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भारतीय संस्कृति

प्राचीन भारत में रसायन विज्ञान

ओम प्रभात अग्रवाल

भारत में रसायन शास्त्र की अति प्राचीन परंपरा रही है। पुरातन ग्रंथों में धातुओं, अयस्कों, उनकी खदानों, यौगिकों तथा मिश्र धातुओं की अद्भुत जानकारी उपलब्ध है। इन्हीं में रासायनिक क्रियाओं में प्रयुक्त होने वाले सैकड़ों उपकरणों के भी विवरण मिलते हैं।

वस्तुत: किसी भी देश में किसी ज्ञान विशेष की परंपरा के उद्भव और विकास के अध्ययन के लिए विद्वानों को तीन प्रकार के प्रमाणों पर निर्भर करना पड़ता है-
1. वहां का प्राचीन साहित्य 2. पारंपरिक ज्ञान-जो पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित बच जाता हो 3. पुरातात्विक प्रमाण। इस दृष्टि से भारत में रसायनशास्त्र के उद्भव काल के निर्धारण के लिए विशाल संस्कृत साहित्य को खंगालना ही उत्तम जान पड़ता है। उल्लेखनीय है कि भारत में किसी भी प्रकार के ज्ञान के प्राचीनतम स्रोत के रूप में वेदों को माना जाता है। इनमें भी ऐसा समझा जाता है कि ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। अर्वाचीन काल में ईसा की अठारहवीं शताब्दी से नये-नये तत्वों की खोज का सिलसिला प्रारंभ हुआ। इसके पूर्व केवल सात धातुओं का ज्ञान मानवता को था। ये हैं, स्वर्ण, रजत, तांबा, लोहा, टिन, लेड (सीसा) और पारद। इन सभी धातुओं का उल्लेख प्राचीनतम संस्कृत साहित्य में उपलब्ध है, जिनमें ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद भी सम्मिलित हैं। वेदों की प्राचीनता ईसा से हजारों वर्ष पूर्व निर्धारित की गई है।
इस प्रकार वेदों में धातुओं के वर्णन के आधार पर हम भारत में रसायन शास्त्र का प्रारंभ ईसा से हजारों वर्ष पूर्व मान सकते हैं। उल्लेखनीय है कि उपनिषदों का रचना काल भी यजुर्वेद के आसपास ही माना जाता है। छांदोग्य उपनिषद्‌में धात्विक मिश्रणन का स्पष्ट वर्णन मिलता है। यदि हम इसे पर्याप्त न मानें और कहें कि केवल रसायन शास्त्र में प्रयुक्त प्रक्रमों एवं रासायनिक क्रियाओं के ज्ञान के समुचित प्रमाण के साथ ही हम रसायन शास्त्र का प्रारंभ मान सकते हैं, तो भी हमें ईसा के एक हजार वर्ष पूर्व के काल (ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दी) पर तो सहमत होना ही पड़ेगा। यही वह काल था जब विश्व प्रसिद्ध चरक एवं सुश्रुत संहिताओं का प्रणयन हुआ, जिनमें औषधीय प्रयोगों के लिए पारद, जस्ता, तांबा आदि धातुओं एवं उनकी मिश्र धातुओं को शुद्ध रूप में प्राप्त करने तथा सहस्त्रों औषधियों के विरचन में व्यवहृत रासायनिक प्रक्रियाओं यथा-द्रवण, आसवन, उध्र्वपातन आदि का विस्तृत एवं युक्तियुक्त वर्णन मिलता है। निरूसंदेह इस प्रकार के ज्ञानार्जन का प्रारंभ तो निश्चित रूप से इसके बहुत पहले से ही हुआ होगा। उल्लेखनीय है कि इन कालजयी ग्रंथों के लेखन के पश्चात, यद्यपि इसी काल में (ईसा पूर्व तृतीय शताब्दी) में कौटिल्य ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की जिसमें धातु, अयस्कों, खनिजों एवं मिश्र धातुओं से संबंधित अत्यंत सटीक जानकारी तथा उनके खनन, विरचन, खानों के प्रबंधन तथा धातुकर्म की आश्चर्यजनक व्याख्या मिलती है। भारत में इस प्रकार के वैज्ञानिक ज्ञान का यह ग्रंथ प्राचीनतम उदाहरण प्रस्तुत करता है। प्रथम सहस्राब्दी की दूसरी शताब्दी से 12वीं शताब्दी तक तो ऐसी पुस्तकों की भरमार देखने को मिलती है जो शुद्ध रूप से केवल रसायन शास्त्र पर आधारित हैं और जिनमें रासायनिक क्रियाओं, प्रक्रियाओं का सांगोपांग वर्णन है। इनमें खनिज, अयस्क, धातुकर्म, मिश्र धातु विरचन, उत्प्रेरक, सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक रसायन तथा उनमें काम आने वाले सैकड़ों उपकरणों आदि का अत्यंत गंभीर विवरण प्राप्त होता है।
‘भारतीय बौद्धिक संपदा’ के फरवरी, 2000 के अंक में 1940 में प्रकाशित एक मराठी पुस्तक ‘रसमंजरी’ (लेखक- टी.जी.काले) के हवाले से ऐसी 127 पुस्तकों की सूची प्रकाशित है। स्मरणीय है कि इस सूची में चरक एवं सुश्रुत संहिताएं सम्मिलित नहीं हैं। इन पुस्तकों में वर्णित अनेक तथ्य एवं प्रक्रियाएं अब आधुनिक रसायन शास्त्र के मानदंडों पर भी खरी उतरने लगी हैं।
सर्वप्रथम द्वितीय शताब्दी में नागार्जुन द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘रस रत्नाकार’ को लें। ऐसा विश्वास किया जाता है कि छठी शताब्दी में जन्मे इसी नाम के एक बौद्ध रसायनज्ञ ने इस पुस्तक का पुनरावलोकन किया। इसीलिए यह पुस्तक दो रूपों में उपलब्ध है। कुछ भी हो, यह पुस्तक अपने में रसायन का तत्कालीन अथाह ज्ञान समेटे हुए हैं। छठी शताब्दी में ही वराहमिहिर ने अपनी ‘वृहत्‌ संहिता’ में अस्त्र-शस्त्रों को बनाने के लिए अत्यंत उच्च कोटि के इस्पात के निर्माण की विधि का वर्णन किया है। भारतीय इस्पात की गुणवत्ता इतनी अधिक थी कि उनसे बनी तलवारों के फारस आदि देशों तक निर्यात किये जाने के ऐतिहासिक प्रमाण मिले हैं।
सर्वाधिक पुस्तकें आठवीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के मध्य लिखी गएं। इनमें से प्रमुख हैं-वाग्भट्ट की अष्टांग हृदय, गोविंद भगवत्पाद की रस हृदयतंत्र एवं रसार्णव, सोमदेव की रसार्णवकल्प एवं रसेंद्र चूणामणि तथा गोपालभट्ट की रसेंद्रसार संग्रह। कुछ अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं-रसकल्प, रसरत्नसमुच्चय, रसजलनिधि, रसप्रकाश सुधाकर, रसेंद्रकल्पद्रुम, रसप्रदीप तथा रसमंगल आदि।
भारत में रसायन की समृद्धशाली प्राचीन परंपरा के पुरातात्विक प्रमाण भी समस्त देशों में बिखरे पड़े हैं। पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त धातु आदि के नमूनों के रासायनिक विश्लेषण से जहां उनकी उच्च गुणवत्ता का परिचय मिलता है, वहीं अनेक पदार्थों की कार्बन डेटिंग से प्राचीनता भी अकाट्य रूप से स्थापित होती है। उत्तर से दक्षिण एवं पूर्व से पश्चिम, सभी दिशाओं में ईसा पूर्व 3000 वर्ष से 300 वर्ष ईसा पूर्व की अवधि में भी सक्रिय रही धातु की खदानों के पुरातात्विक प्रमाण मिले हैं।
प्रमुखत: उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, बंगाल, बिहार, पंजाब, गुजरात आदि राज्यों में इनका पता चला है। उत्खनन से उजागर हुए नालंदा, हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल एवं तक्षशिला आदि स्थलों से प्राप्त लोहा, तांबा, रजत, सीसा आदि धातुओं की शुद्धता 95 से 99 प्रतिशत तक पाई गई है।  इन्हीं स्थलों से पीतल और कांसा, मिश्र धातुएं भी प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुई है। इनकी शुद्धता इस बात की परिचायक है कि भारत में उच्चकोटि के धातुकर्म की प्राचीन परंपरा रही है। पुरातात्विक स्थलों से धातुकर्म में प्रयुक्त होने वाली जिन भियों आदि का पता चला है वे सभी संस्कृत पुस्तकों के विवरणों से मेल खाती है। हट्टी की स्वर्ण खदान में 600 फुट की गहराई पर पाया गया उध्र्वाधर शाफ्ट तकनीकी के क्षेत्र में भारतीय कौशल का जीता जागता उदाहरण है।
भारत की बहुत सी प्राचीन रसायन परंपराएं पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हुए आधुनिक समय तक जीवित हैं। आज भी हजारों वैद्य चरक द्वारा निर्देशित रीति से धातु आधारित एवं वानस्पतिक स्रोत वाली औषधियों का विरचन कर रहे हैं, जिनके दौरान अनेकानेक रासायनिक प्रक्रियाएं संपादित करनी पड़ती हैं। ईस्वी वर्ष 1800 में भी भारत में, व्रिटिश दस्तावेजों के अनुसार, विभिन्न धातुओं को प्राप्त करने के लिए लगभग 20,000 भ
ियां काम करती थीं जिनमें से दस हजार तो केवल लौह निर्माण भ_ियां थीं और उनमें 80,000 कर्मी कार्यरत थे। इस्पात उत्पाद की गुणवत्ता तत्कालीन अत्युत्तम समझे जाने वाले स्वीडन के इस्पात से भी अधिक थी।
इसके गवाह रहे हैं सागर के तत्कालीन सिक्का निर्माण कारखाने के अंग्रेज प्रबंधक कैप्टन प्रेसग्रेन तथा एक अन्य अंग्रेज मेजर जेम्स फर््ैंकलिन। उसी समय तथा उसके काफी बाद तक लोहे के अतिरिक्त रसायन आधारित कई अन्य वस्तुएं यथा-साबुन, बारूद, नील, स्याही, गंधक, तांबा, जस्ता आदि भी भारतीय तकनीकी से तैयार की जा रही थीं। काफी बाद में अंग्रेजी शासन के दौरान पश्चिमी तकनीकी के आगमन के साथ भारतीय तकनीकी विस्मृत कर     दी गई।

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