दक्षिण भारत के संत (14) सन्त कुलशेखर अलवार

बी एन गोयल

हे भगवन मैं कब आप के दिव्य दर्शन कर सकूँगा। हे प्रभु राम, मैं अशांत हूँ । मुझे कब आप का अनुग्रह मिलेगा। मेरा मन भटकता रहता है। मैं कब इसे आप के चरण कमलों में लगा सकूँगा। मेरे मन में कब आप के प्रति निष्ठा जागेगी । मुझे कब आप का स्नेह मिलेगा। और कुछ नहीं तो मुझे यदि आप के भक्तों का सत्संग ही मिल जाए तो मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।

तमिलनाडु के बारह वैष्णव भक्त कवियों का सामूहिक नाम है अलवार। तमिल भाषा में इस शब्द का अर्थ है – परमात्मा की भक्ति में स्वयं को डुबो देना। इन भक्त कवियों के नाम के साथ अलवार शब्द स्वयमेव जुड़ जाता है। कुछ भक्त कवियों का जन्म नाम नहीं मालूम था – उन का नाम उन के जन्म स्थान से जाना जाता है और उस में अलवार शब्द जुड़ जाता है जैसे तिरुमाजीसै अलवार। कुछ भक्त कवि अपनी रचनाओं अथवा अपने गुणों के कारण विशेष नाम से जाने जाते हैं। उन के साथ भी अलवार जोड़ दिया जाता है। जैसे विष्णु चित्त को पेरिया अलवार कहा जाता है। गोदा को साध्वी अंडाल कहा जाता है। अंडाल का अर्थ है हमारी हृदय सम्राट (सम्राज्ञी) है, जो हमारी शरण स्थली है, हमारा कल्याण देखती है और हमें स्वीकार करती है। ये अलवार संत समाज के विभिन्न वर्गों से थे। इन का समय छठी से दसवीं शताब्दी के प्रारम्भ तक का माना जाता है।

इसी परम्परा में आठवीं शताब्दी में कुलशेखर अलवार हुए हैं। बचपन से ही इन्हें युद्ध कला, घुड़सवारी, हाथी की सवारी, आदि का प्रशिक्षण दिया जाता था। लेकिन साथ में शस्त्र पुराण काला तमिल और संस्कृत का प्रशिक्षण भी चलता था। समय से ही इन का विवाह भी हो गया था और इन के एक पुत्र और एक पुत्री थी।

संस्कृत और तमिल भाषा के विद्वान, वेदों में निष्णात, अनन्य राम भक्त कुलशेखर केरल प्रदेश के चेरावंशीय राज घराने से थे। राजा द्रव्य रथ के पुत्र कुलशेखर कालीकट के महाराजा थे। इन का जन्म थिरूवणिजकुलम स्थान पर शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था। इसी नक्षत्र में भगवान राम का जन्म हुआ था।

एक  राज्य के नरेश होते हुए भी इन का रुझान भक्ति और अध्ययन में अधिक था। भगवान राम की आराधना करना, उन की सेवा करना और उन के भक्तों की देखभाल करना इन्हें अच्छा लगता था। ये अपने राज्य में शांति और समृद्धि के प्रति सचेत रहते थे और एक बुद्धिमान और न्यायप्रिय राजा के रूप में प्रसिद्ध थे । इन का मन चूंकि अध्यात्म और भगवान भक्ति से जुड़ा था, इन्हें भौतिक संसार के प्रति एक प्रकार का वैराग्य था। अन्य भक्तों की भांति इन का निश्चय अपने अंतिम समय में श्रीरंगम जा कर भगवान की पूजा अर्चना में ही व्यतीत करने का था। कुलशेखर के जीवन के लक्ष्य थे – चिंतन, मनन, ध्यान, पूजन और सेवा। इन के भक्ति दास्य भाव की थी अर्थात दास बन कर भगवान की आराधना करना। भगवत चरणरज इन के लिए भागीरथी के पवित्र जल से भी अधिक पवित्र थी।

एक बार भगवान तिरुपति वेंकटचलपति इन के स्वप्न में आए और इन्हें आशीर्वाद दिया। राजा कुलशेखर भगवान के दर्शन कर अत्यंत भाव विभोर हो गए और स्वयं को सम्पूर्ण रूप से भगवान को समर्पित कर दिया। उन का जीवन एक निस्पृह और निष्काम भाव का हो गया और पूरा समय भगवत पूजा में व्यतीत होने लगा। युद्ध के विचार से ही उन्हें घृणा हो गई। भक्ति रचना और गायन – बस ये ही दो काम रह गए।

राजा कुलशेखर की ईश्वर भक्ति से कुछ लोगों को ईष्र्या होना स्वाभाविक था। राज दरबार के लोगों मानते थे कि राजा को जनता से कुछ दूरी बना कर रखनी चाहिए लेकिन महाराजा कुल-शेखर के पास लोगों का आना जाना बेरोकटोक था। वे लोग महाराजा को यह बताना चाहते थे कि उन्हें एक राजा की भांति रहना चाहिए। लेकिन वे सुनते ही नहीं थे। एक बार ऐसी घटना घटी कि राजा के गले का मोतियों का हार कहीं खो गया। दरबार के षड्यंत्रकारियों को राजा का ध्यान ईश्वर से हटाने का एक अवसर दिखाई दिया। राज दरबारियों ने हार की चोरी का दोष राजा के पास आने वाले भक्तों पर लगा दिया।

दरबारियों ने कहा, ‘आप के पास आने वाले ये तथा कथित भक्त गण ही चोर हैं। राजा ने कहा,’यह सर्वथा गलत है। भक्त गण तो अंजान हैं, वे तो भगवान भक्ति में लीन रहते हैं । वे चोरी नहीं कर सकते।‘ राजा ने दरबार में एक घड़ा रख दिया और अपने नौकरों से कहा, ‘जिस भी व्यक्ति ने ईश्वर के भक्तों पर चोरी का दोष लगाया है वह सब से पहले इस घड़े में अपना हाथ डाले। यदि उस की बात में सत्यता है तो इस घड़े का कोबरा उसे काटेगा नहीं’ । दरबारियों में किसी को भी इतना साहस नहीं हुआ कि घड़े में हाथ दाल सके। इस के बाद राजा ने भक्तों के आचरण को सिद्ध करने के लिए अपना हाथ घड़े में दाल दिया। कोबरा सिमट कर एक तरफ बैठ गया। राजा अपनी परीक्षा में सफल रहे। सभी दरबारियों का सर शर्म से झुक गया। कुछ समय पश्चात राजा का हार चोर से वापिस आ गया।

राजा कुलशेखर की भगवान राम में अटूट श्रद्धा और भक्ति थी। अत: वे भगवान राम की संभावित आपदाओं और संकटों के प्रति भी सजग रहते थे। वे प्रति दिन राज पुरोहित से राम कथा सुनते थे। एक दिन पंडित जी राम कथा में उस समय के प्रसंग का वर्णन कर रहे थे जब राम दण्डकारण्य में राक्षसों से लड़ रहे थे। वर्णन आया कि राक्षसों की सेना की संख्या 14000 है और उसका संचालन खर और दूषण नाम के दो राक्षस कर रहे हैं। इतना सुनते ही कुलशेखर परेशान हो गए। उन्हें चिंता हुई कि भगवान राम तो अकेले हैं। वे 14000 राक्षसों का मुक़ाबला कैसे कर सकेंगे। उन्होने तुरंत अपने सेनापति को आदेश दिया कि राम पर इस समय अत्यंत गहरा खतरा है अत: वे उन की सहायता के लिए जाएं और वे स्वयं भी सेना के साथ जाने के लिए तैयार हो गए। राज पुरोहित को कथा सुनाते ही वास्तविक स्थिति समझ में आ गई। उन्होने तुरंत ही अपने वर्णन में एक मोड दिया। राम की महत्ता का वर्णन करने लगे और अचानक घोषणा की, ‘राम ने अकेले ही राक्षसों को मार गिराया और तत्पश्चात वे मुनि के आश्रम को लौट आए।‘ राजा कुलशेखर को पंडित जी ने कहा , ‘राजन, भगवान राम सकुशल वापिस आश्रम आ गए हैं और सभी राक्षस मारे गए हैं।‘ राजा ने शांति की सांस ली और सेनापति को दिया निर्देश वापिस लिया। यह एक नमूना है अटूट श्रद्धा भाव का।

