा, पटेल, वल्लाल, गौड़ा, नायडू, रेड्डी, खंडाइत, खत्री, भील ,खरवार, उरांव,मुंडा,कोल, नगा, खासी,ब्राह्मण ,कायस्थ,भूमिहार, मराठा,  चंद्रवंशी क्षत्रिय, सूर्य वंशी क्षत्रिय ,हूण,शक, कुषाण,पुलिंद,आंध्र, कदंब, काकतीय, परिहार ,चोल,चालुक्य, यादव, पाण्ड्य, सिख, सातवाहन, लोहार, सुनार,तोमर, प्रतिहार, , गुहिलोत,कलचुरि, भोज, परमार, मीणा, पड़िहार, राष्ट्रकूट, चौहान, डोभवाल,गोठवाल, महर, महार, खोड़ा, भाट, खेतपाल, देस पाल, गहड़वाल, सोलंकी, चंदेल, भट्ट,कट्ठी,डाबी, डोडा, सेंगर, बड़ गूजर, दाहिया, बैस,दाहिमा, बल्हारा, राठौर,अग्रवाल,आदि आदि।इनकी अनेक अनेक शाखाएँ अलग अलग नाम से प्रसिद्ध हुई।

अंग्रेजी प्रभाव में इतिहासकारों ने बिलकुल उलटा इतिहास लिखा है जिसका प्रचार वोट लोलुप नेता कर रहे हैं। एक उदाहरण देखिये – गत 10,000 वर्षों में यादव कभी भी कम प्रभावशाली नहीं रहे हैं।  महाभारत के समय 5 मुख्य यादवगण थे तथा कौरव, पाण्डव दोनों पक्ष उनकी सहायता मांग रहे थे। यादव नेता भगवान् कृष्ण के वंशज होने का भी गर्व करते हैं किन्तु राजनीति तथा अन्य लाभ के लिए दलित बन जाते हैं। अभी गांवों में सबसे शक्तिशाली वर्ग यादवों का ही है जिनके पास अधिकांश कृषि भूमि है। अन्य दलित जातियां भी अपने शक्तिशाली पूर्वजों तथा राजाओं पर गर्व करते हैं किन्तु आरक्षण के लिए दलित बन जाते हैं।

कुछ समूह अफ्रीका से खान मजदूर बन कर आये थे जिनको अंग्रेजों ने यहाँ बसाया, यहाँ से भी गिरमिटिया मजदूर अन्य देशों में बसाए गये। गुलाम या दास प्रथा कभी नहीं थी, उसे अंग्रेजो ने थोपा।

19वीं सदी ईसवी के आरंभ में भारत में लगभग 600 छोटी बड़ी रियासतें थी जिनमें से 12 रियासतों में ब्राह्मण का और 260  में क्षत्रिय कही जाने वाली विभिन्न जातियों का राज्य था। शेष में से तीन सौ से अधिक रियासतों में तथाकथित पिछड़ी जातियों का और वनवासियों का राज्य था। दिल्ली पंजाब में सिखों जाटों गुर्जरों के राज्य थे। उत्तर प्रदेश ,बिहार और मध्य प्रदेश में जगह-जगह कुर्मियों, अहीरों, तेलियों, नाइयों तथा अन्य पिछड़ी जातियों की रियासतें थी। मराठों का राज्य तो था ही। गुजरात में पटेलों का आधिपत्य था।

625 रियासतों के विवरण तो अंग्रेजों ने स्वयं छापे हैं। सरल सन्दर्भ के लिए देखें मध्यप्रदेश हिंदी ग्रंथ अकादमी भोपाल से छपी हमारी पुस्तक ‘भारत, हजार वर्षो की पराधीनता:एक औपनिवेशिक भ्रमजाल’

साथ ही साहित्य संगम, नया 100 लूकरगंज प्रयाग से छपी ‘कभी भी पराधीन नहीं रहा है भारत’ का परिशिष्ट।
✍🏻रामेश्वर मिश्रा पंकज

18वी शताब्दी तक गोंड जनजाति के पास भोपाल का राज था जिसकी अंतिम रानी कमलापति थी।

यानि 18वीं शताब्दी तक देश में आदिवासी समाज में गिने जाने वाली जातियों से राजा-रानी होते थे। फिर इसके बाद अंग्रेजों का राज आ गया।

तो इन जनजातियों को ब्राह्मणवाद ने गुलाम कब बनाया पं नेहरू के राज में?

आप इतिहास खोद कर देखिए इस देश में शायद ही कोई जाति-जनजाति ऐसी नहीं मिलेगी जिसके पास अपने राजा न हो। राजस्थान में मीणा समाज के किले राजा सब रहे हैं।

प्रजापति समाज के पास राजा दक्ष प्रजापति से लेकर
कमलापति से लेकर रानी आहिल्यबाई होल्कर तक
भारतीय समाज में तो इन जातियों को नेतृत्व करने का मौका मिलता रहा है।

हां ईसाई बनते ही ये पीटर पॉल बन जाते हैं, और पाकिस्तान में अदिवासी समाज कितना अपना वजूद को बनाए रख पाया है ये रिसर्च का विषय है

रानी कमलापति भोपाल की अंतिम रानी थी जिनकी प्रजा में ब्राह्मण-राजपूत सब रहे ही होंगे
लेकिन गोंड जाति आदिवासी है जिन्हे हिन्दू हीन मानते हैं
कोई लॉजिक है इस बात का???

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