एक कवियत्री और स्वतंत्रता सेनानी का अद्भुत संगम था सुभद्रा कुमारी चौहान में

कुमारी श्रेया

देश में कितने स्वतंत्रता सेनानी हुए जिन्होंने इस देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण हंसते-हंसते नौछावर कर दिए। आज़ादी की इस लड़ाई में सिर्फ पुरुषों का ही नहीं बल्कि महिलाओं का योगदान भी काफी सराहनीय रहा है। लेकिन इस पितृसतात्मक समाज में अनगिनत महिलाओं को कभी वह स्थान नहीं दिया गया जिसकी वे हमेशा से हकदार रही हैं। देश के लिए उनके योगदान, समर्पण को भुला दिया गया है। इस देश में ऐसी ही एक कवयित्री और स्वतंत्रता सेनानी हुईं जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्हें आज केवल एक सफल कवयित्री के रूप में तो देखा जाता है लेकिन शायद ही किसी को यह मालूम हो कि यह भारत की शुरुआती आंदोलनकारी महिलाओं में से एक थीं।
बचपन में हम सभी ने, “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी”  पंक्तियां सुनी और पढ़ी हैं। इन पंक्तियों को चरितार्थ करने वाली कवयित्री थीं सुभद्रा कुमारी चौहान। ख़ैर, सुभद्रा कुमारी चौहान का नाम आते ही दिमाग में ‘झांसी की रानी’ कविता कौंध जाती है क्‍योंकि उनकी यह रचना काफी प्रसिद्ध है लेकिन कवयित्री सुभद्रा केवल यहीं तक सीमित नहीं थीं, उनका काम और योगदान कविताओं से इतर भी था।

सुभद्रा कुमारी चौहान ने देश की आज़ादी के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। इन्हें आज केवल एक सफल कवयित्री के रूप में तो देखा जाता है लेकिन शायद ही किसी को यह मालूम हो कि यह भारत की शुरुआती आंदोलनकारी महिलाओं में से एक थीं।

सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त 1904 को इलाहाबाद के पास निहालपुर गांव के एक संपन्न परिवार में हुआ था। उनके पिता ठाकुर रामनाथ सिंह एक शिक्षित व्यक्ति थे। सुभद्रा की चार बहनें और दो भाई थे। उनके पिता शिक्षा प्रेमी थे और उनकी ही देखरेख में सुभद्रा कुमारी की प्रारंभिक शिक्षा हुई। सुभद्रा कुमारी बचपन से ही चंचल और कुशाग्र बुद्धि की थीं। पढ़ाई में अच्छी होने की वजह से कक्षा में हमेशा प्रथम स्थान प्राप्त करती थीं। लेकिन उनकी रुचि सबसे हटकर थी। सुभद्रा ने महज 9 साल की उम्र में कुछ ऐसा कर दिखाया था जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

दरअसल सुभद्रा को छोटी अवस्था से ही हिंदी काव्य और साहित्य से विशेष प्रेम था। यही कारण रहा की उनकी काव्य प्रतिभा बचपन में ही सामने आने लगी। साल 1913 में 9 साल की उम्र में सुभद्रा की पहली कविता पत्रिका ‘मर्यादा’ में प्रकाशित हुई थी। उनकी कविता का शीर्षक था “नीम का पेड़”। उनकी यह पहली कविता ‘सुभद्रा कुंवरी’ के नाम से छपी। सुभद्रा किसी भी मुद्दे पर कविताएं इतनी शीघ्र लिख देती थीं मानो पहले से उन्होंने उस मुद्दे पर कई बार पहले अभ्यास किया हो। उन्हें कविताएं लिखने के लिए अलग से समय नहीं निकालना पड़ता था। स्कूल से अक्सर घर आते-जाते तांगों में लिख लेती थीं। कविताओं की रचना करने के कारण वह अपने स्कूल में बड़ी प्रसिद्धि थीं। वह बचपन से ही अशिक्षा, अंधविश्वास, जाति व्यवस्था और रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज़ उठानेवाली शख़्स थीं।

