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राजनीति

संसदीय अवरोधों की त्रासदी

कुलदीप नैयर लेखक

संसद में इस तरह की अव्यवस्थाएं किसी भी कोण से जायज नहीं ठहराई जा सकतीं। मुझे डर लगने लगा है कि इस तरह से कहीं मानसून सत्र पूरी तरह से धुल न जाए। अगर ऐसा होता है, तो लंबे समय तक इस नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। संसद के ये अवरोध भारतीय शक्ति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगे और अंतत: भारत के विकास पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इस संदर्भ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का एक कथन याद आता है कि अगर साधन दूषित हैं, तो लक्ष्य भी दूषित ही होगाज्देश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों, भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने संसद को तमाशे का स्थान बनाकर रख दिया है। इन दोनों दलों ने एक मामूली से विषय को, जिसका कि जिक्र करना भी जरूरी नहीं है, को संसदीय बहस का विषय बना डाला। भले ही इस तरह के आचरण के जरिए इन्होंने पूरे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया हो, लेकिन इससे देश के सबसे बड़े निर्वाचित निकाय के प्रति लोगों की आस्था को ठेस पहुंचाई है। इसे समझने के लिए दो विषय लेते हैं। पहला मामला जम्मू-कश्मीर के कट्टर अलगाववादी नेता सय्यद अली शाह गिलानी को विदेश यात्रा के लिए पासपोर्ट जारी करने का है। दूसरा मामला इंडियन प्रीमियर लीग में मैच फिक्सिंग, स्पॉट फिक्सिंग और सट्टेबाजी के मामले में भारत में वांछित ललित मोदी को विदेश में पासपोर्ट दिलाने के लिए सहयोग करने का है। दोनों ही मामले काफी हद तक एक-दूसरे से मेल खाते हैं। पहले मामले में सय्यद अली शाह गिलानी सऊदी अरब अपनी बीमार पुत्री से मिलने के लिए जाना चाहते थे, वहीं ललित मोदी पुर्तगाल में कैंसर से ग्रसित अपनी पत्नी से मिलने गए थे। विदेश मंत्रालय, जो कि पासपोर्ट जारी करता है, ने एक पखवाड़े पहले कहा था कि गिलानी का पासपोर्ट का आवदेन अपूर्ण है, अत: उस पर विचार नहीं किया जा सकता। उन्हें पासपोर्ट जारी करने से मना किए जाने के पीछे का तर्क यह था कि उन्होंने इसके लिए भरे आवेदन पत्र में राष्ट्रीयता का कॉलम खाली छोड़ दिया था। भारतीय जनता पार्टी और जम्मू-कश्मीर में इसके सहयोगी दल में इस मसले पर एकदम से विभाजनकारी रेखाएं खिंच गई हैं। भाजपा गिलानी को पासपोर्ट देने के पक्ष में नहीं है। उसका कहना है कि एक ऐसा व्यक्ति जो भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल रहा हो और जिसे इस बात का अफसोस भी न हो, उसे कैसे पासपोर्ट दिया जा सकता है। केवल उसी स्थिति में गिलानी को पासपोर्ट जारी करना चाहिए, जब वह खुद को भारतीय कहेंगे और साथ यह भी भरोसा दिलाएंगे कि भविष्य में वह किसी भी तरह की भारत विरोधी गतिविधि में शामिल नहीं होंगे। इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर में पार्टी प्रवक्ता खालिद जहांगीर ने भी कुछ इसी लहजे में अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि घाटी में जो भी अस्थिरता बनी हुई है, उसके लिए गिलानी पूरी तरह से जिम्मेदार है। हर कोई इस बात से भलीभांति परिचित है कि वह कश्मीर के प्रति क्या विचार रखते है। मैं नहीं मानता कि इन तमाम परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें पासपोर्ट जारी करना मुनासिब होगा। वहीं पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती अली शाह गिलानी को पासपोर्ट दिए जाने के पक्ष में हैं। उनका कहना है कि ‘मानवता’ के आधार पर गिलानी को पासपोर्ट जारी कर देना चाहिए। गिलानी ने मई महीने में यात्रा दस्तावेजों के लिए आवेदन किया था और अब जाकर उन्हें पासपोर्ट जारी कर दिया गया है, जिसकी वैधता नौ महीनों के लिए होगी। अब इस पूरे मामले को ललित मोदी प्रकरण के साथ जोडक़र देखते हैं, जिन्हें ब्रिटिश सरकार से यात्रा दस्तावेज मुहैया करवाने के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने मदद की थी। सुषमा स्वराज ने व्यक्तिगत तौर पर ब्रिटिश सरकार को अपने देश के नियमों के अनुसार ललित मोदी की मदद करने के बारे में पत्र लिखा था। बाद में इस पर उन्होंने स्पष्टीकरण दिया था कि उन्होंने ललित मोदी की यह मदद ‘मानवता’ के आधार पर की थी। साफ तौर पर यह एक अविवेकपूर्ण निर्णय है और इसके लिए उन्हें माफी मांगनी चाहिए। कांग्रेस ने उनके इस्तीफे की मांग की है। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने इस मुद्दे पर संसद में भी काफी हो हल्ला मचाया। अरुण जेटली ने सदन में जब कहा कि सुषमा स्वराज अपना पक्ष रखेंगी और उसके बाद इस पर चर्चा होगी, तभी यह मामला रफा-दफा हो जाना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस मांग करती रही कि पहले उनसे इस्तीफा दिलाया जाए और उसके बाद ही इस मसले पर कोई चर्चा संभव है। इससे स्पष्ट तौर पर यह बात जाहिर हो जाती है कि कांग्रेस के पास मुद्दों की कमी है। जब तक यह बात साबित नहीं हो जाती कि ललित मोदी की सहायता से सुषमा स्वराज को आर्थिक या किसी अन्य किस्म का लाभ पहुंचा, तब तक कांग्रेस उनके इस्तीफे की मांग नहीं कर सकती। यह बात सच है कि सुषमा स्वराज के पति ललित मोदी के वकील हैं, लेकिन वह वर्षों से उनके लिए काम करते आ रहे हैं। इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मोदी को वीजा जारी करवाने के लिए उन्होंने सुषमा स्वराज को कहा हो। कांग्रेस उचित साक्ष्यों के अभाव में कोई आरोप नहीं लगा सकती। सुषमा भाजपा की एक सम्माननीय नेता हैं। उनका यह सम्मान उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और उदारवादी विचारों व कार्यों के कारण है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो कि अपने हिंदुत्ववादी दृष्टिकोण के लिए जाना जाता है, सुषमा स्वराज से खुश नहीं है। लेकिन भाजपा नेतृत्व इस हकीकत से अच्छी तरह परिचित है कि उनकी उदारवादी छवि भाजपा के साथ न चलने वाले लोगों का सहयोग हासिल करने के लिहाज से काफी जरूरी है।  पार्टी को सत्ता में लाने के लिए इस तबके के मत मिले और आजादी के बाद से पहली बार यह देखने को मिला कि किसी दल को केंद्र में सत्तासीन होने के लिए मुस्लिम वोटों की जरूरत नहीं पड़ी। पुन: कांग्रेस द्वारा संसदीय कार्यवाही को बाधित करने वाले बिंदु पर लौटते हैं। इसे दुर्भाग्यपूण ही माना जाएगा कि इस बाधित कार्यवाही पर बोलते हुए कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह उनकी पार्टी की एक संसदीय रणनीति है और अतीत में भाजपा ने भी इस संदर्भ में कई मील पत्थर गाड़े थे। राज्य सभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने सर्वदलीय बैठक में भी कुछ ऐसी ही दलील पेश की थी। इस संदर्भ में बोलते हुए आजाद ने कहा था कि जब तक उनकी इस्तीफे की मांग को स्वीकार नहीं किया जाता, तक तक सदन की कार्यवाही को किसी भी हालत में चलने नहीं दिया जाएगा। इस अक्खड़पन के बावजूद कांग्रेस के ही एक धड़े में इस बात को लेकर शंका बनी हुई थी कि उनकी इस रणनीति से कोई ज्यादा समर्थन नहीं मिलेगा और एक समय के बाद पार्टी संसद में अकेली पड़ जाएगी। संसद में इस तरह की अव्यवस्थाएं किसी भी कोण से जायज नहीं ठहराई जा सकतीं। मुझे डर लगने लगा है कि इस तरह से कहीं मानसून सत्र पूरी तरह से धुल न जाए। अगर ऐसा होता है, तो लंबे समय तक इस नुकसान की भरपाई नहीं हो पाएगी। संसद के ये अवरोध भारतीय शक्ति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगे और अंतत: भारत के विकास पर भी इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इस संदर्भ में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का एक विचार याद आता है कि अगर साधन दूषित हैं, तो लक्ष्य दूषित ही होगा। यह स्थिति एक संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था वाले देश के लिहाज से संतोषजनक नहीं मानी जा सकती।

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