ओ३म् “मनुष्य जीवन की उन्नति के लिए आर्यसमाज के सत्संगों में जाना चाहिये”

ओ३म्

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मनुष्य व समाज की उन्नति आर्यसमाज में जाने व आर्यसमाज के प्रचार के कार्यों से होती है। आर्यसमाज का छठा नियम है कि आर्यसमाज को मनुष्यों की शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति कर संसार का उपकार करना चाहिये। हम जब आर्यसमाज के सत्संगों में जाते हैं तो वहां इस नियम का पालन होने से हमें इसका लाभ प्राप्त होता है। यह नियम कितना महत्वपूर्ण है, इसका ज्ञान व लाभ आर्यसमाज में जाकर व वहां विद्वानों के प्रवचन, यज्ञ व सत्संग में उपस्थित होकर ही अनुभव व प्राप्त किया जा सकता है। हम 1970-1975 वर्ष में आर्यसमाज के सम्पर्क में आये थे। अन्य संस्थाओं में भी जाकर हम विद्वानों के प्रवचनों को सुनते थे। हमें जो ज्ञान व संगठन का लाभ आर्यसमाज से हुआ वह हमें अन्य संस्थाओं में जाकर होना सम्भव प्रतीत नहीं हुआ। इसका प्रमुख कारण यह है कि आर्यसमाज के सिद्धान्तों व नियमों की नींव ईश्वर द्वारा सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को दिये गये ज्ञान ‘‘वेद” पर आधारित है। वेद के सभी सिद्धान्त पूर्ण सत्य हंै। वेद का ज्ञान अपूर्ण न होकर पूर्ण ज्ञान हैं। ऋषियों ने वेदों को सब सत्य विद्याओं की पुस्तक बताया है और वस्तुतः यह है भी। वेदों में मनुष्यों को सत्य का प्रचार करने की प्रेरणा है परन्तु किसी का मत व धर्म परिवर्तन करने की प्रेरणा नहीं है जैसा कि कुछ मतों में स्पष्ट है व कुछ मत ऐसा करते आ रहे हैं जो उनके विस्तार का कारण बना है।

वेद मनुष्यों को ईश्वर और आत्मा को जानने की प्रेरणा करते हैं और इसके लिये समग्र सामग्री भी प्रस्तुत करते हैं। वेदों के अनुरूप ऐसी बातें किसी मत, पन्थ या सम्प्रदाय के ग्रन्थ में नहीं हैं। वेदाध्ययन और वेदों पर ऋषियों की टीकाओं व आर्य विद्वानों के नाना विषयों पर ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य को आत्मा व परमात्मा का ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता अपितु ईश्वर प्राप्ति की विधि व साधनों का ज्ञान भी मिलता है। ध्यान-योग व समाधि ही वह उपाय, साधन व विधि है जिसे करके मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर सकता वा करता है। इन साधनों को आरम्भ करने से पूर्व मनुष्य को ईश्वर, जीवात्मा संबंधी ज्ञान, उपासनाविधि सहित मनुष्य जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य का परिचय प्राप्त करना होता है। जिन मनुष्यों ने ईश्वर व आत्मा के विषय में असत्य ज्ञान को उपासना का आधार बनाया होता है, हमें लगता है कि वह कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकते। उपासना में सफलता तभी मिलेगी जब हम ईश्वर व आत्मा सहित सृष्टि के विषय में सत्य ज्ञान को प्राप्त होंगे, उसे धारण करेंगे, वेद ज्ञान को आचरण में लायेंगे और उन विचारों व ज्ञान के अनुरूप आचरण व साधना करेंगे। हमें लगता है कि वेद और आर्यसमाज की शरण में जाकर ईश्वर को प्राप्त करना, उसका प्रत्यक्ष व साक्षात्कार करना सरल हो जाता है। स्वाध्याय में प्रवृत्त होकर ही हम ईश्वर व आत्मा के सत्यस्वरूप को जान सकते हैं और साधना से उसको प्राप्त कर सकते हैं।

आर्यसमाज में जाने पर हमें अपने जीवन का उद्देश्य, लक्ष्य, ईश्वर, आत्मा, वेद, ऋषियों के ग्रन्थों का परिचय, शरीर, आत्मा व सामाजिक उन्नति आदि अनेक विषयों का विस्तृत ज्ञान प्राप्त होता है। आर्यसमाज में प्रातः व सायं सन्ध्या व अग्निहोत्र यज्ञ होता है। इसमें उपस्थित होकर हम सन्ध्या व हवन करना सीख जाते हैं और अपने निवास सहित अपने मित्र व सम्बन्धियों के घरों पर एक पुरोहित की भांति यज्ञ सम्पादित कर सकते हैं। सन्ध्या व यज्ञ ही हमारे जीवन को ऊंचा उठाने के प्रमुख साधन हैं। सन्ध्या आदि कार्य हमें ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना सहित आत्म-चिन्तन करने का अवसर प्रदान करते है। सन्ध्या व यज्ञ करने से ईश्वर से निकटता बढ़ती है और ईश्वर की प्रेरणायें एवं सहाय उपासक व साधक को प्राप्त होता है जिससे वह सद्कर्मों को करते हुए पुण्य कर्मों का संचय कर अपने जीवन को सुखी व आनन्दित कर सकता है। सामूहिक यज्ञ हमें संगठन के सूत्र में बांधता है। संगठित होकर हमारी शक्ति कई गुणा बढ़ती है। हमारे सुख व दुःख सभी में हमें अपने इन मित्रों से सहयोग प्राप्त होता है। मनुष्य जीवन की उन्नति के लिये मनुष्य का अच्छे व सत्य ज्ञानयुक्त सिद्धान्तों से युक्त संगठन से जुड़ना आवश्यक होता है। हमें लगता है कि आर्यसमाज का संगठन ही सत्य ज्ञान व सिद्धान्तों की दृष्टि से सबसे श्रेष्ठ संगठन है। अन्य कोई संगठन हमें सत्य ज्ञान की दृष्टि से आर्यसमाज के समान नहीं दिखाई देता। हम स्वयं को आर्यसमाज से जुड़कर गौरव का अनुभव करते हैं। हमें इस बात का सन्तोष भी है।

हम जब आर्यसमाज के सदस्य बने तो हमारा सम्बन्ध ऋषि दयानन्द, देश व समाज के हितैषी महापुरुषों स्वामी श्रद्धानन्द, पं0 गुरुदत्त विद्याथी, पं0 लेखराम जी, महात्मा हंसराज जी, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, पं0 विश्वनाथ विद्यालंकार जी, डा0 रामनाथ वेदालंकार जी, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती जी, पं0 ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी, पं0 युधिष्ठिर मीमांसक जी, डा0 भवानीलाल भारतीय जी, प्रात्र राजेन्द्र जिज्ञासु जी तथा स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी आदि अनेक विद्वानों से जुड़ गया। इनके साहित्य व सान्निध्य से हम लाभान्वित होते रहे। इन्हीं के सान्निध्य व प्रेरणाओं से हम ईश्वर व वेद के विषय में भी कुछ-कुछ ज्ञान रखते हैं। यदि हम आर्यसमाज न जाते होते, तो हमें वह लाभ प्राप्त न होते जो आज हमें प्राप्त हैं। अतः आर्यसमाज जाने से मनुष्य का शारीरिक, आत्मिक एवं सामाजिक सभी प्रकार का विकास व उन्नति होती है। आर्यसमाज में जाने से लाभ ही लाभ है तथा किसी भी मनुष्य को हानि किसी प्रकार की नहीं होती। आर्यसमाज में जाने से हम बड़े-बड़े सामाजिक नेताओं के जीवन व उनके कार्यों में सत्यासत्य का विवेचन कर सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग भी कर सकते हैं। आर्यसमाज का साहित्य पढ़कर हमारी सत्यासत्य को जानने व निर्णय करने की शक्ति बढ़ती है। आर्यसमाज मनुष्य को व्यक्ति पूजा से बचाता है। कोई मनुष्य कितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले और कितने अच्छे काम कर ले, वह मनुष्य ही होता है। हमें मनुष्य के अच्छे गुणों को ही लेना चाहिये। हमें समाज के प्रमुख पुरुषों व नेताओं की बुराईयों को भी जानना चाहिये जिससे हम उन बुराईयों से बच सकें। राजनीति में हम देखते हैं कि लोग अपने नेताओं को आवश्यकता से अधिक मान-सम्मान देते हैं। यह व्यक्ति पूजा का पर्याय प्रतीत होता है जो कि मनुष्य व समाज की उन्नति के लिये उचित नहीं है। अधिकांश राजनेताओं के जीवन में आध्यात्मिक ज्ञान प्रायः होता ही नहीं है। राजनीति से जुड़े सभी व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न होते हैं। यह धन कहां से प्राप्त होता है, यह पता ही नहीं चलता। आर्यसमाज पवित्र साधनों से ही धन कमाने की प्रेरणा व अनुमति देता है। उसके अनुसार यदि हम अनुचित साधनों से धन कमायेंगे तो हमें इसका मूल्य जन्म-जन्मान्तरों में कर्मों के फलों का भोग करते हुए चुकाना होगा। आर्यसमाज से दूर सामान्य व्यक्ति इन सब बातों से अपरिचित होता है। अतः आर्यसमाज जाने से हम बुरे कामों को करने से बच जाते हैं और हमारा यह जन्म व मृत्यु के पश्चात का जन्म भी कर्म-फल सिद्धान्त के अनुसार सुखद होता है और परजन्म भी मनुष्य योनि में अच्छे परिवेश में प्राप्त होता है।

आर्यसमाज संसार के सभी लोगों को ईश्वर व आत्मा का सच्चा स्वरूप बताने के लिये कार्यरत है। वह संसार से अज्ञान, अंधविश्वास, अन्याय, अत्याचार, शोषण, निर्धनता, अभाव, असमानता, भेदभाव, पाप व दुष्कर्मों को दूर करना चाहता है और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये ही कार्य कर रहा है। यह सभी लक्ष्य वेद प्रचार व मनुष्य को आध्यात्मिक जीवन का महत्व व इसके लाभ बताकर ही प्राप्त किये जा सकते हैं। जब हम आर्यसमाज के सत्संगों में जाते हैं तो हमें यह सभी बातें बताई जाती हैं और हम ऋषि दयानन्द और आर्य विद्वानों के ग्रन्थों को पढ़कर इन सब लक्ष्यों को प्राप्त करने में अग्रसर होते हैं। आजकल हमारा देश और युवा पीढ़ी पाश्चात्य अवैदिक मान्यताओं की ओर उन्मुख है जिससे उसका पतन हो रहा है। विद्वान व सर्वे बताते हैं कि दिल्ली के एक बड़े स्कूल के 75 प्रतिशत छात्र-छात्रायें नशा करते हैं। ऐसे छात्र-छात्राओं से देश क्या अपेक्षा कर सकता है? कुछ नहीं। हमारी वर्तमान पीढ़ी के युवाओं का न तो भोजन शुद्ध है और न ही आचार व विचार। जब तक मनुष्य आत्मा को नहीं जानता और ईश्वर की उपासना नहीं करता, उसके आचार व विचार शुद्ध एवं पवित्र नहीं बन सकते। भौतिकवादी जीवन और आधुनिक जीवन में भोगों पर अनियंत्रण मनुष्य को तेजी से मृत्यु के मुख की ओर धकेलता है। ईश्वर की उपासना और वेदों का स्वाध्याय अमृत के तुल्य हैं। उनकी शरण में जाकर ही आत्मा को सच्चे सुख का अनुभव होता है। यही कारण हैं कि आर्यसमाज ईश्वरोपासना, यज्ञोपासना तथा वेदों के स्वाध्याय व उपदेशों पर बल देता है। ऐसा करके ही मनुष्य का कल्याण होता है, सृष्टि के आरम्भ से ऐसा ही होता आया है और आगे भी होगा। हमें इन कार्यों को करने के लिये अपने जीवन का पर्याप्त समय देना चाहिये और वैदिक जीवन व विचारधारा के महत्व को जानकर इसका प्रचार व प्रसार कर श्रेष्ठ समाज के निर्माण के कार्य में सहयोग देना चाहिये।

आर्यसमाज में हमें सन्ध्या व यज्ञ करने का स्वर्णिम अवसर मिलता है। यज्ञ से वायुमण्डल शुद्ध एवं पवित्र बनता है। आर्यसमाज में आने वाले धार्मिक व सामाजिक व्यक्तियों से हमारा सम्पर्क एवं मित्रता स्थपित होती है। यह सम्बन्ध हमारे भविष्य में अच्छे व बुरे समय में काम आते हैं। आर्यसमाज के अच्छे लोगों की संगति के कारण हम बुरे कर्मों व पापों को करने से बचते हैं। आर्यसमाज के अनुयायी शत प्रतिशत नशे से मुक्त, शुद्ध शाकाहारी, मांस, अण्डा, मच्छली, घूम्रपान एवं सभी प्रकार के सामिष भोजनों से दूर रहते हैं। वह ऋषि मुनियों के बताये मार्ग पर चलने का प्रयत्न करते हैं। देश के प्राचीन व नवीन सुचरित्र वाले लोगों का सम्मान करते हैं। दुश्चरित्र व देश व समाज विरोधी लोगों से दूर रहते हैं। रामायण व महाभारत का अध्ययन करते व उनसे प्रेरणा लेते हैं। आर्यसमाज में विद्वानों के नाना विषयों पर प्रवचन सुनकर उनमें निहित सन्देश को ग्रहण कर आर्यसमाज के सदस्य उनका जीवन में सदुपयोग करते हैं। देश व समाज हित में धार्मिक व सामाजिक संस्थाओं को दान करने व अन्य प्रकार से भी आर्यसमाज के बन्धुगण सहयोग करते हैं। प्रत्येक रविवारीय सत्संग में विद्वानों के प्रवचनों को सुनते हुए वह अच्छे विद्वान बन जाते हैं और कुछ अच्छे वक्ता भी बन जाते हैं। हमने अपने जीवन में ऋषि भक्त पं0 प्रकाशवीर शास्त्री जी के अनेक व्याख्यानों को सुना है। उनके जैसा हिन्दी भाषी वक्ता देश में उत्पन्न नहीं हुआ। उन्होंने देश हित के अनेक कार्य किये जिनका ज्ञान हमें आर्यसमाज से जुड़कर ही हुआ है। आर्यसमाज में जाने से मनुष्य की शारीरिक, सामाजिक, आत्मिक एवं चारित्रिक उन्नति भी होती है। मनुष्य अज्ञान व अन्धविश्वासों से मुक्त होता है तथा प्राणीमात्र के प्रति तर्कसंगत, सम्माननपूर्ण, मानवीय तथा यथायोग्य व्यवहार करता है। मनुष्य ऋषि दयानन्द की तरह स्पष्टवादी बनता है। वह मिथ्यावादियों की श्रेणी से बाहर आता है। ऐसे अनेक लाभ आर्यसमाजी बनकर व आर्यसमाज के सत्संगों में जाने से होते हैं। हम इस चर्चा को विराम देते हुए अपने मित्रों से अनुग्रह करते हैं कि वह अपने-अपने निकटवर्ती आर्यसमाज के सत्संगों में अवश्य जाया करें और वहां निर्वाचनों एवं पदों के मोह से दूर रहें। अच्छे कार्य करने वालों से सहयोग करें एवं राजनीति, गुटबाजी एवं पूर्वाग्रहों से स्वयं को मुक्त रखें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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