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भारतीय संस्कृति

कितना प्रासंगिक है प्राचीन भारतीय विज्ञान

डॉ. बिशन किशोर

(भू.पू. आचार्य, यान्त्रिक इंजीनियरिंग, काशी हिंदी विश्वविद्यालय वाराणसी)

विश्वगुरु भारत आज विज्ञान और तकनीकी के लिए विदेशों पर निर्भर है। परतन्त्रता में तो ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास गया जिससे हमारा अपना अस्तित्व पूर्णरूपेण विदेशी ज्ञान पर अवलम्बित हो गया। इसलिए हम समस्त ज्ञान आयात  कर रहे हैं। पहले परतन्त्र थे, अब स्वतन्त्र हैं, फिर भी 1947 से यही करते आ रहे हैं।
विश्व पटल पर आधुनिक विज्ञान और तकनीकी के विस्मयकारी अन्वेषण और आविष्कार मनुष्य के परिवेश को सम्पूर्णता से बदल रहे हैं। मनुष्य और मशीन की सीमा रेखायें समाप्त होती प्रतीत हो रही हैं। बुद्धिमान मशीनों का युग आरम्भ हो रहा है। कृत्रिम बुद्धि और मस्तिष्क संरचना, रोबोटिक्स, साइबोर्ग, कम्प्यूटर, वर्चुअल रीआलिटी, इन्टरनेट, नैनो-टैक्नोलौजी, क्लोनिंग, जैनेटिक इंजीनियरिग, जीनोम आदि मनुष्य के भविष्य की एक विशिष्ट यात्रा का संकेत प्रदान कर रहे हैं।
विज्ञान की इन उपलब्धियों के पीछे कौन-सा प्रेरक बल है? क्या विज्ञान किन्हीं तथ्यों में बन्द है? क्या किसी पैगम्बर की वाणी इन उपलब्धियों के मूल में हैं? क्या प्राचीन भारतीय विज्ञानवेत्ताओं की कृतियों का इसमें कोई योगदान है? क्या आधुनिक विज्ञान किसी नये आधार की खोज में है? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जिनके समुचित उत्तर आज की आवश्यकता है। ऐसा स्पष्ट है कि इसके उचित उत्तर द्वारा प्रदत्त दिशा में प्रयास शुरू किए जाने से विज्ञान का चरमोत्कर्ष पाया जा सकेगा। हमें पराधीनता के भाव से निकल कर स्व को अंगीकार कर अपना खोया स्थान पाना होगा। इसके लिए प्राचीन भारतीय विज्ञान वैभव के रास्ते चल कर दिशा संकेत प्राप्त करने का प्रयास करना होगा।
आधुनिक विज्ञान प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान प्राप्त करने में चेष्टारत है। विज्ञान द्वारा प्रदत्त सूत्रों का उपयोग करके तकनीकी जनसामान्य के जीवनयापन की प्रगति के द्वार खोलती है। विज्ञान अब तक कुछ प्राकृतिक शक्तियों को सक्रिय तथा नियंत्रित कर सका है। यह संभव हुआ है, वस्तुनिष्ठता और सूक्ष्मता के द्वारा जो विचार तथा शब्दाभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है। विज्ञान के विभाग (भौतिकी, रसायन, प्राणिशास्त्र आदि) अपने-अपने तथ्यों से बंधे हैं। इन विभागों की सीमायें हैं। जब तक वैज्ञानिक इन सीमाओं को नहीं लाँघ पाए थे, तब तक विज्ञान की प्रगति की गति भी तीव्र नहीं थी। जब विभिन्न विभाग एक दूसरे की सीमायें लाँघने लगे तो समस्त प्रकार के अनुभव केन्द्रों में इक_े होने लगे और विज्ञान तथा तकनीकी की प्रगति में अभूतपूर्व गति आयी। आज के वैज्ञानिक युग की उपलब्धियाँ इन विभागों के परस्पर अतिक्रमण का परिणाम हैं।
