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वैदिक धर्म व संस्कृति का उद्धारक, रक्षक व प्रचारक सत्यार्थ प्रकाश

satyarth prakashमनमोहन सिंह आर्य

संसार में समस्त धार्मिक ग्रन्थों में वेद के बाद सत्यार्थप्रकाश का प्रमुख स्थान है। इसका कारण इन दोनों ग्रन्थों का मनुष्य जीवन के लिए सर्वोपरि महत्व है। वेद ईश्वर प्रदत्त अध्यात्म व सांसारिक ज्ञान है। यह बताना आवश्यक है कि सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वान्तर्यामी ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि कर युवा मनुष्यों वा स्त्री-पुरूषों को उत्पन्न किया था। इन मनुष्यों का मार्गदर्शन करने के लिए ईश्वर ने अपने सर्वान्तर्यामी स्वरूप से उत्पन्न प्रजा व मनुष्यों में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा की पवित्रतम आत्माओं में चार वेद क्रमश ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का ज्ञान सभी मन्त्रों के अर्थ सहित प्रेरणा द्वारा स्थापित किया था। वेद सब सत्य विद्याओं की पुस्तकें हैं। वेदों के इस महत्व के कारण ही मनुष्यों को अपने कल्याण के लिए इनका पढऩा-पढ़ाना व सुनना-सुनाना मनुष्यमात्र का परमधर्म है। वेद की तुलना में संसार के अन्य सभी ग्रन्थ गौण हैं। वह उसी सीमा तक मान्य व प्रमाणिक हैं जहां तक उनकी मान्यतायें एवं सिद्धान्त वेदसम्मत, वेदानुकुल एवं न्यायदर्शन वर्णित आठ प्रमाणों से सत्य सिद्ध होते हैं। हमारे ज्ञान के अनुसार इस कसौटी पर केवल ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ही पूर्णतया व अधिकतम् सत्य सिद्ध होता है। अत: जीवन के कल्याण व इसके लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति के लिए ‘सत्यार्थ प्रकाश’ का एक गाइड व पथप्रदर्शक के रूप में अध्ययन अत्यन्त महत्ववपूर्ण, उपयोगी व आवश्यक है। यह सौभाग्य की बात है कि सत्यार्थप्रकाश के संसार व देश की अनेक भाषाओं में अनुवाद उपलब्ध हैं जिनसे अधिकांश मनुष्य लाभान्वित हो सकते हैं।

विश्व प्रसिद्ध ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ग्रन्थ की रचना वेदों के अपूर्व विद्वान और सभी मतों वा धर्मों के जानकार महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सन् 1874 में की है। इसकी रचना का मुख्य कारण व उद्देश्य वेदों के विस्मृत ज्ञान का प्रकाशन व उसका संरक्षण है। महाभारत काल और महर्षि दयानन्द के काल में लगभग पांच हजार वर्षों का अन्तर है। वर्तमान आंग्ल सम्वत्सर की उन्नीसवीं शताब्दी में भारत की एकमात्र भाषा संस्कृत का स्थान अनेक भाषा व बोलियों ने ले लिया था। देश की सबसे अधिक प्रचलित, बोली व समझी जाने वाली भाषा हिन्दी थी जिसे महर्षि दयानन्द आर्यभाषा कहते थे। संस्कृत का ज्ञान न्यून हो जाने व अधिकांश लोगों की समझ से बाहर होने के कारण वेदों को जन-जन की भाषा में प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी। महर्षि दयानन्द गुजराती थे और संस्कृत के अपने समय के शीर्ष विद्वान थे। वह संस्कृत धाराप्रवाह बोलते थे और संस्कृत में ही व्याख्यान भी देते थे। यदि वह संस्कृत में सत्यार्थ प्रकाश की रचना करते तो इससे जनसामान्य लाभान्वित नहीं हो पाते। अत: ब्रह्म समाज के नेता श्री केशवचन्द्र सेन की प्ररेणा से उन्होंने हिन्दी को अपनाया और अपने सभी प्रचारात्मक मुख्य ग्रन्थों यथा सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, व्यवहारभानु, गोकरूणानिधि आदि की रचना आर्यभाषा हिन्दी में की। इससे यह लाभ हुआ कि साधारण हिन्दी जानने वाला सत्यार्थप्रकाश का पाठक वेदों का भी विद्वान बन गया। उसे वेदों की उत्पत्ति, वेदों का महत्व, वेदों की विषय वस्तु, वेदों की प्राचीनता, वेदों का ईश्वरत्व, वेदों का अनादित्व व नित्यत्व, धर्म जिज्ञासा के समाधान का स्वत: प्रमाण ग्रन्थ आदि का ज्ञान हो गया। यह अभूतपूर्व कार्य महर्षि दयानन्द के ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश की रचना से हुआ।