सुभद्रा की पढ़ाई नौवीं कक्षा के बाद छूट गई लेकिन कविताएं लिखने का सिलसिला जारी रहा। सुभद्रा अपनी कविताओं में जीवन को उतारने लगीं। बाद में उन्होंने कहानियां लिखना भी शुरू कर दिया। यह उन्होंने अपनी खुशी के लिए किया क्योंकि उस वक्त कविताओं की रचना के लिए पैसे नहीं मिलते थे। नौवीं कक्षा में पढ़ाई छूटने का असर कभी उनकी कविताओं, कहानियों में देखने को नहीं मिला। साल 1919 में उनका विवाह खण्डवा (मध्यप्रदेश) के ठाकुर लक्ष्मण सिंह से हुआ। विवाह के बाद सुभद्रा जबलपुर में रहने लगी। सुभद्रा कुमारी चौहान बचपन से ही बहादुर और विद्रोही थीं। इस कारण वह शादी के डेढ़ साल के बाद ही असहयोग आंदोलन में शामिल हो गईं।

साल 1920-21 में सुभद्रा और लक्ष्मण सिंह अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। उन्होंने नागपुर कांग्रेस में भाग लिया और घर-घर जाकर कांग्रेस का संदेश पहुंचाया। साल 1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाली वह पहली महिलाओं में से एक थीं। वह दो बार जेल भी गई थीं। अपने जीवन के कई महत्वपूर्ण साल उन्होंने जेल में ही गुज़ारे। परिवार को साथ लेकर चलने वाली सुभद्रा कुमारी चौहान अब अकेली नहीं थी। उनके साथ उनके पांच बच्चों की ज़िम्मेदारी भी थी। गृहस्थी और परिवार को संभालते हुए उन्होंने समाज और राजनीति की सेवा की। देश और समाज के प्रति अपना कर्तव्य निभाते हुए उन्होंने व्यक्तिगत स्वार्थ की बलि चढ़ा दी। सुभद्रा ने पूरे मन से असहयोग आंदोलन में अपने आंदोलनकारी और कवयित्री, दोनों रूपों को झोंक दिया।

स्वतंत्रता के लिए पूरे देश में सत्याग्रह आंदोलन चलाया जा रहा था। उस दौरान साल 1922 में जबलपुर के ‘झंडा सत्याग्रह’ में भी सुभद्रा कुमारी शामिल हुईं। वह बढ़-चढ़कर इस आंदोलन में हिस्सा लेतीं, स्वाधीनता के लिए रोज सभाएं करती थीं, जगह-जगह जा जाकर अपने विचार रखती और आंदोलन के प्रति लोगों को जागुरूक करतीं। इतना ही नहीं, सभाओं में सुभद्रा कुमारी अंग्रेजों पर खूब बरसती थीं। आंदोलन का इन पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वह उससे प्रेरित होकर राष्ट्रप्रेम पर कविताएं लिखने लगीं। इनकी हर एक कविता महिलाओं में कुछ कर गुजरने का जोश भर देती थी।

सुभद्रा की दो कविता संग्रह और तीन कथा संग्रह प्रकाशित हुए। उनकी कविता संग्रहों के नाम ‘मुकुल’ और ‘त्रिधारा’ हैं। साल 1932 में प्रकाशित पंद्रह कहानियों वाली ‘बिखरे मोती।’ साल 1934 में प्रकाशित नौ कहानियों वाली उन्मादिनी। 1947 में प्रकाशित 14 कहानियों वाली ‘सीधे-साधे’ चित्र हैं। कुल मिलाकर उन्होंने 46 कहानियां लिखीं। उस वक्‍त औरतों के साथ होनेवाले भेदभावपूर्ण व्यवहार, उनके उस मानसिक दर्द, संघर्षरत औरतों की पीड़ा, समाज की विद्रूपता को भी सुभद्रा ने अपनी रचनाओं में उतारा है।
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सुभद्रा कुमारी चौहान के जीवन की तरह ही उनका साहित्य भी सरल और स्‍पष्‍ट है। इनकी रचनाओं में राष्ट्रीय आंदोलन, स्त्रियों की स्वाधीनता आदि समाहित है। कुल मिलाकर हिंदी काव्य जगत में सुभद्रा कुमारी ऐसी कवयित्री थीं जिन्होंने अपने शब्दों से लाखों, करोड़ों भारतीय युवकों को उदासी को त्याग, स्वतंत्रता संग्राम में खुद को झोंक देने के लिए प्रेरित किया। इन्होंने अपनी कहानियों, कविताओं और अपने साहस से लोगों में आज़ादी के लिए जज़्बा पैदा किया था। 15 फरवरी 1948 को एक कार दुर्घटना में सुभद्रा कुमारी की मौत हो गई। अपने पीछे वह छोड़ गईं अपनी जिंदगी का अनुभव, जो उनकी किताबों और कविताओं में अक्सर मिल जाते हैं।

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