वैज्ञानिकों को अब अपने पग और आगे बढ़ाने के लिए नवीन आधार की आवश्यकता है जिसके लिए आज का विज्ञानी भारत के मौलिक चिन्तन की ओर प्रवृत्त हुआ प्रतीत होता है। अनेक प्रसिद्ध विज्ञानियों की पुस्तकें भारतीय प्राचीन ग्रंथों में निहित विज्ञान के तत्वों का विश्लेषण करती हैं और अत्याधुनिक विज्ञान से समन्वय की दृष्टि प्रस्तुत करती हैं। श्रौडिंगर (नोबुल पुरस्कार विजेता) ने प्रथम विस्फोट किया जब उन्होंने अपनी पुस्तकों माई व्यू ऑफ वल्र्ड तथा माइंड एंड मैटर में यह स्थापित किया कि अद्वैत वेदान्त ही विज्ञान की समस्याओं का समाधान है। फ्रिटजॉफ कापरा, डेविड बोह्म, ए.डी. राइनकोर्ट, गैरी जुकोव, माइकिल तालबोट आदि ने तो वैज्ञानिक चिन्तन के समुद्र में वेदान्त के अद्वैत को नवीन लहरों के सृजन का केन्द्र माना है। फ्रिटजॉफ कापरा की ताओ ऑफ फिजिक्स में अन्त:परमाणवीय कणों यानी कि सबन्यूक्लीयर पार्टिकल्स के कंपन तथा शिव-ताण्डव नर्तन की समानता स्पष्ट वर्णित है। जुकोव अपनी पुस्तक द डांसिंग वू ली मास्टर्स मंन आधुनिक भौतिक शास्त्र की इंटलेक्चुअल इंट्रेंचमेंट इज इंटलेक्चुअल ओपेननेस की यात्रा का वर्णन रामायण की कथा के माध्यम से करते हैं। विज्ञान की एक नूतन खोज गट ब्रेन है। इस अन्वेषण से यह स्पष्ट हुआ है कि मनुष्य के दो मस्तिष्क हैं। एक कपाल में स्थित है तथा दूसरे की स्थिति गट में है। ये दोनों मस्तिष्क एक दूसरे से परस्पर जुड़े हैं। इस दूसरे मस्तिष्क को एंटरिक नर्वस सिस्टम कहते हैं। इसमें न्यूरॉन्स, न्यूरो-ट्रांसमीटर्स तथा प्रोटीन हैं जो संदेश वाहक हैं। इस द्वितीय मस्तिष्क की मानवीय सुख तथा स्मृति में मुख्य भूमिका है। भारतीय वैज्ञानिकों ने इसकी खोज हजारों वर्ष पूर्व ही कर ली थी। ”मूलाधार चक्रÓÓ के गुण और आधुनिक एंटरिक नर्वस सिस्टम में अद्भुत समानता है। एंपरर्स माइंड के लेखक रोजर पेनरोज ने अपनी नवीन पुस्तक शैडोज ऑफ माइंड में कहा है कि माइंड को समझने के लिए एक नए भौतिकीशास्त्र की आवश्यकता है। चेतना के संबंध में भौतिक विज्ञान को भारतीय तत्वचिन्तन धारा का अबलम्बन आवश्यक प्रतीत होता है।
उपनिषदकाल का भारतीय तत्व-ज्ञान इस वैज्ञानिक जगत में अन्वेषणों का एक बड़ा माध्यम सिद्ध हो रहा है। प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान में सीमा रेखाओं का अस्तित्व नहीं था। तत्व चिन्तन में रत ऋषिगण सत्यान्वेषण की प्रक्रिया धर्माचरण द्वारा सम्पादित करते थे। इससे विज्ञान की प्रगति तथा लोक कल्याण साथ-साथ सधते थे। भारतीय दर्शन के अनुसार विज्ञान तथा धर्म में पूर्ण समरसता है। परन्तु पाश्चात्य जगत में इसके विपरीत धारणा रही है (पाश्चात्य जगत के विज्ञान और धर्म के बीच के झगड़े के मूल में व्याप्त पश्चिम में प्रचलित धर्मों की अतार्किकता है)। महर्षि कणाद कृत वैशेषिक दर्शन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। वैशेषिक दर्शन एक भारतीय वैज्ञानिक दर्शन है। महर्षि कणाद कृत वैशेषिक दर्शन के ग्रंथ का प्रथम सूत्र है, ”अथातो धर्म व्याख्यास्याम:ÓÓ। इसका अर्थ है कि अब धर्म की व्याख्या करते हैं। इस ग्रंथ के अध्ययन से ज्ञात होता है कि इसमें (भौतिक) विज्ञान की ही विवेचना है, फिर भी प्रथम सूत्र धर्म की व्याख्या है। भारत में धर्म की व्यापक परिभाषा है जिसके अनुसार पदार्थ-धर्म और जीव-धर्म की अभिन्नता है। वेदान्त का धर्म तथा आधुनिक विज्ञान एक दूसरे के समीप आ रहे हैं। दोनों का मिलन बिन्दु एक है। भौतिक विश्व की सृष्टि, व्याख्या और प्रभाव की एकता, पदार्थ और ऊर्जा की एकता, संरक्षण आदि अनेक स्पर्श बिन्दु दर्शित होते हैं।
भारतीय दर्शन ग्रंथों में प्रकृति के साक्षात्कार के लिए सूत्र भरे पड़े हैं। वेद, उपनिषद्, भागवत, गीता आदि ग्रंथों के अनेक सूत्र तो आधुनिक विज्ञानियों के प्रेरणा स्रोत सिद्ध हो रहे हैं। आवश्यकता है कि इनमें उपलब्ध सामग्री का नवीन दृष्टि से अध्ययन कर इनमें निहित ज्ञान को जग में प्रदर्शित किया जाय। साहित्य की उपलब्धता तथा आधुनिक भारतीय मन के सम्मिलन से ही कालान्तर में यह कार्य सम्पादित हो सकेगा। परन्तु इस दिशा में वांछित प्रगति नहीं हो रही है। इस दिशा में हमें बढऩे से रोकने की मनोवृत्ति को समझना होगा जो हमें अपने ज्ञान विज्ञान को अपने देश में ही प्रत्यक्ष करने से रोकती है।
विश्व के विकसित राष्ट्र सूचना प्राद्योगिकी का उपयोग कर के अपनी-अपनी श्रेष्ठता के बल पर अन्य राष्ट्रों में हीन भावना का संचार करते हैं। दुर्भाग्य से हमारे राष्ट्र (भारत) में एक विशिष्ट वर्ग में यह हीन भावना पल्लवित हो रही है। ऐसा प्रचार हो रहा है कि हमारा अस्तित्व ”पाश्चात्य विज्ञानÓÓ तथा ”पाश्चात्य तांत्रिकीÓÓ पर ही आश्रित है। सरकार तथा जनता वही करती है जो देश का प्रबुद्ध वर्ग ज्ञापित करता है। आज आवश्यकता है कि हम इस व्यामोह से निकल कर आधुनिक विज्ञान की आधारशिला की खोज करें और भविष्य के लिए मार्गदर्शक के रूप में मानक स्थापित करें। इस कार्य के आरम्भ बिन्दु के रूप में संयोग की बात है कि हमारे राष्ट्र में उपलब्ध ज्ञान-पुस्तकों में उपलब्ध ऐसे वर्णन है जो इंगित करते हैं कि प्राचीन भारत में विज्ञान तथा तांत्रिकी की भरपूर उपयोग था। आवश्यकता है यह सुनिश्चित करने की कि उपलब्ध विवरणों में विज्ञान है अथवा मात्र साहित्यिक अलंकारिता। यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि क्या आधुनिक विज्ञान मात्र पश्चिमात्य कृति है। भारत की गौरवशाली परम्परा में आधुनिक विज्ञान की आधारशिला स्थापित है। आज आवश्यक है कि इसके रूप को स्थापित किया जाय। राष्ट्रीय आस्मिता के पुनर्जागरण हेतु विज्ञान और अध्यात्म की भारतीय परम्परा के अनुरूप शोध के लिए तरूण वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित किया जाय।
