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गौ और गोवंश

गाय के दूध से बनी छाछ को किया जाए राष्ट्रीय पेय घोषित

आज देश गोवर्धन पर्व मना रहा है। बहुत बड़ी संख्या में लोगों को यह बात पता नहीं है कि गौ संरक्षण और गोवंश के सँवर्धन के लिए ही गोवर्धन का पर्व मनाया जाता है। किसी पौराणिक अंधपरंपरा के वशीभूत होकर लोग इस त्यौहार को मना रहे हैं। वास्तव में भारत की प्राचीन कृषि व्यवस्था गौ आधारित कृषि व्यवस्था थी । यही कारण है कि गांव देहात में गाय को आज भी :धन’ के रूप में पुकारा जाता है। गाय ‘धन’ इसीलिए कही जाती है कि प्राचीन काल में यह वस्तु विनिमय के काम आती थी। उस समय भारत में पूर्ण स्वायत्तशासी संस्था के रूप में प्रत्येक गांव कार्य करता था। अंग्रेजों ने भारत के स्वायत्तशासी गांव को नष्ट करने की योजना पर काम करना आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने अपने राजस्व विभाग में कलेक्टर नाम का एक राक्षस राजस्व वसूल करने के लिए बैठाया । उस कलेक्टर के ऊपर एक कमीशनखोर कमिश्नर बैठाया। आजादी के बाद जब कांग्रेस की सरकार बनी तो उसने खून चूसने वाले कलेक्टर व कमीशनखोर कमिश्नर को गांव का खून चूसने के लिए अपने-अपने स्थानों पर यथावत रखा। जबकि होना यह चाहिए था कि भारत की प्राचीन अर्थव्यवस्था को समझकर प्रत्येक गांव के लिए एक स्वयंसेवी वैद्य नियुक्त किया जाता । वहीं पर अच्छी , ऊंची व राष्ट्र निर्माणपरक शिक्षा देने के लिए अच्छे आचार्यों की प्राचीन व्यवस्था को जीवित किया जाता। तालाबों को खुदवाकर गांव के पानी को गांव में रोका जाता। गाय के गोबर से अच्छी खाद बनाई जाती और किसानों द्वारा आधुनिक ढंग से खेती करने के लिए अच्छे कृषि वैज्ञानिकों को तैयार किया जाता। गाय के गोबर को गाय का वरदान सिद्ध करने के लिए वह सभी उपाय अपनाए जाते जिनसे गोवर्धन संभव हो पाता।
      गांव की प्रतिभा को गांव में रोककर उसे वहीं वे सारी सुविधाएं प्रदान की जातीं जो उसे महानगरों में दिखाई दे रही थीं? गांव की प्रतिभाओं को गांवों से निकालकर महानगरों की ओर जिस प्रकार भेजने का सिलसिला 1947 के बाद आरंभ किया गया, उससे कॉलोनाइजरों, भूमाफियाओं और किसान का खून चूसने वाले एक ऐसे वर्ग का उदय हुआ जिसने किसान की भूमि औने – पौने दामों में लेकर कई हजार गुणे मुनाफे पर बेचने का काम आरंभ किया ।
      आज उन्हीं मूर्खतापूर्ण नीतियों के कारण जब किसान आत्महत्या करता हुआ दिखाई दे रहा है तो जो चोर हैं वही शाह बने बैठे यह कह रहे हैं कि किसान यदि आत्महत्या कर रहा है तो अमुक सरकार के कारण कर रहा है।
इसके उपरांत भी यह बात बहुत अधिक संतोषजनक है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी के प्रयासों से अब किसान और प्राधिकरण के बीच कोई भी बिचौलिया काम करता हुआ दिखाई नहीं दे रहा। जिससे किसान को उसकी भूमि का पूरा मुआवजा मिलने की पहले की अपेक्षा अधिक संभावना हो गई है। श्री मोदी के भय के चलते ये सारे बिचौलिए इस समय पेट पकड़कर रो रहे हैं।
किसान की उपज का सही मूल्य दिलाने के लिए भी ऐसी ही स्थिति उत्पन्न करने की आवश्यकता है।
       किसान के लिए यह आवश्यक है कि उसके आलू को कोई बिचौलिया न खरीदे। होना यह चाहिए कि किसान के 50 पैसे के आलू से जो चिप्स बनाने वाला व्यक्ति ₹50 कमा रहा है, वह किसान को 50 पैसे के स्थान पर ₹10 अवश्य दे और उसके बाद भी यह व्यवस्था हो कि चिप्स बनाने की कंपनी में किसान के परिवार से भी लोगों को नौकरी पर रखवाया जाए।
    मोदी जी को न्यूनतम समर्थन मूल्य की नीति में विश्वास न रखकर किसानों को उसकी उपज का संतोषजनक नहीं बल्कि सम्मानपूर्ण जीवन जीने के लिए अपेक्षित मूल्य दिलवाने की दिशा में कार्य करना चाहिए।