इसी तरह एक दूसरे समय की बात है – राम कथा चल रही थी। कथा वाचक पंडित जी ने रावण द्वारा सीता हरण की घटना की चर्चा की। पंडित जी कथा वाचन में इस बार सावधान थे । लेकिन राजा कुलशेखर चिंतित हो गए थे। उन्होने तुरत लंका पर चढाई की तैयारी की । सेना को निर्देश दिया – तैयार हो जाओ – आज ही रावण का सफाया करना होगा।

वे अपने मन में अंदर ही अंदर अत्यधिक बेचैन थे। उन्हें लगा कि कहीं देर न हो जाए। अत: अकेले ही समुद्र की तरफ चल दिये। निश्चय किया कि तैर कर ही समुद्र पार करेंगे और स्वयं ही रावण का खात्मा करेंगे। समुद्र की तरफ जाते हुए देखा कि रास्ते में साक्षात भगवान राम चन्द्र जी खड़े हैं । श्री राम के चेहरे पर मुस्कान हैं। राजा को रोक कर भगवान श्री रामचन्द्र ने कहा, ‘तुम्हारी सहायता से मैंने रावण पर विजय प्राप्त कर ली है। वह मारा गया है’। राजा ने पूछा, ‘क्या वास्तव में रावण मारा गया।‘ श्री राम ने कहा, ‘हाँ सच में – आओ अब चलें।‘

कहते हैं कि स्वयं भगवान श्री राम राजा कुलशेखर के साथ पैदल चलकर उन्हें उन के महल तक छोड़ गए। इस के बाद वे अंतध्र्यान हो गए।

उसी दिन रात्रि में भगवान श्री राम इन के स्वप्न मैं आए और इन से कहा, तुम्हारी भक्ति और मेरी रक्षा हेतु तुम्हारी तत्परता के भाव से मैं बहुत  प्रसन्न हूँ। लेकिन तुम्हें मेरी क्षमता और पराक्रम के बारे में अधिक ज्ञान नहीं है। हम असुरों का विनाश सहजता से कर सकते हैं। तुम मेरे साथ लक्ष्मण की तरह से व्यवहार कर रहे हो। उसे भी मेरी काफी चिंता लगी रहती है। आज से तुम्हारा नाम कुलशेखर पेरूमाल होगा। यह राजा कुल शेखर की अनंत भक्ति और असीम श्रद्धा और भक्ति नहीं है तो और क्या है।

तमिल भाषा में भगवान राम को पेरूमाल कहते हैं। अलवारों में ये अकेले ऐसे संत हैं जिन्हें पेरूमाल कहा जाता है। इन्होंने अपने भजन संग्रह का नाम रखा था – ‘पेरूमाल तिरुमोझी’। इस संग्रह में 105 भजन हैं। यह संग्रह ‘दिव्य प्रबंधन’ के प्रथम भाग में संकलित है। इस के आधे भजनों में राम मंदिरों की भव्यता और सौंदर्य का वर्णन है। 20 भजन माधुर्य भाव से परिपूर्ण भगवान कृष्ण को समर्पित हैं। 10 भजनों में भगवान राम के चित्र कूट वास से संबन्धित वर्णन है। वैष्णव मतावलंबियों के अनुसार इन दस भजनों के पाठ से ही पूरी रामायण के पाठ जैसा पुण्य मिलता है । इस लिए इन दस भजनों का पाठ प्रतिदिन नियम पूर्वक करना चाहिए। ऐसा नहीं कि इन्हें श्री राम के प्रति ही इतना अनुराग था। इन्हें श्री कृष्ण के प्रति भी इतनी ही श्रद्धा और सन्मान था। इन्होंने अनेक भजनों की रचना श्री कृष्ण की लीला के बारे में की। विशेष रूप से गोपियों के साथ रास लीला का विशद वर्णन किया है ।