प्रौद्योगिकी के विकास के लिए विज्ञान तथा विज्ञान के विकास के लिए प्रौद्योगिकी की उपलब्धता आवश्यक है। दोनों ही परस्पर पूरक हैं। विज्ञान यदि आत्मा है तो प्रौद्योगिकी शरीर। शरीर की चेतना आत्मा है। शरीर की उपादेयता समाप्त होने पर प्राण उसे छोड़ देता है और अन्य शरीर धारण कर लेता है। इस तथ्य के अनुसार विज्ञान का समय क्षेत्र विस्तृत है जबकि प्रौद्योगिकी का समय क्षेत्र अति संकुचित है। इसलिए विज्ञान के उपलब्ध होने पर भी पुरानी प्रौद्योगिकी का मिलना आवश्यक नहीं है। यह तथ्य सर्वविदित है। अत: यदि उच्चकोटि के विज्ञान का कहीं दर्शन होता है तो समुन्नत प्रौद्योगिकी की उपस्थिति संधिग्ध नहीं हो सकती। प्राचीन भारत को निष्पक्ष इतिहास के झरोखे से देखने पर यह ज्ञात होता है कि यह देश विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में अत्युन्नत था। इस निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए पूर्वाग्रह से मुक्त होना आवश्यक है। तत्पश्चात् ही ग्रंथों का पारायण कोई लाभकारी परिणाम दे सकता है।
संशय निवारण के लिए और जिज्ञासा जागृत करने के लिए कुछ संकेत (भारत का विश्व को विज्ञान के योगदान) निम्नलिखित हैं.
1. प्राचीनतम सभ्यता – 3000 ई.पू. में ही भारत के विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक ढंग से योजित नगर थे तथा ईंटों से निर्मित भवन। लगभग 1520 किलोमीटर की पेटी में (उत्तर से दक्षिण) 10 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली अत्यधिक उन्नत संस्कृतियों की खोज हुई है जिनमें हड़प्पा, मोहन-जोदाड़ो, कालीबंगन तथा लोथल मुख्य हैं। आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि निर्माण कार्य में जिन ईंटों का प्रयोग किया जाता था उनका आकार मानक 24&14&7 से.मी. था। इन योजित नगरों में से प्रत्येक में 20-25 हजार निवासी रहते थे। ऐसी कार्यशालाऐं भी प्राप्त हुई हैं जिनमें विभिन्न प्रकार के उत्पादों का निर्माण होता था। इनमें से अनेक उत्पादों का निर्यात होता था। हड़प्पा के नाविक मेसोपोटामिया तथा अन्य देशों में अपना सामान ले जाकर बेचते थे, इसका प्रमाण वहां पर सिंधु-सीलों की प्राप्ति है। जीवन और नगरीय व्यवस्था अत्यधिक उन्नत थी।
2. (अ) शून्य- यह सर्वमान्य है कि भारत ने विश्व को शून्य का ज्ञान दिया।
(ब) 100 ई.पू. में दशमल पद्वति का भारत में भरपूर उपयोग था।
भारत में ज्यामिति का उपयोग 1000 ई.पू. से होता आया है जबकि यूक्लिड को इसके अन्वेषण का श्रेय (300 ई.पू.) दिया जाता है। अति प्रसिद्ध पाइथागोरस प्रमेय का स्पष्ट रूप बोधायन के शुल्ब सूत्रों में उपलब्ध है, जो 600 ई.पू. के हैं।
3. नक्षत्र विज्ञान: भारतीय नक्षत्र विज्ञानी 3500 वर्षों से आकाश का मानचित्र बनाते रहे हैं। उनकी खोजें आश्चर्य चकित करने वाली हैं।
(अ) कोपरनिकस से 1000 वर्ष पूर्व ही आर्यभट्ट ने कहा था कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। ‘आर्यभटीयमÓ में उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी गोल है, अपनी अक्ष पर घूमती है और अन्तरिक्ष में लटकी है। सूर्य और चन्द्र ग्रहण सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी की परस्पर छायाओं के कारण होते हैं।
(ब) सूर्य सिद्धान्तÓ में भास्कराचार्य ने पृथ्वी के सूर्य परिभ्रमण काल की गणना दशमलव के नौ स्थानों तक की है।
भास्कराचार्य – 365.258756484 दिन