‘मोदी है तो मुमकिन है’ का नारा निश्चित रूप से बहुत सार्थक है और हम यह आशा करते हैं कि प्रधानमंत्री किसानों को उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य न देकर 50 पैसे के आलू को ₹10 में बिकवाने की कारगर रणनीति लागू करेंगे। इस दिशा में नई कृषि नीति लागू करने के लिए देश के सभी राजनीतिक दलों को भी सरकार का समर्थन करने के लिए अपने सुझाव प्रस्तुत करने चाहिए। देश के सभी राजनीतिक दलों को यह स्पष्ट कानून बनवाने में भी सहायता करनी चाहिए कि गायों का वध देश में नहीं होगा और गायों के दूध से तैयार छाछ को इस देश का ‘राष्ट्रीय पेय’ घोषित कराया जाएगा। जब देश के हर ढाबे पर गाय के दूध की छाछ मिलेगी और पेप्सी व कोकाकोला वहां से नदारद हो जाएंगे तो न केवल गाय को पालने के लिए किसान प्रेरित होगा बल्कि उसकी छाछ से उसे बड़ा लाभ भी मिलेगा। तब किसान को पराली जलाने के लिए भी बाध्य नहीं होना पड़ेगा और एनसीआर जैसे क्षेत्र में जिस प्रकार प्रत्येक वर्ष पराली का प्रदूषण फैलता है उससे भी मुक्ति मिल जाएगी।
    इसके अतिरिक्त हमारा केंद्र की मोदी सरकार से यह भी अनुरोध है कि वह गाय के मूत्र को कम से कम ₹50 किलो खरीदने की व्यवस्था करे और गाय के मूत्र से बनने वाली उन सभी स्वास्थ्यवर्धक औषधियों में उसका प्रयोग किया जाए जिससे मानव जीवन को सुरक्षा प्रदान हो सकती है । इससे गाय के मूत्र की पर्याप्त कीमत किसान को मिल जाएगी और एक गाय के भरण-पोषण की पूर्ति उसके मूत्र से मिलने वाले पैसे से ही संभव हो जाएगी।
    इसके अतिरिक्त गाय के 24 घंटे के गोबर से कम से कम 21 किलो जैविक खाद तैयार हो सकती है । जिसमें हरी पत्ती, पानी मिट्टी आदि मिलाकर यह जैविक खाद तैयार की जाती है।  यदि इस 21 किलो खाद की कीमत ₹10 प्रति किलो भी रखी जाए तो प्रतिदिन एक गाय के गोवर से ₹210 का जैविक खाद तैयार हो सकता है। इसके साथ ही धूपबत्ती ,अगरबत्ती , साबुन आदि आवश्यक वस्तुएं भी गाय के गोबर से तैयार करके किसान को फायदा पहुंचाया जा सकता है।  गाय के घी को भी विभिन्न महंगी औषधियों में प्रयोग किया जा सकता है । जिससे गाय का 1 किलो घी औषधियों के रूप में परिवर्तित होकर कम से कम एक किसान को ₹ 5000 दिला सकता है।
   इस प्रकार की राष्ट्रीय नीतियां बनाकर गाय को फिर से भारत की अर्थव्यवस्था के केंद्र में स्थापित किया जा सकता है। जिससे आवारा घूमती हुई गायों को ही उपयोगी बनाकर किसान पकड़कर उसके मूत्र और गोबर से ही 300 से ₹400 प्रतिदिन कमा सकता है। जब ऐसी स्थिति आ जाएगी तो कोई भी किसान किसी भी गाय को आवारा नहीं छोड़ेगा, बल्कि उसकी रक्षा व सुरक्षा करना अपना धर्म समझेगा।
     ऐसे में हम समस्त ‘उगता भारत’ परिवार की ओर से केंद्र सरकार से यह मांग करते हैं कि वह गोमूत्र को यथाशीघ्र औषधियों के लिए आवश्यक घोषित करे। गोबर से जैविक खाद बनाने की प्रक्रिया सिखाकर किसानों को उसके प्रति जागरूक करे और जहां गाय का गोबर उपलब्ध नहीं होता उन खेतों के लिए किसानों से सीधे जैविक खाद खरीद कर उपलब्ध कराया जाए। जिससे किसानों की स्थिति मजबूत होगी और गायों को सुरक्षा उपलब्ध होगी। गाय के दूध से बनने वाली छाछ को राष्ट्रीय पेय घोषित कराने संबंधी विधेयक सरकार को आगामी सत्र में ही प्रस्तुत करना चाहिए। इसी प्रकार गाय के घी को भारत की औषधियों के लिए सरकारी मानकों के अनुसार आवश्यक बनाकर उसका मूल्य निश्चित करे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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