सत्यार्थप्रकाश वेदों का पूरक ग्रन्थ है जो जन साधारण की भाषा में वेदों का परिचय जनसामान्य से कराता है। सत्यार्थ प्रकाश को पढक़र जहां वेद, वैदिक मान्यताओं व सिद्धान्तों का ज्ञान होता है वहीं संसार व देश में प्रचलित सभी मत-मतान्तरों व उनकी सत्यासत्य मान्यताओं का ज्ञान भी होता है। सभी मत-मतान्तरों के यथार्थ स्वरूप को जानकर सत्य मत को ग्रहण करने के उद्देश्य से इस सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ की रचना महर्षि दयानन्द जी ने की थी। यदि महर्षि दयानन्द जी ने वेदों का प्रचार न किया होता और सत्यार्थप्रकाश की रचना न की होती तो आज देश का धार्मिक स्वरूप क्या व कैसा होता? इसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हिन्दू धर्म आज जिस रूप में है, क्या वह वर्तमान स्वरूप में ही होता? यह भी ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता। इतना ही कह सकते हैं कि हिन्दुओं की जनसंख्या का अनुपात वर्तमान से काफी कम होता और हिन्दू समाज आज की तुलना में कहीं अधिक अंधविश्वासों एवं रूढिय़ों से ग्रसित होता। देश की आजादी की चर्चा करें तो आजादी के आन्दोलन में अनेक नेता व कार्यकत्र्ता आर्यसमाजी थे या आर्यसमाज की विचारधारा से प्रभावित थे। यदि महर्षि दयानन्द ने वेद प्रचार, आर्यसमाज की स्थापना और सत्यार्थ प्रकाश की रचना न की होती तो यह कहना भी कठिन है कि भारत सन् 1947 में आजाद हुआ होता या न होता? कारण यह है कि तब देश को आद्य क्रान्ति गुरू पं. श्यामजी कृष्ण वम्र्मा व महादेव गोविन्द रानाडे न मिलते जिनके शिष्य वीर सावरकर आदि और गोपालकृष्ण गोखले आदि थे। आर्यसमाज के सभी सदस्य व अन्य सत्यार्थप्रकाश को पढक़र इसकी देशभक्ति की शिक्षाओं से प्रेरित होकर देश को स्वतन्त्र कराने के लिए आगे आये तथा इन लोगों में से देश को आजादी के नेता व कार्यकत्र्ता बड़ी संख्या में प्राप्त हुए। लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, सरदार अजीत, सरदार किशनसिंह व भगतसिंह सहित उनका पूरा परिवार, पं. रामप्रसाद बिस्मिल आर्यसमाजी व आर्यसमाज की ही देन थे। अनेक पत्रकार, साहित्यकार, इतिहास के विद्वान आर्यसमाजी व आर्यसमाज से प्रभावित थे जिन्होंने आजादी के आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