नक्षत्र-विज्ञानी डब्ल्यू. एम. स्मार्ट – 365.2564 दिन
आधुनिक स्वीकृत माप – 365.2596 दिन
(स) इतिहास में सबसे लम्बा समयमान कल्प: मानवीय सभ्यता में भारतीय काल मापन विधि सबसे लम्बा समयमान प्रस्तुत करती है।
4. वायुयान, पनडुब्बी तथा अन्तरिक्षयान: मानवीय सभ्यता के प्राचीनतम ग्रंथ (ऋग्वेद) में कुछ विशेष यानों का सन्दर्भ मिलता है (कार, रथ, यान, पनडुब्बी, अन्तरिक्षयान)।
5. चिकित्सा विज्ञान तथा शल्य विज्ञान: अरब तथा रोमन विश्व में चरक की अधिकारी चिकित्सक के रूप में ख्याति थी। उन्होंने आयुर्वेद के आठ मुख्य विभाग किए थे जो आज भी प्रचलित हैं। सुश्रुत शल्य चिकित्सा के जनक के रूप में विख्यात हैं। ये 600 ई.पू. में शल्य चिकित्सा करते थे। उन्होंने 300 शल्य-क्रियाओं का वर्णन किया है। उन्होंने शल्य चिकित्सा को आठ भागों में विभक्त किया था।
भारत में प्राचीन काल में ही सीजेरियन ऑपरेशन और क्रेनिकल सर्जरी की जाती थी। भागवत् में वशिष्ठ ऋषि द्वारा एक गर्भवती महिला का सीजेरियन ऑपरेशन किया गया था। जीवक (भगवान बुद्ध का चिकित्सक) मस्तिष्क की शल्य-क्रिया करते थे।
उक्त संक्षिप्त वर्णन यह स्पष्ट करता है कि वैदिक काल में ही भारत में विज्ञान की परम्परा का आरम्भ हो गया था। वैदिक काल के ऋषियों ने अनेक शास्त्रों, विज्ञानों एवम् वेदांगों की नींव डाली थी। उन्होंने एक ऐसे यथार्थ परक समाज की परम्परा स्थापित की जिसके आधार पर आज का समाज खड़ा है और विदेशों में इस समाज के सिद्धान्तों के अनुकरण की भावना जागृत हो रही है। इतिहास साक्षी है कि 600 ई. तक भारत ने संसार के सभी प्रगतिशील देशों का नेतृत्व किया और ज्ञान के समस्त अंगों और उपांगों का विकास किया। परम्परा से जो सामिग्री और साहित्य आज उपलब्ध है उससे दिशा ग्रहण करके और शोध के माध्यम से अपने अतीत के गौरव को पुन: स्थापित किया जाना चाहिए।
ऐसा करते समय हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि अपने ज्ञान में निहित सिद्धान्तों को तोड़ मरोड़कर आधुनिक विज्ञान से संगति बैठाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए। यह आवश्यक है क्योंकि आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्त अन्तिम सत्य नहीं हैं। सत्रहवीं शताब्दी से आरम्भ आधुनिक विज्ञान यात्रा ने कई पड़ाव देखे हैं।  डेकार्ट तथा न्यूटन का विश्व ध्वस्त हो चुका है; आइन्स्टाइन का गॉड डज नॉट प्ले विद डाइस अब क्वान्टम भौतिकी में सम्पूर्ण रूप से नकार दिया गया है। श्रौडिंजर वेव इक्वेशन के हल भारतीय ‘एकं सत् विप्रा बहुदा वदन्तिÓ को सिद्ध कर रहे हैं। विज्ञान अब चेतना तथा पदार्थ में साम्य खोज रहा है जो हमारे यहां स्थापित है। अत्यधिक महत्व का सूत्र यह है कि अपने विवरणों के सत्यापन के पश्चात् हमें निडरतापूर्वक उन भारतीय वैज्ञानिक तथ्यों को भी प्रस्तुत करना चाहिए जिनको आधुनिक विज्ञान आज नहीं मानता परन्तु जो आधुनिक विज्ञान के लिए भी आश्चर्यजनक सिद्ध हो सकते हैं।

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