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भारतीय संस्कृति

पूर्णत:परिष्कृत, समृद्ध भाषा है सर्वभाषाओं की जननी संस्कृत

sanskrit1अशोक प्रवृद्ध

संसार की समृद्धतम भाषा संस्कृत भारतीय संस्कृति का आधारस्तम्भ है।देवभाषा के नाम से जानी जाने वाली संस्कृत संसार की समस्तभाषाओं की जननी है। वेद भी संस्कृत भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहा जाता है। संस्कृत शब्द का अर्थ होता है-परिष्कृत, पूर्ण एवं अलंकृत। संस्कृत में बहुत कम शब्दों में अधिक आशय प्रकट किया जा सकता है और इसमें जैसा लिखा जाता है, वैसा ही उच्चारण भी किया जाता है। संस्कृत में भाषागत त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं। संस्कृत का अध्ययन मनुष्य को सूक्ष्म विचारशक्ति प्रदान करता है और मौलिक चिंतन को जन्म देता है। इससे मन स्वाभाविक ही अंतर्मुख होने लगता है। सनातन संस्कृति के सभी मूल शास्त्र वेद,उपनिषद्, ब्राह्मण, आरण्यक, इतिहास, पुराण, स्मृति आदिग्रंथसंस्कृत भाषा में ही हैं। अत: उनके रसपान व ज्ञान में गोता लगाने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है।

देवभाषा संस्कृत के उच्चारणमात्र से दैवी गुण विकसित होने लगते हैं। अधिकांश मंत्र संस्कृत में ही हैं। इस भाषा का ज्ञान सभी भारतवासियों को होना ही चाहिए। विद्यालयों में इसकी शिक्षा आवश्यक रूप से सभी बच्चों को मिलनी चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय को सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल ने बताया था कि केन्द्रीय  विद्यालयों में शिक्षा पाठ्यक्रम में 6 से 8 तक संस्कृत ही तीसरी भाषा होगी। जर्मन पढ़ाया जाना गलत है और गलती को जारी नहीं रखा जा सकता। इस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, हमें क्यों अपनी संस्कृति भूलनी चाहिए। संस्कृत के जरिये आप अन्य भाषाओं को आसानी से सीख सकते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। सरकार अगले सत्र से इसे बेहतर तरीके से क्रियान्वित करे। परन्तु खेद की बात है कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बावजूद सरकार के द्वारा इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई ।

भाषाविदों के अनुसार भी संस्कृत सर्वभाषाओं की जननी है त्तथा विश्व की सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं-न-कहीं संस्कृत से ही जुड़ा हुआ है।यही कारण है कि विभिन्न भाषाओं में संस्कृत के शब्द बहुतायत में पाये जाते हैं। कई शब्द अपभ्रंश के रूप में हैं तो कई ज्यों-के-त्यों हैं। संस्कृत का अखंड प्रवाह पालि, प्राकृत व अपभ्रंश भाषाओं में बह रहा है। चाहे तमिल, कन्नड़ या बंगाली हो अथवा मलयालम, ओडिय़ा, तेलुगू, मराठी या पंजाबी हो – सभी भारतीय भाषाओं के लिए लिए संस्कृत ही अन्त:प्रेरणा-स्रोत है। आज भी इन भाषाओं का पोषण और संवर्धन संस्कृत के द्वारा ही होता है। संस्कृत की सहायता से कोई भी उत्तर भारतीय व्यक्ति तेलुगू, कन्नड़, ओडिय़ा, मलयालम आदि दक्षिण एवं पूर्व भारतीय भाषाओं को सरलतापूर्वक सीख सकता है। यही कारण है कि आज ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और कोलम्बिया जैसे प्रतिष्ठित 200 से भी ज्यादा विदेशी विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ायी जा रही है।

संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। यह सर्वाधिक प्राचीन, पूर्णत: वैज्ञानिक एवं समृद्ध भाषा है। वैज्ञानिकों का भी संस्कृत को समर्थन संस्कृत की वैज्ञानिकता अर्थात बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक खोजों का आधार होने के कारण ही बनी है। वेंकट रमन, जगदीशचन्द्र बसु, आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय, डॉ. मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात वैज्ञानिकों को संस्कृत भाषा से अत्यधिक प्रेम था और वे वैज्ञानिक खोजों के लिए ये संस्कृत को आधार मानते थे। प्राचीन वैज्ञानिकों एवं संस्कृत प्रेमियों के अनुसार संस्कृत का प्रत्येक शब्द वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए प्रेरित करता है। प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने विज्ञान में जितनी उन्नति की थी, वर्तमान में उसका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। ऋषि-महर्षियों का सम्पूर्ण ज्ञान-सार संस्कृत में निहित है। भारतीय वैज्ञानिकों के साथ ही पाश्चात्य विद्वानों ने भी संस्कृत की समृद्धता को स्वीकार किया है। सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को एशियाटिक सोसायटी के माध्यम से सारे विश्व में यह घोषणा करते हुए कहा था, संस्कृत एक अदभुत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लैटिन से अधिक समृद्ध और दोनों ही भाषाओं से अधिक परिष्कृत है। यही कारण है कि ब्रिटिश विद्यालयों में संस्कृत अनिवार्य बनता जा रहा है। लंदन के सेंट जेम्स कान्वेंट विद्यालय अर्थात स्कूल, जहाँ बच्चों को द्वितिय भाषा के रूप में संस्कृत सीखना आवश्यक है, का मानना है किसंस्कृत से छात्रों में प्रतिभा का विकास होता है। यह उनकी वैचारिक क्षमता को निखारती है, जो उनके बेहतर भविष्य के लिए सहायक है। याद्दाश्त को भी बेहतर बनाती है । संस्कृत शिक्षाविद् पॉल मॉस के अनुसार संस्कृत से सेरेब्रेल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। किसी बालक के लिए उँगलियों और जुबान की कठोरता से मुक्ति पाने के लिए देवनागरी लिपि व संस्कृत बोली ही सर्वोत्तम मार्ग है। वर्तमान यूरोपीय भाषाएँ बोलते समय जीभ और मुँह के कई हिस्सों का और लिखते समय उँगलियों की कई हलचलों का इस्तेमाल ही नहीं होता, जब कि संस्कृत उच्चारण- विज्ञान के माध्यम से मस्तिष्क की दक्षता को विकसित करने में काफी मदद करती है।डॉ. विल डुरंट के अनुसार संस्कृत आधुनिक भाषाओं की जननी है। संस्कृत बच्चों के सर्वांगीण बोध ज्ञान को विकसित करने में मदद करती है।कई शोधों में यह पाया गया कि जिन छात्रों की संस्कृत पर अच्छी पकड़ थी, उन्होंने गणित और विज्ञान में भी अच्छे अंक प्राप्त किये। वैज्ञानिकों का मानना है कि संस्कृत के तार्किक और लयबद्ध व्याकरण के कारण स्मरणशक्ति और एकाग्रता का विकास होता है। यह जान कि आधुनिक विज्ञान के लिए संस्कृत वरदानरूप बन सकती है, सारा संसार संस्कृत ज्ञान प्राप्ति के पीछे दौड़ पड़ा है , और हम हैं कि ज्ञान-विज्ञान के इस अथाह भण्डार से मुख मोड़ इसे मृत भाषा बनाने पर तुले हैं । वर्तमान समय में संस्कृत भाषा विश्वभर के विज्ञानियों के लिए शोध का विषय बन गयी है। यूरोप की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका फोर्ब्जद्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार संस्कृत भाषा कम्पयूटर के लिए सबसे उत्तम भाषा है तथा समस्त यूरोपीय भाषाओं की जननी है। अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा का भी इस बात कि पुष्टि करते हुए कहना है कि अंतरिक्ष में सिर्फ संस्कृत की ही चलती है और सूर्य किरणों से स्वत: ? शब्द की निष्पति होती रहती है । आधुनिक विज्ञान सृष्टि के रहस्यों को सुलझाने में बौना पड़ रहा है। अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मंत्र-विज्ञान की महिमा से विज्ञान आज भी अनभिज्ञ है। उडऩ तश्तरियाँ ,एलियन आदि की कई ऐसी बातें हैं जो आज भी विज्ञान के लिए रहस्यमय बनी हुई हैं। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से ऐसे कई रहस्यों को सुलझाया जा सकता है। विमान विज्ञान, नौका विज्ञान, स्वास्थ्य विज्ञान से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हमारे ग्रंथों से प्राप्त हुए हैं।

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