सत्यार्थ प्रकाश की रचना का उद्देश्य देश से धर्म व समाज में व्याप्त अविद्यान्धकार को मिटाना था तथा इसके स्थान पर विकल्प के रूप में वेद व वैदिक मान्यताओं को स्थापित करना था। सत्यार्थ प्रकाश इस समाज सुधार एवं देशोत्थान के कार्य में पूर्ण रूप से सफल हुआ। इसका प्रमाण यह है कि बहुत से पौराणिक हिन्दू धर्म के लोगों ने अपनी पुरानी आस्थाओं व जीवन शैली को छोडक़र पूर्ण सत्य वैदिक आर्य मत को स्वीकार किया। इसके साथ ही अनेक ईसाई व मुस्लिम मत में दीक्षित व उसके अनुयायी बन्धुओं ने वैदिक मत की ज्येष्ठता व श्रेष्ठता से प्रभावित होकर इसे ग्रहण किया। आर्यसमाज की स्थापना व सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन से पूर्व जो धर्मान्तरण होता था वह भय, प्रलोभन एवं हिन्दूमत की रूढि़वादी मान्यताओं से असन्तुष्ट एवं पीडि़त व्याक्तियों द्वारा होता था। जब आर्यसमाज धर्मान्तरण करने वाली इन संस्थाओं के सामने खड़ा हो गया तो इनका दुस्साहस पस्त हो गया। तब यह चोरी छिपे दूर दराज के वनवासी आदि क्षेत्रों में भय व प्रलोभन से धर्मान्तरण करते रहे। जहां जहां आर्यसमाज पहुंचता जाता, वहां वहां यह कार्य बन्द हो जाता था। इस प्रकार से आर्यसमाज व सत्यार्थप्रकाश ने भय, लोभ व अन्य अनुचित कारणों से किये जाने वाले धर्मान्तरण को भी नियंत्रित किया। देश में हिन्दू जनसंख्या का वर्तमान में जो स्वरूप है उसे बनाये रखने व प्राप्त करने में आर्यसमाज का महत्वपूर्ण योगदान है। यदि यह स्थापित न होता और सत्यार्थप्रकाश जैसा ग्रन्थ इसके द्वारा न मिला होता तो देश व वैदिक संस्कृति की अत्यधिक हानि होती जिससे आर्यसमाज व सत्यार्थ प्रकाश ने रक्षा की है।

वेदों के आधार पर मनुजी ने धर्म के 10 लक्षण बताये हैं जिनमें धैर्य, क्षमा, मन को नियन्त्रित करना, छुप कर अनुचित कार्य चोरी आदि न करना, शरीर के अन्दर व बाहर की स्वच्छता, इन्द्रियों का संयम, बुद्धि को ज्ञान से युक्त बनाना, अविद्या दूर कर विद्या ग्रहण करना, सत्य का धारण व पालन तथा क्रोध न करना हैं। हमें लगता है कि संसार के सभी मतों व धर्मों में इन धर्म के लक्षणों का पूर्णरूपेण पालन यदि किसी धर्मग्रन्थ में है तो वह वेद के पश्चात सत्यार्थप्रकाश में ही है। सत्यार्थ प्रकाश की इसके अतिरिक्त अन्य भी अनेक विशेषतायें हैं। सत्यार्थ प्रकाश का पाठक बच्चा, युवा व वृद्ध अन्धविश्वासों, पाखण्डों, कुरीतियों, मिथ्याचरणों आदि से बचता है।

उसे ईश्वर व जीवात्मा का सच्चा स्वरूप विदित होता है जिससे वह मिथ्या मूर्तिपूजा आदि को छोडक़र निराकार, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ ईश्वर की उपासना को कर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति में अग्रसर होता है। सत्यार्थ प्रकाश की शिक्षाओं के पालन से देश व इसके नागरिक बलवान होते हैं। अत: सत्यार्थ प्रकाश का देश-देशान्तर में अधिक से अधिक प्रचार होना चाहिये जिससे संसार के नागरिकों को श्रेष्ठ मनुष्य बनाया जा सके। महर्षि दयानन्द ने अपने समय में लुप्त वेद विद्याओं को अपने पुरूषार्थ, तप व मेधाबुद्धि से पुनरुद्धार व उन्हें पुनजीर्वित किया था और अपना सारा जीवन इसी के निमित्त लगाया। वेद विरोधियों के षडयन्त्र के परिणामस्वरूप विषपान से उनके जीवन का पटाक्षेप हुआ। उनकी अनुपस्थिति में उनके सभी अनुयायियों का यह दायित्व है कि वह सत्यार्थ प्रकाश का देश-देशान्तर में पुरजोर प्रचार करें जिससे असत्य व अविद्याजन्य मत मतान्तर समाप्त होकर वेदों की ध्वजा संसार में लहलहाये और विश्व में अशान्ति व दु:ख दूर होकर सुख व शान्ति स्थापित हो।

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