श्री रंगा स्वामी ने इन्हें राज ऋषि कहा है। वे इसे एक दैवीय घटना मानते हैं। इन की कृति पेरूमाल तिरुमोझाई में दस सर्ग में ईश्वर स्तुति ही कही गई है। प्रत्येक सर्ग में इन्होंने स्वयं को अलग अलग भाव में प्रकट किया है। – पहले सर्ग में ये भगवान रंग नाथ के सान्निध्य में रहने का अनुनय विनय करते हैं। चौथे सर्ग में भगवान तिरुवेकेंटन के चरण कमलों में जाने के लिए गाइड बन जाते हैं। पाँचवाँ सर्ग भगवान तिरुविठ्कोदु की शरणागति को समर्पित है। छठे सर्ग में भगवान कृष्ण के लिए वृन्दावन की गोपी बन जाते हैं। सातवें सर्ग में ये माता देवकी के पुत्र विछोह  की पीड़ा को कारुणिक अभिव्यक्ति देते हैं। आठवां और नवां सर्ग भगवान राम के अवतार को समर्पित है। इस में राम की मर्यादा, माता पिता के प्रति स्नेह, पिता पुत्र का लगाव तथा अन्य  पारिवारिक बंधनों को सुद्धर्ड करने के साधनों का वर्णन है। अंतिम दशम सर्ग में रामायण कथा का सारांश है। इन की एक रचना का नाम है – मुकुन्द माला। इस में 40 पद हैं। कुल शेखर इन का पाठ नित्य अत्यंत श्रद्धा पूर्वक करते थे। राजा कुलशेखर ने श्री रंगम, तिरुपति, अयोध्या, चित्र कूट, वृन्दावन, तिरुकणपुरम तथा अन्य अनेक तीर्थ स्थानों की यात्रा की। तिरुपति के दर्शन से राजा अत्यंत भाव विभोर हो गए और सीढिय़ों पर बैठ कर ही भजन गायन करते रहे। इसी लिए कहते हैं कि वैष्णव मत के हर मंदिर के गर्भगृह के बाहर की सीढिय़ों को कुलशेखर सीढ़ी कहा जाता है। इस संबंध में एक पद -हे प्रभु मुझे इतना अवसर दो कि अगले जन्म में मैं तिरुपति मंदिर की एक सीढ़ी बन सकूँ जहां से आप के भक्त आप के दर्शनार्थ जाते हैं। अथवा मुझे पवित्र पुष्करिणी नदी की एक मछली ही बना दो। अथवा मुझे ऐसा वृक्ष ही बना दो जो आप के मंदिर के सामने स्थित हो। अथवा मुझे मंदिर के सामने का एक पत्थर ही बना दो जिस से मैं वहीं पड़ा रहूँ। अथवा मुझे अपना एक ऐसा सेवक ही बना दो जो प्रति दिन प्रात: आप के स्नान, मंजन, अथवा सफाई के पानी को ही एकत्र करता रहे।

कुलशेखर का देहांत तिरुनेल्वेलि जि़ले के अजवार तिरुनगरी के समीप ब्रह्म देशम नामक गाँव में 67 वर्ष की आयु में हुआ। भगवान के प्रति ऐसी असीम श्रद्धावान भक्त को सादर नमन।

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