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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

विश्व-संगठन, विश्व-मानस और एक विश्व-धर्म, भाग-2

ahinsa-logo-768x350छोटी कमजोरी है राष्ट्रों की अपने देशवासियों को अथवा नागरिकों को उनकी गरिमा की रक्षा की गारण्टी देना और उसमें उनका असफ ल होना। मानवाधिकारवादी तनिक विचार करें कि ऊपरी स्तर पर बैठा व्यक्ति जब अधीनस्थों की सम्प्रभुता का सम्मान नही कर सकता, वहाँ एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है तो नीचे के स्तर पर ऐसा होना स्वाभाविक है। ये ठीक है कि छोटी कमजोरी को पकडक़र आप बड़ी कमजोरी तक पहुँचेंगे। किन्तु छोटी कमजोरी को पकडक़र बड़ी कमजोरी को पूर्णरूपेण दृष्टि से ओझल नही किया जा सकता। यदि कोई राष्ट्र अपनी सम्प्रभुता की रक्षा के लिए भयग्रस्त हैं और उसकी ऊर्जा का अपव्यय अपनी सम्प्रभुता की रक्षार्थ अपेक्षाकृत अधिक हो रहा है, तो उसके नागरिकों की स्थिति भी वैसी ही होगी। मनुष्य अपने उत्कृष्ट ज्ञान को यदि पीढ़ी दर पीढ़ी आगे न बढाये तो वह उत्कृष्ट ज्ञान समाप्त हो जाता है या पुस्तकों के पृष्ठों तक सीमित होकर रह जाता है। ज्ञान के भी दो स्वरूप होते है एक सैद्घान्तिक और दूसरा व्यावहारिक। सैद्घान्तिक स्वरूप में हमें ज्ञान पुस्तकों से मिल सकता है, दूसरे लोगों से सुनकर मिल सकता है। यह सैद्घान्तिक ज्ञान हमारे लिए अधिक उपयोगी नही होता जब तक यह व्यावहारिक रूप में होता हुआ न दीखने लगे। यू.एन.ओ. के उद्देश्य हमारे लिए तभी उपयोगी होंगे,जब हम उन्हें व्यावहारिक रूप में अपनाना आरम्भ करेंगे। इसके लिए विश्व स्तर पर मानवाधिकारवादियों को विशेष और ठोस पहल करने की आवश्यकता है। यू.एन.ओ. के उद्देश्य किसी पुस्तक में कैद न होने पायें इसलिए उन्हें जन-जन तक पहुंचाने के लिए उनके सैद्घान्तिक रूप से उन्हें उबारकर व्यावहारिक धरातल पर लाना होगा। यू.एन.ओ. की स्थापना तत्कालीन परिस्थितियों में राष्ट्रों पर नागरिकों के नैतिक दबाव के कारण सम्भव हुई थी। आज यह नैतिक दबाव का शिकंजा राष्ट्र प्रमुखों पर ढ़ीला पड़ गया है। जिस कारण वह राष्ट्रवासियों की भावनाओं की अनदेखी करके कार्य कर रहे हैं। आज जबकि सारा विश्व एक ग्राम बन गया है तब राष्ट्रों और नागरिकों के मौलिक अधिकारों को अन्योन्याश्रित बनाकर समझाने की आवश्यकता विश्व स्तर पर अनुभव की जानी चाहिए। ऐसे नागरिक राष्ट्र प्रमुख बनें जो कि राष्ट्रों की सम्प्रभुता और व्यक्ति की गरिमा का सम्मान करने वाले हों। किसी सम्प्रदाय के प्रति निष्ठावान कोई व्यक्ति किसी भी मूल्य पर राष्ट्रों की सम्प्रभुता और व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक या संवेदनशील कभी नही हो सकता। इसी प्रकार की अपेक्षा उग्र राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करने वाले किसी राष्ट्र से की जा सकती है। वर्ग, सम्प्रदाय, भाषा, प्रान्त, देश और ऐसी ही अन्य सीमाऐं मानवतावाद के प्रचार प्रसार में बाधक होती हैं। जिससे हमारा धर्म और कत्र्तव्य पथ बाधित होता है। यह दु:खपूर्ण तथ्य है कि व्यक्ति अपने अधिकारों की रक्षा इन बाधाओं की उपस्थिति के मध्य चाहता है। अपनी गरिमा की रक्षा के लिए जो चीजें उसे समाप्त कर देनी चाहिए वह उन्हें बनाये रखकर अपने अधिकारों का अस्तित्व खोजता है। जबकि इन बाधाओं के कारण वह अपने कत्र्तव्य से विमुख हो जाता है। इस विषमता से उभरने के लिए दो चीजें हैं-एक तो यह कि व्यक्ति का वर्ग सम्प्रदाय आदि का स्वरूप बनाये रखकर भी उसे दूसरे के प्रति आक्रामक न होने दिया जाये और सभी के सम्प्रदायों की अच्छी बातों को मानने के लिए अनिवार्यत: बाध्य किया जाये। उसे उनके प्रति सहिष्णु बनाए जाने का प्रयास किया जाये। दूसरे यह कि इन सब बातों को व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में बाधा मानकर मिटाने का प्रयास किया जाये। मानवाधिकारवादी संगठन दोनों बातों पर ठोस कार्य कर सकते हैं। हमें मानव स्वभाव का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि जितने बड़े स्तर का संगठन होता है उसके लिए उतने ही बड़े मानस की आवश्यकता होती है। बड़े पदों पर छोटी सोच का व्यक्ति सदा घातक होता है। इसलिए विश्व स्तरीय संगठन यू.एन.ओ. के लिए विश्व मानस के धनी व्यक्ति को चुना जाना राष्ट्रों का मौलिक अधिकार होना चाहिए। विश्व मानस के धनी व्यक्ति ही सर्व सम्प्रदायों की मानव और प्राणिमात्र के हित में एक विश्व धर्म-मानवतावाद की स्थापना करा सकते हैं। यू.एन.ओ. की स्थापना के उद्देश्य को जन-जन तक पहुँचाने के लिए पाठ्यक्रमों में आवश्यक परिवर्तन किया जाये। हम ऊपरी स्तर पर परिवर्तन के लिए ऊपर से नीचे के लिए चलें। राष्ट्रों की सम्प्रभुता का सम्मान ही व्यक्ति की गरिमा की सुरक्षा का पर्यायवाची सिद्घ किया जाये। तब हम विश्व-शान्ति के अपने वास्तविक मिशन में सफ ल होंगे। विश्व का शान्ति पूर्ण परिवेश अनिवार्यत: स्थापित रहे यह भी राष्ट्रों का मौलिक अधिकार घोषित होना चाहिए। विश्व शान्ति मानवता का ध्येय भी है और मौलिक अधिकार भी। व्यक्ति के निहित स्वार्थों के कारण बड़ी भारी कीमत देकर मानवता युद्घादि की भयंकर विभीषिका को झेलकर विश्वशान्ति का वरण करती है, और शपथ खाती है कि भविष्य में ऐसी गलती नहीं करेंगे। किन्तु वर्ग, सम्प्रदाय आदि की दानवता कहीं पुन: मुखरित होती है और विनाश की कहानी लिख जाती है। इस विनाश की कहानी को रोकने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है। विश्व-संगठन, विश्व-मानस और एक विश्व-धर्म। ये तीनों चीजें ही राष्ट्रों के अधिकार हैं। पहली चीज हमारे पास है। अगली दोनों चीजों के लिए हमें संघर्ष करना है। यदि ये दो चीज और हो जायें तो स्थायी विश्व शान्ति स्थापित हो जाये। वेद शान्ति:, शान्ति: तीन बार कहता है। उसके शान्ति पाठ का अर्थ यदि समझ लिया जाये तो उसका भेद समझ में आ जायेगा कि वेद भी विश्व संगठन, विश्व-मानस और एक विश्व-धर्म के माध्यम से ही विश्वशान्ति के गीत गा रहा है। एक धर्म का अर्थ मानवतावाद का विकास करने से है, अन्यथा कुछ नहीं।

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