Categories
मुद्दा

तारीख पे तारीख देने की प्रवृत्ति की ओर भी जाना चाहिए न्यायालयों का ध्यान

अनूप भटनागर

हमारी न्यायपालिका भले ही नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकारों और कार्यपालिका की कार्रवाई के खिलाफ उनकी वैयक्तिक स्वतंत्रता और हितों की रक्षा के बारे में बार-बार आश्वासन देती है लेकिन इसके बावजूद आज भी आम नागरिक अदालत के नाम से डरता है। आम नागरिकों में एक धारणा गहरे तक पैठ किये है कि एक बार विवाद अदालत में पहुंचा तो न्याय कब मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए जरूरी है कि त्वरित व सस्ता तथा सुगम न्याय प्रदान करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।

त्वरित और सुगमता से न्याय दिलाने की परिकल्पना को साकार करने के लिए सबसे अधिक जरूरी है कि देश में न्यायिक अधिकारियों की संख्या बढ़ाने के साथ ही बेहतर सुविधाओं के साथ अदालती कक्षों की संख्या भी बढ़ाई जाए। यह भी सुनिश्चित हो कि अनावश्यक रूप से मुकदमों की सुनवाई स्थगित नहीं हो। नागरिकों के मन में जल्दी न्याय नहीं मिलने की आशंका तेजी से घर कर रही है। इसकी वजह दीवानी और फौजदारी मुकदमों का सालों तक लंबित रहना भी है। एक साधारण व्यक्ति के मन में अदालत में ‘तारीख पे तारीख’ की दहशत है।

त्वरित न्याय नहीं मिलने की एक बानगी हाल में उच्चतम न्यायालय द्वारा खारिज की गयी एक याचिका है। इस मामले में पश्चिम बंगाल की एक महिला द्वारा 1971 में 3000 हजार रुपये की वसूली के लिए दायर मुकदमा करीब 50 साल चला। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे ‘कभी न थकने वाला विक्रमादित्य’ बताया। रमा देवी नाम की इस महिला ने 1974 में मुकदमा जीत लिया था लेकिन इसके बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने इस साल अक्तूबर में खत्म किया है। साथ ही न्यायालय ने इस प्रकरण को कानून के छात्रों के लिए विधि पाठ्यक्रम में भी शामिल करने का सुझाव दिया है।

इस तरह के कई उदाहरण मौजूद हैं, जिसमें वादकारी आम नागरिक को न्याय मिलने में 20 साल से लेकर 45 साल का वक्त लगा। प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमण भी इस तथ्य से अवगत हैं और यही वजह है कि उन्होंने पिछले सप्ताह एक कार्यक्रम में इस बात पर जोर भी दिया कि आम आदमी को अदालतों में आने के लिए संकोच नहीं करना चाहिए क्योंकि न्यायपालिका के प्रति जनता की आस्था लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। नि:संदेह न्यायपालिका के प्रति जनता का विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन अगर हम राष्ट्रीय न्यायिक ग्रिड के आंकड़ों पर नजर डालें तो वह खुद ही आम नागरिक के मन की शंका बयां करती है।

मसलन, राष्ट्रीय न्यायिक ग्रिड के आंकड़ों के अनुसार इस समय देश की अदालतों में कम से कम 32,57, 580 मुकदमे दस साल से भी ज्यादा समय से लंबित हैं। इनमें आपराधिक मामलों की संख्या 25,63,616 और दीवानी मामलों की संख्या 6,93,964 है। इन आंकड़ों में 36,214 दीवानी मुकदमे और 63,509 आपराधिक मुकदमे 30 साल से भी ज्यादा समय से न्याय की बाट जोह रहे हैं। इनमें से अनेक वादकारियों या प्रतिवादियों का अब तक शायद निधन भी हो गया होगा। इसी प्रकार 20 साल से ज्यादा समय से लंबित दीवानी मामलों की संख्या भी 1,13,998 और आपराधिक मुकदमों की संख्या 3,61,714 है।

यही नहीं, उच्चतम न्यायालय में पांच, सात और नौ सदस्यीय संविधान पीठ के विचारार्थ भी इस समय 421 मामले लंबित हैं। इनमें नौ सदस्यीय संविधान पीठ के 135 और सात सदस्यीय संविधान पीठ के विचारार्थ 15 मामले हैं जबकि पांच सदस्यीय संविधान पीठ के विचारार्थ 271 मुकदमे लंबित हैं। इस तरह के डराने वाले आंकड़ों के मद्देनजर कोई भी आम आदमी अपने किसी विवाद के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले दस बार सोचता है कि इसके समाधान के लिये कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाना कितना उचित होगा।

इस स्थिति के लिए काफी हद तक कार्यपालिका भी जिम्मेदार है जो मुकदमों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त संख्या में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्तियां नहीं करती और अदालती कक्षों के निर्माण का सवाल उठने पर पैसे का रोना रोने लगती है। प्रधान न्यायाधीश ने अपने हालिया भाषण में इस तथ्य को इंगित करते हुए कहा है कि देश में न्यायिक अधिकारियों की कुल संख्या 24, 280 और किराये के 623 परिसरों सहित अदालती कक्षों की संख्या 20,140 है।

उन्होंने यह भी कहा कि देश में अदालतों के लिए बेहतर न्यायिक सुविधाओं के बारे में सबसे अंत में सोचा जाता है। न्यायमूर्ति रमण ने कहा कि न्याय प्रदान करने की प्रभावी व्यवस्था के लिए न्यायपालिका को बेहतर बनाना जरूरी है क्योंकि प्रभावशाली न्यायपालिका अर्थव्यवस्था के विकास में मददगार हो सकती है जबकि न्याय प्रदान करने में विफलता देश को प्रभावित करती है।

विवादों के शीघ्र समाधान में लोक अदालतें काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण के तत्वावधान में नियमित रूप से लोक अदालतों का आयोजन किया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद करोड़ों लंबित मुकदमे अभी भी एक बड़ी समस्या बने हुए हैं। जिला स्तर पर मुकदमों का निपटारा तभी संभव हो सकेगा जब राज्य स्तर पर न्यायपालिका के मुखिया अर्थात‍् उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश निचली अदालतों में लंबित मुकदमों की तेजी से सुनवाई सुनिश्चित करने और अनावश्यक कारणों से सुनवाई के स्थगन पर अंकुश लगाने के लिए ठोस दिशा निर्देश बनायें।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betnano
betyap giriş
hititbet giriş
betnano
betnano
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betnano
betnano
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
casibom giriş
casibom giriş
casibom giriş
jojobet
jojobet
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet